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क़तर में चुनाव: यह लोकतंत्र की शुरुआत है या दिखावा
क़तर में शनिवार को पहली बार राष्ट्रीय चुनाव हो रहे हैं. दरअसल, ये देश की सलाहकार परिषद शूरा काउंसिल के चुनाव हैं, जिन्हें देश के पहले विधायी चुनाव के तौर पर भी देखा जा रहा है.
अल जज़ीरा के मुताबिक़ मैदान में 294 उम्मीदवार खड़े हैं, जिनमें 29 महिलाएं शामिल हैं. देश के 30 ज़िलों में बनाए गए मतदान केंद्रों पर वोट डाले जाएंगे.
हालांकि, इस चुनाव को लेकर भी काफ़ी सवाल खड़े हो रहे हैं लेकिन यह चुनाव अपने आप में ऐतिहासिक है.
45 सदस्यों वाली शूरा काउंसिल के 30 सदस्यों के लिए यह चुनाव हो रहा है जबकि 15 सदस्यों को देश के शासक अमीर शेख़ तमीम बिन हम्माद अल-थानी ख़ुद चुनेंगे.
क्या है शूरा काउंसिल
देश के शासक अल-थानी ने इन ऐतिहासिक चुनावों की मतदान की तारीख़ दो अक्तूबर को तय की थी.
शूरा काउंसिल के पास देश की सामान्य नीतियों और बजट को मंज़ूरी देने का विधायी अधिकार है लेकिन उसका रक्षा, सुरक्षा, आर्थिक और निवेश आधारित नीति बनाने वाले कार्यकारी निकायों पर कोई नियंत्रण नहीं है.
इस कारण माना जाता है कि इस परिषद के पास सीमित शक्तियां हैं और देश के शासक ही सबसे ताक़तवर हैं.
लेकिन फिर भी विश्लेषकों का मानना है कि बहरीन, ओमान और कुवैत के बाद इस खाड़ी देश का लोकतंत्र की ओर यह पहला क़दम है.
बहरीन और ओमान में भी ऐसे ही सलाहकार निकाय हैं जबकि कुवैत में पूरी तरह से निर्वाचित एक संसद है.
कहां है पेच
साल 2003 में संवैधानिक जनमत संग्रह के बाद इन चुनावों को अनुमति दी गई थी लेकिन आलोचकों का मानना है कि मतदान की पात्रता बहुत बारीक है.
देश में अब तक म्यूनिसिपल इलेक्शन होते रहे हैं और लोग मतदान करते रहे हैं लेकिन राजनीतिक पार्टियों पर प्रतिबंध है.
क़तर में इस समय सबसे अधिक विवाद मतदान को लेकर ही है क्योंकि इसमें सभी नागरिक वोट नहीं डाल सकते हैं.
दुनिया के सबसे बड़े लिक्विफ़ाइड प्राकृतिक गैस उत्पादक इस खाड़ी देश में विदेशी कामगारों की भारी संख्या है और देश की आबादी तक़रीबन 30 लाख है लेकिन इसमें से सिर्फ़ 10% लोग ही यानी तीन लाख लोग वोट कर सकते हैं.
देश के चुनावी क़ानून के तहत मतदान के लिए मूल निवासियों और नागरिकों में अंतर बताया गया है. इसका कई मानवाधिकार संगठन और आम नागरिक विरोध कर रहे हैं.
इसी क़ानून के कारण 90% क़तरी नागरिक मतदान करने या चुनाव में खड़े होने से रोक दिए गए हैं.
क्या है मतदान के लिए क़ानून
इस साल जुलाई में अमीर शेख़ तमीम बिन हम्माद अल-थानी ने जो क़ानून पास किया था, उसके अनुसार 18 साल से अधिक आयु के वो नागरिक जिनकी मूल नागरिकता क़तरी रही है या फिर वो आम नागरिक जो यह साबित कर दें कि उनके पूर्वज क़तर में ही पैदा हुए थे वो लोग मतदान कर सकते हैं.
उन लोगों को अपने पूर्वजों के बारे में साबित करना होगा कि 1930 से पहले वे लोग क़तरी क्षेत्र में रह रहे थे. इसके बाद ही वो मतदान कर सकते हैं.
वहीं वो लोग, जिन्होंने क़तर की नागरिकता ले रखी है वो न ही मतदान कर सकते हैं और न ही चुनाव लड़ सकते हैं.
बीते महीने ह्यूमन राइट्स वॉच के मध्य-पूर्व के उप-निदेशक एडम कूगल ने कहा था कि सरकार में नागरिकों की भागीदारी की क़तर की कोशिशों का जश्न मनाया जा सकता है लेकिन कई क़तरी नागरिकों को मतदान का अधिकार न देकर इस पर कलंक लग गया है.
उन्होंने कहा कि नए क़ानून क़तर को लोगों को यह याद दिलाते हैं कि वे सभी समान नहीं हैं.
एक ख़ास जनजाति भी है नाराज़
इसके अलावा चुनाव क़ानून के एक अनुच्छेद की वजह से देश का जनजातीय समुदाय भी ख़ासा नाराज़ है.
इस क़ानून के अनुसार जो भी शख़्स 1971 में क़तर के गठन के बाद से लगातार देश में नहीं रहा है वो भी चुनाव में भाग नहीं ले सकता है. माना जा रहा है कि यह क़ानून ख़ासतौर पर ख़ानाबदोश क़तरी जनजाति अल-मुर्रा के लिए लाया गया है.
ह्युमन राइट्स वॉच के अनुसार, अगस्त महीने में इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए थे, जिसमें अल-मुर्रा जनजाति के अधिकतर लोग शामिल थे और कम से कम 15 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स क़तर के सूत्रों के हवाले से लिखती है कि 'हिंसा भड़काने और नफ़रत भरे भाषण' को लेकर दो लोग अब भी हिरासत में हैं.
अल-मुर्रा जनजाति और क़तर के शाही परिवार के बीच संबंध हमेशा से ख़राब रहे हैं. साल 2017 में जब क़तर और सऊदी अरब के बीच तनातनी बढ़ गई थी तब इस जनजाति के अधिकतर सदस्यों ने सऊदी अरब का पक्ष लिया था.
वहीं अमवाज डॉट मीडिया के अनुसार, मुर्रा समुदाय के कुछ लोग 1996 के तख़्तापलट में कथित तौर पर शामिल थे. वे लोग पद से हटाए गए अमीर शेख़ ख़लीफ़ा बिन हम्माद को वापस गद्दी पर बैठाना चाहते थे. हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स में इन दावों को ख़ारिज किया जाता रहा है.
चुनाव क़ानून को लेकर क़तर के विदेश मंत्री ने कहा है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर जो भी समीक्षा करनी हो वो अगली शूरा काउंसिल करेगी यह एक 'साफ़ प्रक्रिया' है.
कैसा है यह परिवर्तन
क़तर दुनिया का सबसे बड़े गैस उत्पादक देश और अमेरिका का सहयोगी है. उसके यहाँ दुनिया में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आया यानी 59,000 डॉलर है. इस कारण भी वहाँ पर सामाजिक और राजनीतिक अशांति की संभावना कम ही रही है.
चुनावी प्रक्रिया पर रॉयटर्स से अरब गल्फ़ स्टेट्स इंस्टिट्यूट की क्रिस्टीन स्मिथ दीवान कहती हैं कि क़तर का नेतृत्व सावधानी से आगे बढ़ रहा है, उसने कई तरह से इसमें भागीदारी करने पर रोक लगा दी है और राजनीतिक वाद-विवाद और उसके नतीजों पर महत्वपूर्ण नियंत्रण रख रखा है.
वो कहती हैं कि लोकप्रिय राजनीति यहां पर अप्रत्याशित है लेकिन उनका मानना है कि समय के साथ-साथ जैसे-जैसे राजनीतिक मंच विकसित होगा क़तर के लोग अपनी भूमिका और अधिकारों को लेकर अधिक जागरूक होंगे.
क़तर में अगले साल फ़ुटबॉल विश्व कप खेला जाना है क्या उससे पहले वो अपनी छवि अधिक लोकतांत्रिक दिखाने पर ज़ोर दे रहा है?
इस पर यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की रिसर्च फ़ैलो चिंसिया बियांको कहती हैं कि उन्हें नहीं लगता है कि क़तर के अमीर यह सब एक पीआर स्टंट के तौर पर कर रहे हैं.
उन्होंने जर्मन ब्रॉडकास्टर डीडब्ल्यू से कहा क़तर का नेतृत्व साल 2009 से ही शूरा चुनाव को लेकर बात कर रहा था लेकिन उन्होंने इसे लागू करने को लेकर अभी तक इंतज़ार किया है, हालांकि उनके पास पीआर स्टंट करने को लेकर अच्छे कारण भी थे. क़तर संकट के दौरान उनके इस्लामी समूहों को समर्थन करने को लेकर ख़ूबर नकारात्मक मीडिया कवरेज हुई थी.
कॉपी- मोहम्मद शाहिद
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