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अर्दोआन बोले- मैं इसराइल के जुल्म के ख़िलाफ़ चुप नहीं रहूंगा
फ़लस्तीनी इलाक़े के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास शुक्रवार को दो दिवसीय दौरे पर तुर्की पहुँचे. अब्बास को तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने आमंत्रित किया था.
तुर्की के सरकारी प्रसारक टीआरटी वर्ल्ड के अनुसार मोहम्मद अब्बास से मुलाक़ात के दौरान राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा कि तुर्की इसराइली 'जुल्म के ख़िलाफ़ न चुप रहा है और न चुप रहेगा.'
दोनों नेताओं की मुलाक़ात इस्तांबुल में हुई. टीआरटी के अनुसार दोनों राष्ट्रपतियों की मुलाक़ात बंद कमरे में हुई.
तुर्की के कम्युनिकेशन डायरेक्टरेट ने कहा कि दोनों राष्ट्रपतियों के बीच द्विपक्षीय संबधों को मज़बूत बनाने पर बात हुई है. अर्दोआन ने कहा कि इस इलाक़े में स्थिरता और शांति तब तक कायम नहीं हो सकती है जब तक इसराइल कब्जे वाली नीति को बंद नहीं करता है.
मई महीने में इसराइल की बिन्यामिन नेतन्याहू सरकार ने ग़ज़ा में जब हमास के ख़िलाफ़ हमले शुरू किए थे तो तुर्की सबसे ज़्यादा आक्रामक था. अर्दोआन ने इसराइल के ख़िलाफ़ सभी मुस्लिम देशों से एकजुट होने की अपील की थी. हालांकि तब इसराइल ने तुर्की की प्रतिक्रिया पर जवाब तक नहीं दिया था.
नेतन्याहू बनाम अर्दोआन
इसराइल की पूर्ववर्ती नेतन्याहू सरकार के साथ तुर्की की अर्दोआन सरकार की कड़वाहट कई बार सार्वजनिक हुई है. अर्दोआन ने 15 मई 2018 को एक ट्वीट कर कहा था, ''नेतन्याहू एक नस्लभेदी देश के प्रधानमंत्री हैं, जिसने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का उल्लंघन करते हुए असहाय लोगों की ज़मीन पर 60 सालों से कब्ज़ा जमाए हुए है. नेतन्याहू के हाथ फ़लस्तीनियों के ख़ून से रंगे हैं. वे अपने अपराध को तुर्की पर हमला कर नहीं छुपा सकते हैं.''
अर्दोआन की टिप्पणी का जवाब नेतन्याहू ने उसी दिन ट्वीट कर दिया था. नेतन्याहू ने अपने ट्वीट में लिखा था, ''अर्दोआन हमास के बड़े समर्थकों में से एक हैं और इसमें कोई शक नहीं है कि वे आतंकवाद और जनसंहार को अच्छी तरह समझते हैं. मैं उन्हें सलाह देता हूँ कि नैतिकता का पाठ न पढ़ाएं.''
नेतन्याहू के 12 सालों के शासनकाल में तुर्की से कई बार टकराव की स्थिति बनी. इसकी शुरुआत 2010 के मावी मारमारा से होती है. 2010 के मई महीने में मावी मारमारा पोत फ़लस्तीनी समर्थकों के लिए सामान लेकर जा रहा था. इसी दौरान इसराइली कमांडो ने रेड मार दी थी. यह पोत ग़ज़ा के लिए जा रहा था और इसराइली कमांडो ने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में हमला बोला था. इस हमले में तुर्की के नौ लोगों की जान गई थी. तब से ही अर्दोआन और इसराइल के रिश्तों में दरार आई जो अब तक नहीं भरी है.
इस घटना को लेकर अमेरिका की ओबामा सरकार बहुत ख़फ़ा हुई थी. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नेतन्याहू को अर्दोआन से माफ़ी मांगने के लिए कहा था और नेतन्याहू को ऐसा करना पड़ा था.
मार्च 2013 में नेतन्याहू ने तेल अवीव के एयरपोर्ट से ही अर्दोआन को फ़ोन कर माफ़ी मांगी थी. तब ओबामा भी नेतन्याहू के साथ ही बैठे थे. कई जानकार ये दावा भी करते हैं कि फ़ोन के दौरान एक बार ओबामा ने टोका भी था.
प्रथम विश्व युद्ध के पहले फ़लस्तीन ऑटोमन साम्राज्य का एक इलाक़ा था. ऐसे में अर्दोआन के बढ़-चढ़कर बोलने की एक ऐतिहासिक वजह यह भी है.
तुर्की और इसराइल के संबंध
तुर्की इसराइल का मान्यता देने वाला पहला मुस्लिम बहुत देश था. तुर्की की ओर से फ़लस्तीनियों के समर्थन के कई विरोधाभास भी हैं. सऊदी अरब का इसराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं है जबकि तुर्की का है. हालांकि 2018 से तुर्की का इसराइल में कोई राजदूत नहीं है.
पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने खाड़ी के देशों पर इसराइल से राजनयिक संबंध कायम करने का दबाव डाला था. इसके नतीजे भी सामने आए थे.
यूएई और बहरीन ने इसराइल से राजनयिक रिश्ते कायम कर लिए थे. इनके बाद सूडान और मोरक्को ने भी इसराइल से राजनयिक संबंध कायम करने का फ़ैसला किया था. सूडान और मोरक्को भी मु्स्लिम बहुल देश हैं.
ऐसा ही दबाव सऊदी अरब पर भी था. लेकिन सऊदी अरब ने ऐसा नहीं किया और कहा कि जब तक फ़लस्तीन 1967 की सीमा के तहत एक स्वतंत्र मुल्क नहीं बन जाता है तब तक इसराइल से औपचारिक रिश्ता कायम नहीं करेगा. सऊदी अरब पूर्वी यरुशलम को फ़लस्तीन की राजधानी बनाने की भी मांग करता है.
तुर्की यूएई और बहरीन की आलोचना कर रहा था कि इन्होंने इसराइल से राजनयिक संबंध क्यों कायम किए. ऐसा तब है जब तुर्की के राजनयिक संबंध इसराइल से हैं. तुर्की और इसराइल में 1949 से ही राजनयिक संबंध हैं.
यहाँ तक कि 2005 में अर्दोआन कारोबारियों के एक बड़े समूह के साथ दो दिवसीय दौरे पर इसराइल गए थे. इस दौरे में उन्होंने तत्कालीन इसराइली पीएम एरिएल शरोन से मुलाक़ात की थी और कहा था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से न केवल इसराइल को ख़तरा है बल्कि पूरी दुनिया को है. 2019 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6 अरब डॉलर से ज़्यादा का था.
यूएन में तुर्की जमकर बरसा
मई महीने में 11 दिनों तक हमास के ख़िलाफ़ ग़ज़ा में इसराइली कार्रवाई का तुर्की संयुक्त राष्ट्र में कड़ा विरोध किया था.
तुर्की के विदेश मंत्री ने कहा था, ''तुर्की फ़लस्तीनियों को समर्थन देना जारी रखेगा. फ़लस्तीनियों के साथ अन्याय सालों से हो रहा है. तुर्की क्रूरता के सामने ख़ामोश नहीं रह सकता है. जो चुप हैं वो अन्याय का साथ दे रहे हैं. ग़ज़ा में न केवल ऊंची इमारतों को इसराइल ने निशाने पर लिया है बल्कि स्कूलों और अस्पतालों को भी नहीं छोड़ा है. इस तरह की आक्रामकता युद्ध अपराध के अंतर्गत आती है. यरुशलम, ग़ज़ा और वेस्ट बैंक में जो कुछ भी हुआ है, उसके लिए केवल और केवल इसराइल ज़िम्मेदार है.''
तुर्की के विदेश मंत्री ने कहा कि इसराइल के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एकजुट होना होगा. तुर्की ने कहा, ''यह दुर्भाग्य है कि एक बार फिर से सुरक्षा परिषद की नाकामी इसराइल के मामले में सामने आई है. इसलिए हमारे राष्ट्रपति अर्दोआन कहते हैं कि दुनिया पाँच देशों के दायरे से बड़ा है.''
अर्दोआन सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य देश अमेरिका, चीन, फ़्रांस, ब्रिटेन और रूस की आलोचना में ये बात कहते हैं.
कॉपी-रजनीश कुमार
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