अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय पाकिस्तान अमेरिका को क्यों नापसंद है?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के सत्ता संभालने के बाद से ही पाकिस्तान में उनके एक फ़ोन कॉल का इंतज़ार पिछले कई महीनों से है.

अभी बाइडन की तरफ़ से फ़ोन कॉल तो नहीं आया, लेकिन पाकिस्तान के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री का पैगाम ज़रूर आया है.

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने मंगलवार को वहाँ की फॉरेन रिलेशंस कमेटी को बताया है कि अमेरिका आने वाले दिनों में पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों की समीक्षा करने जा रहा है.

उन्होंने ये भी कहा, "हमें जिस चीज़ पर सबसे ज़्यादा ध्यान देना है, वो ये है कि पाकिस्तान सहित हर देश को अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास वो सब है, जिसकी तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार को आवश्यकता है. वहीं, पाकिस्तान को उन सभी लक्ष्यों पर काम करने और उन अपेक्षाओं को बनाए रखने में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बहुमत के साथ खड़े होने की ज़रूरत है."

एंटनी ब्लिंकन के इस बयान को जानकार आने वाले दिनों में अमेरिका की तरफ़ से पाकिस्तान पर संभावित सख़्ती के तौर देख रहे हैं.

अमेरिका की तरफ़ से ये बयान ऐसे वक़्त में आया है, जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का क़ब्ज़ा और फिर उनकी अंतरिम सरकार के गठन पर पाकिस्तान की छाप पर दुनिया भर में चर्चा हो रही है.

पाकिस्तान पर दख़लअंदाज़ी के आरोप

चर्चा को हवा हर दिन होते नए घटनाक्रम से मिल रही है.

अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के काबिज़ होने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की तरफ़ से 'ग़ुलामी की जंजीरें तोड़ने' वाला बयान आया था.

जब तालिबान का काबुल पर क़ब्ज़ा हुआ, तो जिन देशों के दूतावास वहाँ चल रहे थे, उनमें पाकिस्तान भी शामिल था.

फिर तालिबान के सरकार गठन में देरी क्यों हो रही है, जानकार इसके पीछे की वजहें ही तलाश रहे थे कि ख़बर आई कि आईएसआई के मुखिया काबुल पहुँच चुके हैं.

पंजशीर में तालिबान के ख़िलाफ़ जब विद्रोह चल रहा था, वहाँ भी तालिबान को मदद करने के आरोप पाकिस्तान पर लगे, जिसे उन्होंने सिरे से ख़ारिज किया.

तालिबान की अंतरिम सरकार में मुल्ला बरादर का उप-प्रधानमंत्री बनना और सिराजुद्दीन हक़्क़ानी का गृह मंत्री बनना, जानकारों ने इसे भी पाकिस्तान के हस्तक्षेप के तौर पर भी देखा.

अफ़ग़ानिस्तान की सड़कों पर भी लोग पाकिस्तान के हस्तक्षेप के विरोध में उतरे.

ज़ाहिर है अमेरिका भी तमाम घटनाक्रम पर नज़रे जमाए बैठा था और इस वजह से ब्लिंकन से जब पाकिस्तान के रिश्तों पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने नए सिरे से विचार करने की बात कह दी.

पाकिस्तान के लिए कितनी बड़ी चिंता

पाकिस्तान में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार नदीम रज़ा कहते हैं, "2001 के पाकिस्तान और 2021 के पाकिस्तान में बहुत फ़र्क है. अफ़ग़ानिस्तान में किस देश का क्या किरदार रहा, इस पर सवाल अमेरिका से पूछने की ज़रूरत है. ये पहली बार नहीं हो रहा. 80 के दशक में रूस के अफ़ग़ानिस्तान से जाने के बाद भी अमेरिका ने पाकिस्तान को छोड़ दिया था. जब-जब अमेरिका ने वहाँ से हाथ खींचे हैं, पाकिस्तान में माहौल ख़राब हुआ है. हज़ारों लोग की धमाकों में मौत हुई."

"अमेरिका 20 साल अफ़ग़ानिस्तान में रहा. तालिबान के साथ दोहा में समझौता अमेरिका ने किया. फिर पाकिस्तान पर आरोप क्यों? 2001 में जिस सरकार को अफ़ग़ानिस्तान से निकाला गया, उसी को बाद में सत्ता थाली में रख के देने वाला कौन है?"

"ये अमेरिका का इतिहास रहा है कि काम निकल जाने के बाद वो निगाहें फेर लेता है. लेकिन अब हालात 2001 वाले नहीं है. अब दुनिया में केवल एक या दो शक्तिशाली मुल्क नहीं रहे हैं. अब दुनिया 'मल्टी पोलर' हो गई है."

नदीम रज़ा का इशारा चीन और रूस की तरफ़ है.

मंगलवार को ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की रूस के राष्ट्रपति पुतिन से अफ़ग़ानिस्तान मसले पर चर्चा हुई है. चीन से पाकिस्तान की नज़दीकी तो अब कई सालों से चल ही रही है.

बाइडन प्रशासन में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते

अमेरिका और पाकिस्तान के दोस्ताना रिश्तों में दरार कब से आई, इसके लिए थोड़ा पीछे जाना होगा.

दरअसल 11 सितंबर 2001 में न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए चरमपंथी हमलों के बाद से दुनिया में बहुत कुछ बदला, वहीं पाकिस्तान और अमेरिका के उस वक़्त के रिश्तों पर जमी बर्फ़ पिघल गई.

पाकिस्तान चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध में अमेरिका का बड़ा सहयोगी देश बन गया और बदले में अमेरिकी मदद एक अंतराल के बाद दोबारा पाकिस्तान के लिए बहाल हो गई.

इस दौरान पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य मदद के अलावा चरमपंथ के ख़ात्मे के लिए होने वाले ख़र्च की अदायगी भी की गई.

2018 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के मुताबिक़ 2001 के बाद से अमेरिका ने पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर से ज़्यादा की मदद की. उस वक़्त ट्रंप ने पाकिस्तान पर झूठ बोलने, धोखाधड़ी करने और चरमपंथियों को सुरक्षित पनाहगाह देने के आरोप भी लगाए थे.

ट्रंप के इस बयान के बाद पाकिस्तान को अमेरिका की तरफ़ से दी जाने वाली मदद काफ़ी कम कर दी गई थी.

हालाँकि पाकिस्तान को नए राष्ट्रपति जो बाडइन के साथ संबंध सुधरने की उम्मीद थी, जो राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान उप-राष्ट्रपति थे.

लेकिन बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से उनकी फ़ोन पर भी कोई बातचीत अभी तक नहीं हुई है.

राजनयिक स्तर पर बात यहाँ तक पहुँची कि पाकिस्तान के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र (एनएसए) मोइद युसूफ़ को कहना पड़ा कि ''सिगनल को हम समझ नहीं पा रहे हैं.''

मोइद युसूफ़ इसी साल अगस्त में अमेरिका भी गए थे.

उनसे पहले पाकिस्तान की संसद में बयान देते हुए विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा था कि अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर ड्रोन ऑपरेशंस के लिए पाकिस्तान कोई सैन्य अड्डा या एयर बेस नहीं दे रहा है.

इन तमाम घटनाक्रम के बीच एंटनी ब्लिंकन का बयान, बाइडन प्रशासन के अब तक के रवैए के अनुरूप ही है. ख़बर लिखे जाने तक पाकिस्तान की सरकार की तरफ़ से इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

ब्लिंकन के बयान के मायने

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान पड़ोसी मुल्क है. अफ़ग़ानिस्तान के हालात (अच्छे हों या बुरे) दोनों पाकिस्तान पर असर डालते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार नदीम रज़ा कहते हैं, "पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा कि अफ़ग़ानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता का दौर हो. पहले ही अफ़ग़ानिस्तान के 15 लाख शरणार्थी पाकिस्तान में रह रहे हैं. मौजूदा हालात में ये संख्या दोगुनी हो गई है."

"अमेरिका ज़्यादा से ज़्यादा आईएमएफ़, एफएटीएफ़ या यूएन की तरफ़ से पाकिस्तान पर पाबंदी की तलवार ही लटका सकता है. लेकिन इनमें से कुछ पाबंदियाँ पहले से भी है. अब तक इन पाबंदियों के साथ भी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चल रही है."

नदीम रज़ा, जिस एफएटीएफ़ की बात कर रहे थे, वो दुनिया भर में मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए नीति बनाने वाली संस्था है. इसे फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) कहते हैं.

पाकिस्तान 2008 से ही इसकी 'ग्रे लिस्ट' में है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पाकिस्तान को इस वजह से 45 बिलियन डॉलर का नुक़सान हुआ है.

इस समय पाकिस्तान पर बकाया कुल क़र्ज़ 115 अरब डॉलर से अधिक है.

साल 2020 दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की तरह पाकिस्तान के लिए भी बहुत ख़राब रहा है. पाकिस्तान वर्तमान में 6 अरब डॉलर के आईएमएफ़ कार्यक्रम की शर्तों से जुड़ा हुआ है.

वहाँ महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है. हालाँकि, पाकिस्तान को निर्यात और विदेश से आने वाले डॉलरों से काफ़ी मदद मिली है, लेकिन देश के चालू खाते का घाटा भी एक समस्या है.

पाकिस्तान का 'मेजर नॉन नेटो एलाइड स्टेटस'

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशंस की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. स्वास्ति राव कहती हैं कि एंटनी ब्लिकन के ताज़ा बयान के बाद आशंका इस बात की भी है कि पाकिस्तान को अमेरिका की तरफ़ से दिया गया 'मेजर नॉन नेटो एलाइ स्टेटस' (एमएनएनए) ख़त्म हो सकता है.

अमेरिकी क़ानून के मुताबिक़ ये दर्जा जिस देश को मिलता है, वो रक्षा, व्यापार और सुरक्षा क्षेत्रों में अमेरिका की तरफ़ से मदद का हक़दार होता है.

जिन देशों की दोस्ती को अमेरिका अहम मानता है, उन्हीं देशों को ये दर्ज़ा दिया जाता है.

वर्तमान में अमेरिका ने एमएनएनए का दर्जा 17 देशों को दिया हुआ है, जिनमें अफ़ग़ानिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, जापान समेत पाकिस्तान भी शामिल है.

डॉ. स्वास्ति राव को ये भी लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन के दौरान पाकिस्तान के बढ़ते हस्तक्षेप की वजह से आने वाले समय में पाकिस्तान का एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट से भी बाहर आना मुश्किल हो सकता है.

चीनहै ना

दिल्ली स्थित थिंक टैंक 'ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन' में स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम' के प्रमुख प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत कहते हैं, "ब्लिंकन का बयान सांकेतिक ज़्यादा है. वो पाकिस्तान को बस एक संदेश भेज रहे हैं, साथ ही अमेरिका में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जो ग़ुस्सा है, उसे भी कम करने की कोशिश में हैं."

इस बयान से ये साफ़ नहीं हो रहा कि आने वाले दिनों में अमेरिका पाकिस्तान के ख़िलाफ़ किस तरह के क़दम उठाएगा. लेकिन इतना साफ़ कह दिया कि अफ़ग़ानिस्तान मसले पर भारत और अमेरिका एक ही जैसा सोचते हैं.

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत, ब्लिंकन के इस बयान को इस बात से भी जोड़ते हैं कि अब अमेरिका को पाकिस्तान की ज़रूरत नहीं है और अमेरिका की जगह अब चीन पाकिस्तान के ज़्यादा क़रीब है.

लेकिन वो ये भी कहते हैं कि चीन से बढ़ती दोस्ती के बीच भी पाकिस्तान अमेरिका को नकारने के स्थिति में नहीं है. जिस तरह की आर्थिक मदद अमेरिका से पाकिस्तान को अब तक मिलती आई है, वैसी मदद चीन से कभी नहीं मिलेगी.

इस वजह से पाकिस्तान का आने वाले दिनों में क्या रुख़ होता है, इस पर नज़रें रहेंगी.

ताज़ा बयान के बाद पाकिस्तान की अगली प्रतिक्रिया का इंतज़ार अमेरिका को भी ज़रूर होगा.

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