'चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग' के तरीक़े क्या अब बदल चुके हैं?

    • Author, फ्रैंक गार्डनर
    • पदनाम, बीबीसी सुरक्षा संवाददाता

पश्चिमी देशों की सेनाएं इस महीने लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के लिए एक दूसरे से होड़ कर रही हैं.

उधर, फ्रांस ने भी ये संकेत दिया है कि वो माली में तैनात अपने सैनिकों की संख्या में बड़े पैमाने पर कटौती करने वाला है. दूसरी तरफ, इराक़ में ब्रिटेन और पश्चिमी देशों की सेनाओं की अब कोई बड़ी रणनीतिक भूमिका नहीं बची है.

बीस साल पहले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने चरमपंथ के ख़िलाफ़ जिस कथित लड़ाई का एलान किया था, उसमें दूरदराज के संघर्ष प्रभावित इलाकों में बड़ी संख्या में जमीन पर सैनिकों को तैनात किया गया था.

बीस साल बाद अब ये लग रहा है कि वो दौर खत्म होने जा रहा है. लेकिन अभी इसमें देर लगेगी. अफ़्रीका के साहेल क्षेत्र में सक्रिय जिहादी गुटों के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले पश्चिमी ताकतों की आज भी भारी मौजूदगी है.

लेकिन हां, एक बदलाव देखने में आ रहा है. इन सैनिक अभियानों को किस तरह से चलाया जाए, इस पर पश्चिमी देश नए सिरे से सोच रहे हैं. बड़े पैमाने पर और लंबे समय के लिए सैनिकों की तैनाती के अपने जोखिम हैं. पैसे के लिहाज से भी ये खर्चीला रास्ता है.

कमज़ोर कड़ी

पश्चिमी देशों को इन अभियानों में मरने वाले सैनिकों के लिए अपने यहां जवाब देना पड़ता है. इनकी सरकारों को युद्ध के नफा-नुकसान को लेकर राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ती है.

अफगानिस्तान में अमेरिका की अगुवाई में जो सैनिक अभियान चलाया जा रहा है उसमें एक ट्रिलियन डॉलर (274 अरब पाउंड) से ज्यादा खर्च हो चुका है. हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं.

मरने वालों में अफगानिस्तान के सैनिक, आम अफगान लोग, पश्चिमी देशों के सैनिक और उनके चरमपंथी दुश्मन सब शामिल हैं. साल 2010 में जब ये सैनिक अभियान अपने चरम पर था तो उस वक्त पश्चिमी देशों के सैनिकों की संख्या एक लाख पार कर गई थी.

बीस साल बाद अब ये संख्या कुछ हजार में सिमट कर रह गई है और जो बचे हैं, वे भी अफगानिस्तान छोड़कर जा रहे हैं. जाहिर है कि तालिबान को इसी घड़ी का इंतजार था ताकि वो ज्यादा से ज्यादा इलाकों को अपनी दखल में ले सके.

जब कोई देश किसी चरमपंथ प्रभावित क्षेत्र में लंबे समय के लिए बड़े पैमाने पर सैनिकों की तैनाती करता है तो उसके लिए खतरा बढ़ता चला जाता है क्योंकि कई मामलों में उसकी कमजोरियां उजागर होने लगती हैं.

वियतनाम से लेकर यमन तक

इसमें जो बात होकर रहती है, वो है चरमपंथ के खिलाफ लड़ाई में जान गंवाने वाले सैनिकों की संख्या का बढ़ते जाना. घरेलू मोर्चे पर पश्चिमी देशों की सरकारों के लिए इसका जवाब देना मुश्किल होने लगता है.

वियतनाम की लड़ाई में 58 हजार से भी ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की जान गई थी. अफगानिस्तान में सोवियत संघ के 15 हजार के करीब सैनिक मारे गए थे. यही वजह थी कि इन देशों को अपना सैनिक अभियान खत्म करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

फ्रांस की फौज माली में साल 2013 से तैनात है. माली में उसके 50 से ज्यादा सैनिकों की जान जा चुकी है. घरेलू राजनीति में इस फैसले के समर्थकों की संख्या लगभग न के बराबर है. इसके बाद बात आती है खर्च होने वाले पैसे पर.

सैनिकों की तैनाती के वक्त जो उम्मीदें की जाती हैं, पता चलता है कि कहीं ज्यादा पैसा खर्च हो चुका है. साल 2015 में सऊदी अरब ने जब यमन के गृह युद्ध में दखल देने का फैसला किया था, तो उसे उम्मीद नहीं थी कि छह साल बाद भी ये लड़ाई चलती रहेगी.

ये अनुमान लगाया जाता है कि यमन की लड़ाई में सऊदी अरब के खजाने से 100 अरब डॉलर निकल चुके हैं. फिर एक मुद्दा आता है मानवाधिकारों के हनन का, इस वजह से कई सैनिक अभियानों की छवि ऐसे वक्त में खराब हो गई जब इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी.

मानवाधिकार हनन का मु्द्दा

अफगानिस्तान में हो रही शादियों पर अमेरिकी हवाई हमले, यमन में सऊदी अरब के हवाई हमलों में आम लोगों की मौत और संयुक्त अरब अमीरात के सहयोगियों द्वारा मानवाधिकार हनन, ये वो घटनाएं थीं जो इन देशों के लिए शर्मिंदगी का सबब बनीं.

संयुक्त अरब अमीरात के मामले में कई खौफनाक कहानियां सुनी गईं. एक घटना में शिपिंग कंटेनर में कैदियों की दम घुटने से मौत हो गई. माना जाता है कि इस वाकये के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने खुद को यमन की लड़ाई से अलग कर लिया था.

एक संभावना ये भी होती है कि मेजबान सरकार ही सहयोग देना बंद कर दे. माली से ऐसी रिपोर्टें मिल रही हैं कि वहां की सरकार गुपचुप तरीके से जिहादी गुटों के साथ बातचीत कर रही है. ये वजह काफी थी कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने फ्रांसीसी सैनिकों को वापस बुलाने की धमकी दे दी.

इराक को लेकर रिटायर्ड ब्रिटिश कर्नल जेम्स कनलिफ कहते हैं, "ईरान के असर को लेकर वास्तव में चिंता का माहौल है, खासकर जब शिया चरमपंथी गुटों की बात होती है तो ये चिंता बढ़ जाती है."

अफगानिस्तान में साल 2001 में सत्ता से बेदखल कर दिए गए तालिबान को लेकर ये उम्मीद की जा रही है कि उनकी वापसी होने वाली है. पश्चिमी देशों के सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि अगर तालिबान को सत्ता में हिस्सेदारी मिली तो वे खुफिया जानकारी शेयर को लेकर अपना सहयोग रोक देंगे.

आसान जवाब नहीं है

ये बात स्पष्ट है कि नाकाम हो चुके देशों और उनके खतरनाक तानाशाहों की समस्या का कोई आसान जवाब नहीं है. आइए हाल के कुछ उदाहरणों पर गौर करते हैं.

इराक, साल 2003-मौजूदा समय: ब्रिटेन के समर्थन से अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सैनिक कार्रवाई शुरू की. सालों संघर्ष चला, खून-खराबा हुआ. तमाम कामयाबी के बावजूद ये अनुभव इतना डरावना रहा कि किसी राजनेता को मध्य पूर्व में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाने का फैसला करने में पीढ़ियों लग जाएंगे, या शायद इससे भी ज्यादा.

लीबिया, साल 2011-मौजूदा समय: नेटो ने लीबिया के आसमान को नो फ्लाई जोन घोषित कर दिया था लेकिन जमीन पर पश्चिमी देशों ने बड़ी संख्या में सैनिक नहीं उतारे. लेकिन ये कार्रवाई काफी थी कि गद्दाफी विरोधी विद्रोही साल 2011 में उन्हें सत्ता से बेदखल करने में कामयाब हो गए.

लेकिन इसके बाद लीबिया में गृह युद्ध और चरमपंथ शुरू हो गया. शुरू में लीबिया के जो लोग पश्चिमी देशों के प्रति अपना आभार जता रहे थे, बाद में पश्चिमी देशों की बेरुखी को लेकर नाराज हो गए.

सीरिया, साल 2011-मौजूदा समय: सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद की सरकार के खिलाफ विद्रोहियों की लड़ाई में पश्चिमी ताकतों ने अभी तक परहेज दिखाया है. बड़ी ताकतों में यहां केवल रूस, ईरान और तुर्की का दखल है. दस साल हो गए, सीरिया में आज भी हिंसा जारी है.

इस्लामिक स्टेट गुट, साल 2014-19: खुद को 'इस्लामिक स्टेट' कहने वाले चरमपंथी संगठन के बर्बर शासन को खत्म करने के लिए 80 देशों को गठबंधन बनाकर लड़ना पड़ा. इसमें कोई संदेह नहीं कि ये सैनिक दृष्टि से एक कामयाबी थी.

लेकिन इस लड़ाई में पश्चिमी देशों के सैनिक गठबंधन को पांच साल लग गए. जीत के लिए उन्हें विध्वंसक हवाई ताकत का इस्तेमाल करना पड़ा. इराक में सक्रिय ईरान समर्थित शिया चरमपंथी गुटों से हाथ मिलाना पड़ा. इस्लामिक स्टेट अब अफ्रीका में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है.

माली, साल 2013-मौजूदा समय: फ्रांस की सेना ने जब शुरुआत में यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई तो राजधानी बामाको पर अल कायदा से जुड़े जिहादी गुटों का कब्जा होने वाला ही था. लेकिन फ्रांस की मदद से राजधानी बामाको को बचा लिया गया. अब आठ साल हो गए.

माली में कई देशों के सैनिक मौजूद हैं लेकिन इसके बावजूद चरमपंथ पर काबू नहीं पाया जा सका है. फ्रांस के राष्ट्रपति ने माली की सरकार के कामकाज पर असंतोष के संकेत दिए हैं. ऐसा माना जा रहा है कि फ्रांस माली से अपने सैनिकों को वापस बुला सकता है.

भविष्य क्या है?

अगर ये मान लें कि बड़े स्तर पर सैनिकों की तैनाती अब लंबे समय के लिए नहीं होने वाली है तो फिर सवाल उठता है कि इसका विकल्प क्या है? रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट के एक कॉन्फ्रेंस में ब्रिटेन के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ सर मार्क कार्लटन स्मिथ के दो जून को दिए भाषण में इस सवाल का जवाब खोजा जा सकता है.

उन्होंने कहा, "आज की सेना पहले की तुलना में अधिक संगठित और सैन्य अभियानों में ज्यादा अनुभवी है. उसे जल्दी से कहीं तैनात किया जा सकता है. वो आधुनिक तकनीक से लैस है. सैनिक तक सैटेलाइट से कनेक्टेड हैं. विशेष अभियानों के लिए प्रशिक्षित है."

जमीन पर कम संख्या में सैनिकों की तैनाती का ये भी मतलब है कि आधुनिक तकनीकों पर निर्भरता बढ़ेगी. इसमें आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल होगा. हाल में हुए संघर्षों में इसके संकेत पढ़े जा सकते हैं.

अजरबैजान और आर्मीनिया की लड़ाई में सस्ते, मानवरहित और सशस्त्र ड्रोन्स का जिस तरह से इस्तेमाल किया गया, वो काफी कुछ कहता है. भाड़े के जिन सैनिकों का इस्तेमाल बीते जमाने में अफ्रीका के संघर्ष प्रभावित इलाकों में किया गया, लगता है कि वे वापस लौट आए हैं.

लीबिया से पश्चिमी अफ्रीका और मोजाम्बिक तक भाड़े के सैनिकों की उपस्थिति देखी गई और रूस जैसे देशों पर इनके इस्तेमाल का आरोप लगा. जाहिर है कि इन सैनिकों से रिश्तों की बात कभी भी सुविधानुसार खारिज की जा सकती है.

वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक 'अटलांटिक काउंसिल' के सीनियर फेलो डॉक्टर सीन मैकफेट का कहना है कि "राष्ट्र केंद्रित विश्व व्यवस्था में अब लड़ाइयां बिना झंडा लहराए लड़ी जा रही हैं."

लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि समंदर पार सेना भेजने का चलन खत्म हो जाएगा. माली और साहेल में भले ही फ्रांस अपने सैनिकों की संख्या में कटौती कर दे लेकिन वहां संयुक्त राष्ट्र का मिशन जारी रहेगा.

इराक में नेटो स्थानीय सैनिकों को ट्रेनिंग और तकनीकी मदद दे रहा है. अफगानिस्तान से भले ही पश्चिमी देश विदा ले लें लेकिन आने वाले समय में यहां उसे तालिबान, अल कायदा और इस्लामिक स्टेट के संयुक्त खतरे का सामना करना पड़ सकता है.

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