You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
तालिबान की जीत से क्या पाकिस्तान की अहमियत अचानक बढ़ गई?
- Author, जेम्स लैंडाले
- पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता
एक तरफ़ जहाँ कुछ पश्चिमी ताक़तों को ये लगता है कि वो नई तालिबान हुकूमत को प्रभावित कर सकेंगी तो दूसरी तरफ़ पाकिस्तान से मध्यस्थता की भूमिका निभाने की उम्मीद की जा रही है.
पाकिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान के रिश्ते बहुत ख़ास रहे हैं. दोनों मुल्कों की 1600 मील लंबी सरहद है.
उनके बीच कारोबारी साझेदारी है. सांस्कृतिक, नस्लीय और धार्मिक संपर्क भी हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने कभी दोनों मुल्कों को ऐसा भाई क़रार दिया था, जिन्हें 'अलग नहीं किया जा सकता' है.
लेकिन दुनिया के कुछ मुल्क अब पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते सुधारना चाहते हैं. वैसे इसे लेकर मिली जुली प्रतिक्रियाएं हैं.
'जिहादी चरमपंथ' को लेकर चल रही जंग में पाकिस्तान को किसी भरोसेमंद सहयोगी देश के तौर पर नहीं देखा जाता है.
अमेरिका और दूसरे तमाम मुल्क पाकिस्तान पर तालिबान को मदद और समर्थन देने का इल्ज़ाम लगाते रहे हैं.
हालांकि इस्लामाबाद इन आरोपों से इनकार करता रहा है.
लेकिन इसके बावजूद पश्चिमी देशों के राजदूत तालिबान को इस बात के लिए मनाना चाहते हैं कि वो अपने नागरिकों को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के लिए इजाज़त दे, मानवीय सहायता और मदद को आने दे और नरमी से सरकार चलाए.
और इन सब का मतलब ये है कि उन्हें पाकिस्तान और क्षेत्र के दूसरे देशों से बात करने की ज़रूरत पड़ेगी.
अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान से पाकिस्तान के रिश्ते कैसे हैं?
आलोचक पाकिस्तान पर अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान को लेकर अपनी स्थिति का फ़ायदा उठाने का आरोप लगाते रहे हैं.
सितंबर, 11 के हमलों के बाद पाकिस्तान ने 'चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग' में ख़ुद को अमेरिका के सहयोगी की तरह पेश किया.
इन हमलों की साज़िश अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन पर ही रची गई थी.
लेकिन जब पाकिस्तान खुद को 'चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग' में अमेरिका का दोस्त बता रहा था तो उसी वक़्त उसकी फौज और ख़ुफ़िया एजेंसियों का एक तबका अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय इस्लामी गुटों के साथ रिश्ते बनाकर रखे हुए था.
ऐसा दावा किया जाता है कि ये संबंध कई मौक़ों पर चरमपंथी गुटों को महत्वपूर्ण मदद पहुंचाने के काम में लाए गए.
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में अपनी भागीदारी चाहता है ताकि वो ये सुनिश्चित कर सके कि वहाँ कोई भारत समर्थक सरकार न बन पाए.
लेकिन इस बात को लेकर भी विवाद हैं कि पाकिस्तान तालिबान को किस हद तक और कब तक अपनी मदद देता रहेगा.
लेकिन पिछली बार जब 20 साल पहले अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की हुकूमत थी तो पाकिस्तान उन चुनिंदा देशों में था जिसने औपचारिक रूप से तालिबान हुकूमत को मान्यता दी थी.
पिछले महीने जब तालिबान ने काबुल को अपने नियंत्रण में लिया तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने एलान किया कि 'तालिबान ने ग़ुलामी की बेड़ियां तोड़ डाली' हैं.
पाकिस्तान को किस बात की फ़िक्र है?
तालिबान को पाकिस्तान के ऐतिहासिक समर्थन का मतलब ये नहीं है कि वो काबुल पर उसके नियंत्रण को लेकर पूरी तरह से सहज ही है.
बीते सालों में कई इस्लामी चरमंपथी गुटों ने पाकिस्तान को आतंकी हमलों से बहुत नुक़सान पहुँचाया है और ये हमले सीमा पार अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ से किए गए थे.
काबुल में आने वाली नई सरकार से पाकिस्तान को उम्मीद है कि वो अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट खुरासान जैसे चरमपंथी गुटों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगा.
इसका मतलब हुआ कि पाकिस्तान ये चाहेगा कि तालिबान मज़बूती से सरकार चलाए और अफ़ग़ानिस्तान उस हालत में न पहुँच जाए जहाँ वैसे लोगों को दबदबा हो जिन पर हुकूमत को कोई बस न चले.
पाकिस्तान की दूसरी बड़ी चिंता शरणार्थियों के संकट को लेकर है. पाकिस्तान में पहले से ही 30 लाख अफ़ग़ान शरणार्थी रह रहे हैं और अब वो और अधिक शरणार्थियों को पनाह देने की स्थिति में नहीं है.
ब्रिटेन में पाकिस्तानी उच्चायुक्त मोअज़्ज़म अहमद ख़ान ने बीबीसी को बताया कि "हमारे पास और शरणार्थियों को स्वीकार करने की क्षमता नहीं है और इसीलिए हम ये सुझाव दे रहे हैं और गुजारिश कर रहे हैं कि आइए साथ मिलकर बैठते हैं और किसी अनिष्ट की आशंका को टालने के लिए काम करते हैं."
पश्चिमी देशों के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में क्या बदलेगा?
पश्चिमी देशों के साथ पाकिस्तान के रिश्ते कोई बहुत अच्छे कभी नहीं रहे हैं. राष्ट्रपति बनने के बाद जो बाइडन ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से फ़ोन पर बात करने तक से इनकार कर दिया था.
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल एचआर मैकमास्टर ने इसी हफ़्ते एक सेमीनार में कहा था कि पाकिस्तान ने अगर जिहादी गुटों को समर्थन देना बंद नहीं किया तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उसका बहिष्कार किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "हमें ये दिखावा करना बंद कर देना चाहिए कि पाकिस्तान एक साझेदार देश है. पाकिस्तान हमारे ख़िलाफ़ इन ताक़तों को संगठित करके, उन्हें प्रशिक्षण देकर और दूसरी मदद पहुँचाकर और विदेश नीति के हिस्से के रूप में जिहादी संगठनों का इस्तेमाल करके एक दुश्मन देश की तरह बर्ताव कर रहा है."
लेकिन अमेरिका ने इस नज़रिए के बावजूद दूसरे पश्चिमी देशों का पाकिस्तान के दरवाज़े पर दस्तक देना बंद नहीं हो रहा है. पिछले कुछ दिनों में ब्रिटेन और जर्मनी के विदेश मंत्री इस्लामाबाद के दौरे पर गए हैं. इटली की ओर से भी ऐसी एक यात्रा प्रस्तावित है.
कूटनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है या दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें उम्मीद है कि पाकिस्तान अभी भी तालिबान पर असर रखता है. उन्हें इस बात का डर भी है कि पाकिस्तान को दरकिनार करने का मतलब ये होगा कि अफ़ग़ानिस्तान और चीन की नज़दीकियां और बढ़ जाएं.
हालांकि ये सवाल ज़रूर उठता है कि क्या पाकिस्तान वाक़ई तालिबान पर असर रखता है?
तालिबान की नई हुकूमत के नेता के तौर पर जिन मुल्ला ग़नी बरादर का नाम लिया जा रहा है, वो अतीत में पाकिस्तान की जेल में वक़्त गुजार चुके हैं. वे अपने पुराने जेलर को किस तरह से देखते हैं, इस सवाल का काफी कुछ इसी बात पर निर्भर करेगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)