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रूस, चीन, भारत, ईरान और पाकिस्तान करेंगे अफ़ग़ानिस्तान पर वार्ता, तालिबान भी होगा शामिल
अफ़ग़ानिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय वार्ता में भाग लेने के लिए रूस तालिबान को निमंत्रण देने जा रहा है.
चीन, भारत, ईरान और पाकिस्तान की भागीदारी वाली ये अहम बातचीत इसी महीने की 20 तारीख़ को होने वाली है.
समाचार एजेंसी एएफ़पी की रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में रूस के दूत ज़ामिर काबुलोव ने गुरुवार को ये जानकारी रूसी पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में दी.
ज़ामिर काबुलोव से पूछा गया था कि क्या रूस इस अफ़ग़ान वार्ता में कट्टरपंथी संगठन तालिबान के प्रतिनिधियों को निमंत्रण देने वाला है? इस सवाल के जवाब में काबुलोव ने कहा, "हां."
हालांकि समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि ज़ामिर काबुलोव ने मॉस्को में होने वाली अफ़ग़ान वार्ता के बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया है.
वहीं रूसी समाचार एजेंसी टीएएएस के अनुसार ज़ामिर काबुलोव ने माना कि रूस तालिबान को न्योता देने वाला है, लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया है कि संगठन के किस स्तर के प्रतिनिधियों को वार्ता में शामिल करने की योजना की जा रही है.
जी20 देशों का सम्मेलन
मॉस्को में होने वाली इस वार्ता से पहले 12 अक्टूबर को अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर ही जी20 देशों का एक सम्मेलन होने वाला है.
इस सम्मेलन में तालिबान के सत्ता हासिल करने के बाद देश को मानवीय त्रासदी से बचाने पर चर्चा होनी है.
इससे पहले मॉस्को मार्च में अफ़ग़ानिस्तान पर एक और अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस की मेजबानी कर चुका है. इसमें रूस, अमेरिका, चीन और पाकिस्तान ने हिस्सा लिया था.
इस कॉन्फ्रेंस के बाद जारी किए गए साझा बयान में अफ़ग़ानिस्तान में लड़ रहे पक्षों से शांति समझौते और हिंसा कम करने की अपील की गई थी.
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रूस अफ़ग़ानिस्तान की मदद करेगा?
इसी कॉन्फ्रेंस में तालिबान से मार्च से सितंबर के महीनों तक कोई हमला नहीं करने की अपील की गई थी. इसके बाद ही अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से 20 साल बाद अपने सैनिकों को वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू की थी.
बुधवार को संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अफ़ग़ानिस्तान के मानवीय संकट की ओर बढ़ने को लेकर चेताया था.
इस सिलसिले में ज़ामिर काबुलोव से पूछा गया कि क्या रूस अफ़ग़ानिस्तान की मदद करेगा?
तो उन्होंने कहा, "रूस ऐसा करेगा लेकिन इसे कैसे अंजाम दिया जाएगा, इस पर कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है. इस पर ग़ौर किया जा रहा है."
तालिबान पर जारी है रूस का प्रतिबंध
रूस ने तालिबान की तरफ़ बातचीत का हाथ तो बढ़ाया है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान की हुकूमत को अभी तक मान्यता नहीं दी है.
रूस में तालिबान अभी तक एक चरमपंथी संगठन के रूप में प्रतिबंधित है.
सोमवार को ज़ामिर काबुलोव ने कहा था कि तालिबान के शासन के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों पर पुनर्विचार की प्रक्रिया से अलग नहीं रहेगा.
हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि "हमारा मानना है कि फिलहाल इसे लेकर जल्दबाज़ी करना व्यावहारिक नहीं होगा."
हाल के सालों में रूस तालिबान और उसके प्रतिनिधियों की कई बार मेज़बानी कर चुका है.
'मॉस्को ने सबक लिया है'
अगस्त में काबुल पर तालिबान का नियंत्रण स्थापित होने के बाद जब एक तरफ़ ज़्यादातर पश्चिमी देश अपने राजनयिक को अफ़ग़ानिस्तान को हटाने और दूतावास खाली कराने के लिए जल्दबाज़ी कर रहे थे तो रूस ने काबुल में अपना दूतावास खुला रखा था.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अफ़ग़ानिस्तान के घरेलू मामलों में दूसरे देशों की दखलंदाज़ी की पहले ही आलोचना कर चुके हैं.
उन्होंने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले से मॉस्को ने सबक लिया है.
अस्सी के दशक में रूस ने अफ़ग़ानिस्तान में लगभग दस साल तक जंग लड़ी थी जिसमें उसे काफी नुक़सान उठाना पड़ा था.
इस जंग में दो लाख अफ़ग़ान मारे गए और 70 लाख लोग बेघर हो गए. सोवियत संघ के 14 हज़ार से ज़्यादा सैनिक मारे गए थे.
अफ़ग़ानिस्तान में जारी राजनीतिक अस्थिरता
पुतिन ने इस बात लेकर भी आगाह किया है कि अफ़ग़ानिस्तान में जारी राजनीतिक अस्थिरता का फ़ायदा उठाते हुए वहां सक्रिय चरमपंथी गुटों के सदस्य सरहद पार कर दूसरे देशों में पनाह ले सकते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान की बागडोर तालिबान के हाथ में आने के बाद रूस ताजिकिस्तान और उज़बेकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास कर चुका है. ताजिकिस्तान में उसका सैनिक अड्डा भी है.
इन दोनों ही देशों की अफ़ग़ानिस्तान के साथ सीमा लगती है.
रूस ने ये भी बताया है कि मध्य एशिया के इन दोनों देशों से उसे हथियारों के नए ऑर्डर मिले हैं.
हालांकि तालिबान ने अपनी तरफ़ से ये स्पष्ट किया है कि मध्य एशिया के देशों को उससे कोई ख़तरा नहीं है.
इस क्षेत्र में सोवियत संघ का हिस्सा रहे देशों को अफ़ग़ान चरमपंथी अतीत में अपना निशाना बनाते रहे हैं.
साल 1996 से साल 2001 तक तालिबान अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर काबिज़ रहे थे.
लेकिन सितंबर 11 के हमलों के बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला करके तालिबान को सत्ता से बेदखल कर दिया था.
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