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पाकिस्तान में महंगाई बेकाबू, मंत्री ने दी कम खाने की सलाह
- Author, उमर दराज़ नंगियाना
- पदनाम, बीबीसी उर्दू लाहौर
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान मामलों के संघीय मंत्री अली अमीन गंडापुर ने बढ़ती महंगाई की वजह से पाकिस्तान के लोगों को 'चाय में कम चीनी डालने और रोटी कम खाने' की सलाह दी है.
वह पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में एक सभा को संबोधित कर रहे थे. इसी दौरान उन्होंने महंगाई पर होने वाली बहस पर टिप्पणी करते हुए कहा, "अगर मैं चाय में चीनी के सौ दाने डालता हूँ और नौ दाने कम डाल दूं, तो क्या वह कम मीठी हो जाएगी."
उन्होंने कहा, "क्या हम अपने देश के लिए, अपनी आत्मनिर्भरता के लिए इतनी सी क़ुर्बानी भी नहीं दे सकते? अगर मैं रोटी के सौ निवाले खाता हूँ तो उसमे नौ निवाले कम नहीं कर सकता हूँ?''
सोशल मीडिया पर यूज़र्स उनके भाषण के इस वीडियो को शेयर कर उनकी आलोचना कर रहे हैं.
हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब मंत्रियों या जनप्रतिनिधियों ने जनता को इस तरह की सलाह दी हो. हाल ही में, सत्तारूढ़ पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के ही नेशनल असेंबली के सदस्य रियाज़ फ़तयाना ने भी अली अमीन गंडापुर जैसी ही सलाह दी थी.
अतीत पर नज़र डालें तो पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) समेत कई पार्टियों के नेता इस तरह की बातें करते रहे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने ख़ुद पाकिस्तान की जनता से 'कम रोटी खाने' की बात कही थी.
साल 1998 में जब पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने स्वीकार किया था कि पाकिस्तान को अमेरिका और बाक़ी दुनिया की तरफ़ से कठिन आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है.
टीवी और रेडियो पर जनता को संबोधित करते हुए, उन्होंने इस बारे में सचेत करते हुए कहा था, कि "अपनी कमर कस लें और सिर्फ़ एक वक़्त खाना खाने के लिए तैयार हो जाएं और इस परेशानी में मैं भी आपके साथ रहूंगा."
उनकी पार्टी कई बार सत्ता में आने के बाद बचत अभियान चला चुकी है. पीटीआई सरकार ने भी शुरुआती दिनों में ही बचत अभियान की घोषणा की थी.
हालांकि, क्या सरकार के लिए लोगों को बचत करने या 'कम रोटी खाने' की सलाह देना उचित है?
सस्टेनेबल डिवेलपमेंट पॉलिसी इंस्टिट्यूट (एसडीपीआई) इस्लामाबाद के अर्थशास्त्री डॉक्टर साजिद अमीन का मानना है कि इस तरह की सलाह ग़रीबों का मज़ाक बनाने के समान है.
उनके अनुसार, बचत करने की सलाह या अभियान न तो कभी भी महंगाई का समाधान रहे हैं और न ही कभी होंगे. "सरकार का काम आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ाना या उसकी स्थिति में सुधार करना है."
हालांकि, सवाल यह है कि क्या वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदा हालात में महंगाई पर क़ाबू पाना सरकार के बस में है? डॉक्टर साजिद अमीन कहते हैं कि इसके लिए सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि हाल के दिनों में पाकिस्तान में महंगाई के रिकार्ड स्तर पर पहुंचने के क्या कारण हैं.
पाकिस्तान में महंगाई ज़्यादा क्यों है?
अर्थशास्त्री डॉक्टर साजिद अमीन के अनुसार, पाकिस्तान में महंगाई में हालिया वृद्धि के तीन मुख्य कारण हैं. विश्व बाज़ार में वस्तुओं की क़ीमतों में वृद्धि, पाकिस्तानी रुपए की क़ीमत में कमी और हाल ही में सरकार की तरफ़ से लागू की गई टैक्स नीतियां.
तीसरे पॉइंट को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में सरकार "राजस्व यानी आमदनी के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ईंधन जैसी वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाती है, जिससे उनकी क़ीमत में वृद्धि होती है."
इस तरह, रोज़मर्रा के इस्तेमाल की जिन चीज़ों में ईंधन का उपयोग होता है, ज़ाहिर है कि उनकी क़ीमतें बढ़ जाती हैं. पाकिस्तान में हाल ही में ईंधन की क़ीमतें बढ़ी हैं.
तो क्या सरकार इन्हें नियंत्रित नहीं कर सकती?
डॉक्टर साजिद अमीन कहते हैं, ''इन कारकों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है.'' उनके अनुसार वैश्विक बाज़ार में उम्मीद के विपरीत क़ीमतें बढ़ीं हैं और उनके बढ़ने या घटने पर पाकिस्तान सरकार का कोई कंट्रोल नहीं है.
वहीं, पाकिस्तान का आयात बिल बहुत बड़ा रहा है. डॉक्टर साजिद अमीन के अनुसार, पाकिस्तान एक नेट इम्पोर्टर है, जिसका मतलब है कि उसका कुल आयात उसके कुल निर्यात से अधिक है और यह गेहूं, चीनी जैसे खाद्य पदार्थों का भी आयात कर रहा है. इसलिए जब तक इसका यह बिल और व्यापार घाटा कम नहीं होता, रुपये की क़ीमत में भी सुधार की उम्मीद कम ही है.
राजस्व बढ़ाने के लिए, सरकार को ईंधन, बिजली और गैस पर टैक्स बढ़ाना पड़ता है.
दूसरा, क़र्ज़ की नई क़िस्त के लिए पाकिस्तान को एक बार फिर आईएमएफ़ के पास जाना है. आईएमएफ़ भी सरकार से इन वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाने के लिए कहेगा."
तो क्या सरकार कुछ भी नहीं कर सकती?
साजिद अमीन के मुताबिक़ ऐसा नहीं है, बल्कि सरकार कई क़दम उठा सकती है. उनके अनुसार, लोगों पर महंगाई के प्रभाव को कम करने के लिए सरकार को दो बुनियादी काम करने की ज़रूरत है.
उन्होंने मूल्य नियंत्रण समितियों के प्रभावी उपयोग का ज़िक्र करते हुए कहा, "सबसे पहले स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक ढांचे को सक्रिय करने की ज़रूरत है, जो अब तक नहीं किया गया है."
डॉक्टर साजिद अमीन का मानना है कि अगर उनका सही उपयोग किया जाए तो इस तरह की समितियां क़ीमतों में कृत्रिम वृद्धि को नियंत्रित करने में बहुत प्रभावी होती हैं.
दूसरा काम जमाख़ोरी को समाप्त करना है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा महंगाई ईंधन या खाद्य वस्तुओं के इर्द गिर्द है. पाकिस्तान में, कमोडिटी की क़ीमतों पर किसान के खेत से बिक्री के स्थान तक पहुँचने में कई गुना कमिशन बढ़ जाता है.
"यह सीधे महंगाई का कारण बनता है और यह एक ऐसा पहलू है, जिसे नियंत्रित करने की शक्ति सरकार के पास है." एक तीसरा तरीक़ा यूटिलिटी स्टोर्स के प्रभावी इस्तेमाल का भी है, जिसके ज़रिए सरकार किसी हद तक महंगाई पर कंट्रोल कर सकती है.
क्या महंगाई कम हो सकती है?
डॉक्टर साजिद अमीन के अनुसार, "एक बार जब क़ीमतें बढ़ जाती हैं, तो वे नीचे नहीं आतीं या उन्हें नीचे लाना बहुत मुश्किल होता है."
उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार को इसका अंदाज़ा लगाने में बहुत देर हुई है कि महंगाई एक गंभीर समस्या है. इसके बाद उन्हें यह पता लगाने में भी देर लगी कि महंगाई बढ़ने की वजह क्या थी.
हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार दो काम ऐसे कर सकती है, जिससे आम आदमी को महंगाई का ज़्यादा असर महसूस न हो.
एक तो सरकार को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का दायरा बढ़ाना चाहिए. दूसरा, आम आदमी की आय बढ़ाने की ज़रूरत है.
उनका मानना है कि इसके अलावा बचत ही एक उपाय है.
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