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चीन यूरोप के एक छोटे से देश की कार्रवाई पर क्यों है भड़का, राजदूत को वापस बुलाया
चीन ने लिथुआनिया से अपने राजदूत को वापस बुला लिया है और लिथुआनिया से कहा है कि वो चीन से अपने राजदूत को वापस बुला ले.
चीन की नाराज़गी ताइवान को लेकर लिथुआनिया के फ़ैसले से है. लिथुआनिया ने अपने यहाँ ताइवान के नाम से एक प्रतिनिधि दफ़्तर खोलने की अनुमति दे दी है.
चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान पर लिथुआनिया के फ़ैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है. विदेश मंत्रालय का कहना है कि चीन के लगातार कहने के बावजूद ऐसा किया है.
बयान में कहा गया है- लिथुआनिया ने चीन के साथ कूटनीतिक संबंधों की भावना का उल्लंघन किया है. लिथुआनिया ने चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को कमतर करने की कोशिश की है. चीन की सरकार इस फ़ैसले का विरोध करती है और अपने राजदूत को वापस बुलाने का फ़ैसला करती है. हम लिथुआनिया से अपने राजदूत को वापस बुलाने की मांग करते हैं.
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि दुनिया में एक ही चीन है और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चायना पूरे चीन का प्रतिनिधित्व करती है. चीन ने ताइवान को भी चेतावनी दी है और कहा है कि ताइवान की आज़ादी की मांग का कोई भविष्य नहीं और इसे लेकर कोई भी अलगाववादी गतिविधियों की कोशिश नाकाम ही होगी.
दरअसल लिथुआनिया को लेकर चीन की नाराज़गी कई महीनों से चल रही है. इस साल मई में लिथुआनिया ने चीन की अगुआई वाले सीईईसी (चीन और मध्य-पूर्वी यूरोपीय देशों के बीच सहयोग) से अलग होने का फ़ैसला किया था. चीन उसी समय से नाराज़ है. 28 लाख से भी कम आबादी वाले लिथुआनिया के इस फ़ैसले को सीधे-सीधे चीन को चुनौती देना माना जा रहा था.
वर्ष 2012 में चीन ने ये सहयोग फ़ोरम बनाया था. इसे 17+1 भी कहा जाता है. लिथुआनिया ने न सिर्फ़ अपने को इस फ़ोरम से अलग किया था, बल्कि बाक़ी सदस्य देशों से भी हटने की अपील की थी.
उस समय चीन ने ये कहा था कि लिथुआनिया के इस फ़ैसले का परियोजना पर कोई असर नहीं पड़ेगा. उस समय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजियान ने कहा था, "चीन-सीईईसी सहयोग चीन और मध्य-पूर्वी यूरोप के देशों की संयुक्त पहल पर स्थापित एक अंतर-क्षेत्रीय सहयोग की व्यवस्था है. यह दोनों के लिए सहयोग और साझा विकास की हमारी आकांक्षा का प्रतीक है. इसे शुरू होने के नौ साल बाद, चीन-सीईईसी सहयोग से अच्छे नतीजे मिले हैं और हिस्सा लेने वाले देशों के लोगों को भी इससे ठोस लाभ मिला है."
कुछ महीने पहले लिथुआनिया की संसद ने चीन को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि चीन में वीगर मुसलमानों के साथ हो रहा व्यवहार जनसंहार और मानवता के ख़िलाफ़ अपराध की श्रेणी में आता है.
इतना ही नहीं ताइवान को लेकर भी लिथुआनिया के फ़ैसले के कारण चीन के विदेश मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जताई थी. लिथुआनिया ने मार्च में ही घोषणा की थी कि वो ताइवान के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए वहाँ व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय खोलेगा. और अब लिथुआनिया ने इसकी अनुमति भी दे दी है.
ताइवान पर चीन की क्या चिंता है
चीन ने ताइवान को हमेशा से ऐसे प्रांत के रूप में देखा है जो उससे अलग हो गया है. चीन मानता रहा है कि भविष्य में ताइवान चीन का हिस्सा बन जाएगा. जबकि ताइवान की एक बड़ी आबादी अपने आपको एक अलग देश के रूप में देखना चाहती है. और यही वजह रही है दोनों के बीच तनाव की.
वर्ष 1642 से 1661 तक ताइवान नीदरलैंड्स की कॉलोनी था. उसके बाद चीन का चिंग राजवंश वर्ष 1683 से 1895 तक ताइवान पर शासन करता रहा. लेकिन साल 1895 में जापान के हाथों चीन की हार के बाद ताइवान, जापान के हिस्से में आ गया.
दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद अमरीका और ब्रिटेन ने तय किया कि ताइवान को उसके सहयोगी और चीन के बड़े राजनेता और मिलिट्री कमांडर चैंग काई शेक को सौंप देना चाहिए.
चैंग की पार्टी का उस वक़्त चीन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण था. लेकिन कुछ सालों बाद चैंग काई शेक की सेनाओं को कम्युनिस्ट सेना से हार का सामना करना पड़ा. तब चैंग और उनके सहयोगी चीन से भागकर ताइवान चले आए और कई वर्षों तक 15 लाख की आबादी वाले ताइवान पर उनका प्रभुत्व रहा.
कई साल तक चीन और ताइवान के बीच बेहद कड़वे संबंध होने के बाद साल 1980 के दशक में दोनों के रिश्ते बेहतर होने शुरू हुए. तब चीन ने 'वन कंट्री टू सिस्टम' के तहत ताइवान के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वो अपने आपको चीन का हिस्सा मान लेता है तो उसे स्वायत्ता प्रदान कर दी जाएगी. ताइवान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
लेकिन चीन वन चायना पॉलिसी के तहत ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और वो नहीं चाहेगा कि कोई देश ताइवान के साथ सीधे व्यापारिक संबंध स्थापित करे.
क्या है सीईईसी
चीन ने वर्ष 2012 में मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ सहयोग बढ़ाने के इरादे से यह फ़ोरम शुरू किया था. लिथुआनिया के हटने के बाद अब इसमें अल्बानिया, बोस्निया एवं हर्जेगोविना, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, ग्रीस, हंगरी, लात्विया, नॉर्थ मेसिडोनिया, मॉन्टेनिग्रो, पोलैंड, रोमानिया, सर्बिया, स्लोवाकिया और स्लोवेनिया शामिल हैं.
वर्ष 2012 में पोलैंड के वारसा में इसका गठन हुआ था. इसके बाद हर साल इसका शिखर सम्मेलन अलग-अलग देशों में होता है. कोरोना के कारण वर्ष 2020 में इसका शिखर सम्मेलन नहीं हुआ था.
व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए चीन की एक और परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भी सीईईसी से बढ़ावा देने की कोशिश रही है.
सीईईसी के तहत सर्बिया का E763 हाईवे प्रोजेक्ट शुरू हुआ. इसके अलावा बुडापेस्ट-बेलग्रेड रेलवे और चीन-यूरोप लैंड-सी एक्सप्रेस लाइन पर भी इसी के तहत काम शुरू हुआ. इसके अलावा भी कई अन्य सदस्य देशों में कई परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं.
चीन के वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक़ वर्ष 2016 में चीन और सीईईसी के बीच व्यापार बढ़कर 58.7 अरब डॉलर का हो गया था. जबकि सदस्य देशों में चीन का निवेश आठ अरब डॉलर से भी ज़्यादा का हो गया था.
कॉपी: पंकज प्रियदर्शी
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