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क्वाड सम्मेलन को लेकर आख़िर क्या हैं चीन की मीडिया के आरोप?
- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, .
पिछले हफ़्ते अमेरिका में हुए क्वाड शिखर सम्मेलन पर चीन की मीडिया और विशेषज्ञों ने कहा है कि यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को नियंत्रित करने का एक और प्रयास है. साथ ही ये भी कहा कि ये समूह अपना उद्देश्य पाने में नाकाम रहा है.
दरअसल क्वाडिलैटरल सिक्योरिटी डॉयलॉग को संक्षेप क्वाड कहा जाता है. अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया इसके चार सदस्य देश हैं.
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने 24 सितंबर को हुई इस बैठक के अगले दिन अपनी राय रखी. उसने बताया कि क्वाड सम्मेलन की पहली व्यक्तिगत बैठक में भाग लेने वाले नेताओं ने "बिना चीन का सीधा हवाला दिए" कई मुद्दों पर चर्चा की. हालांकि इस रिपोर्ट में उसने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा कि क्वाड एक "अनौपचारिक सभा" है, जिसके निशाने पर कोई देश नहीं है.
फिर भी उसने इस बैठक को "साफ़ तौर पर इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को निशाना बनाने" की कोशिश बताया है. उसकी इस रिपोर्ट में, क्वाड की बैठक से पहले चीन के विदेश मंत्रालय की टिप्पणियों को भी सामने रखा गया है. चीनी विदेश मंत्रालय ने क्वाड को "बंद और विशिष्ट गुट" करार दिया था.
'असली मकसद है विवाद भड़काना'
चीन के विशेषज्ञों ने बैठक के "वास्तविक इरादे" को चीन को नियंत्रित करने का प्रयास बताया है. जानकारों ने कहा कि ऐसी कोई भी कार्रवाई प्रतिकूल परिणाम देगी और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए ख़तरा पैदा करेगी.
24 सितंबर को सरकारी प्रसारक सीसीटीवी के 'फोकस टुडे' नामक कार्यक्रम में सैन्य विशेषज्ञ डू वेनलोंग ने कहा कि बैठक में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई, उनका उद्देश्य चीन को "अलग-थलग करना और चुनौती देना" है. उन्होंने आगे कहा कि इस साल मार्च में आयोजित पहले ऑनलाइन शिखर सम्मेलन की तुलना में चीन को रोकने की कोशिशें "तेज" हुई हैं.
वहीं चाइना फॉरेन अफेयर्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ली हैडोंग क्वाड के बारे में कहते हैं कि सहयोग की आड़ में "ये समूह विवादों और संघर्षों को उकसा रहा है". उन्होंने कहा कि ये चारों देश महामारी से निपटने के लिए सहयोग जैसे मुद्दों के बहाने "अपने असली उद्देश्य को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं".
अंग्रेजी अख़बार चाइना डेली ने 26 सितंबर को संपादकीय में लिखा कि क्वाड की "मूल प्रेरणा" इलाके में "चीन की भूमिका को बेहद खराब बताना" और "विभाजन के बीज बोना" है. इसमें ये भी कहा गया कि वाशिंगटन के "समूह बनाने और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और टकराव बढ़ाने के चलते" अमेरिका अब "क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा" बन गया है.
'मूलभूत कमियां'
वहीं कइयों ने क्वाड देशों के बीच समन्वय की समस्याओं को उठाया है.
शिन्हुआ में 26 सितंबर को छपे एक लेख में कहा गया कि क्वाड के सिस्टम में "मौलिक बाधाएं और कमियां" हैं. इसमें आगे लिखा गया कि चीन के साथ इन देशों के "भू-राजनीतिक विरोधाभास" हैं, पर उन सबका ध्यान अलग-अलग है. इससे मज़बूत 'हिंद-प्रशांत' गठबंधन बनाने के लिए "एकजुट होकर कार्रवाई करना और कठिन हो जाता है".
कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार पीपुल्स डेली के विदेशी संस्करण की वेबसाइट पर 26 सितंबर को प्रकाशित एक आलेख में कहा गया कि सभी चार देशों के अपने-अपने भू-राजनीतिक विचार हैं. इससे यह पता नहीं चलता कि "क्या क्वाड कभी संस्थागत हो सकता है".
उधर सीसीटीवी पर विदेश मंत्रालय से जुड़े चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के अमेरिकी अध्ययन विभाग के निदेशक टेंग जियानकुन ने 25 सितंबर को अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में शामिल होने के लिए ये चारों देश "एक निश्चित स्तर की सहमति रखते हैं". उन्होंने आगे कहा कि दुनिया की बहुध्रुवीय राजनीति और वैश्वीकरण के आज के दौर में "शीतयुद्ध वाली मानसिकता" अपनाने से उनके लिए अपने लक्ष्य हासिल करना कठिन हो जाएगा.
चीन के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन से मुकाबले के लिए अमेरिका अब अलग-अलग गठबंधन बना रहा है, जैसे कि ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ हाल में बना ऑकस गठबंधन, जो क्वाड के प्रभाव को कम करेगा
वहीं ग्लोबल टाइम्स में 25 सितंबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट में एक यूनिवर्सिटी के विद्वान सन चेंगहाओ लिखते हैं कि "अमेरिका का ध्यान अलग-अलग सहयोगियों के साथ अलग-अलग गठबंधन" बनाने से बिखर गया है, इसका "असर अच्छा नहीं होगा."
उन्होंने अमेरिका से कहा है कि "वो समझ जाए कि उसकी ताकत और दुनिया भर में असर दोनों घट रहे हैं". उनके अनुसार, इसलिए शीतयुद्ध के दौरान सोवियत संघ के साथ बने गठबंधन की तर्ज पर अब अमेरिका "चीन विरोधी गठबंधन नहीं बना सकता".
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