यरुशलम में यहूदियों के मार्च पर क्यों है विवाद: नेतन्याहू ने दी अनुमति, हमास नाराज़

इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच पिछले महीने 11 दिनों की लड़ाई के बाद संघर्षविराम हो गया है मगर अब एक और वजह से दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है.

इसराइल में बिन्यामिन नेतन्याहू सरकार ने धार्मिक राष्ट्रवादियों के मुस्लिम इलाक़ों से होकर गुज़रने वाले एक मार्च यानी जुलूस को अनुमति दे दी है.

ग़ज़ा का नियंत्रण करने वाले फ़लस्तीनी चरमपंथी गुट हमास ने धमकी दी है कि अगर मार्च निकलता है तो आगे टकराव होगा.

ये मार्च गुरुवार नौ जून को होना था लेकिन सुरक्षा कारणों से पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी. अब यह मार्च अगले सप्ताह मंगलवार को निकाला जाएगा.

अधिकारियों ने कहा है कि वो कुछ शर्तों के साथ मार्च की अनुमति दे रहे हैं.

वैसे तो इस मार्च का आयोजन महीने भर पहले ही होना था लेकिन संघर्ष के कारण इसे टाल दिया गया था.

बीते महीने इसराइल और ग़ज़ा के बीच 11 दिनों तक चले संघर्ष में कम से कम 242 फ़लस्तीनियों की और इसराइल में 13 लोगों की मौत हुई थी.

हालाँकि, मार्च निकलने के बारे में अंतिम फ़ैसला इसराइल की नई सरकार को करना होगा.

इसराइल में नेतन्याहू सरकार के मार्च में हुए चुनाव में बहुमत नहीं जुटा पाने और इसके बाद गठबंधन बनाने के प्रयासों में नाकाम रहने के बाद वहाँ विपक्षी दलों का गठबंधन सरकार बनाने जा रहा है.

रविवार को विश्वास मत पर मतदान के बाद अगर धुर-दक्षिणपंथी नेता नेफ़्टाली बेनेट और मध्यमार्गी येर लेपिड की आठ पार्टियों की सरकार बनती है तो उसे दो दिन बाद होने वाले यरुशलम मार्च पर अंतिम फ़ैसला लेना होगा.

यरुशलम मार्च को लेकर विवाद क्यों?

इस साल का यरुशलम दिवस रमज़ान महीने के आख़िरी दिनों में यानी 10 मई को मनाया जाना था जो ग़ज़ा संघर्ष के कारण नहीं निकाला जा सका.

सालों से इसराइल और फ़लस्तीनियों की आलोचना करने वाले मानते रहे हैं कि मार्च का ये रूट भड़काने वाला है. मार्च से पहले स्थानीय अरब लोगों के अपनी दुकानें बंद करनी पड़ती हैं ताकि मार्च के दौरान किसी तरह के विवाद को रोका जा सके.

यहूदी इस रूट में किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते. लेकिन फ़लस्तीनी इसका विरोध में करते हैं.

द टाइम्स ऑफ़ इसराइल के अनुसार रविवार को फ़लस्तीनी फतेह पार्टी के नेता अपने कार्यकर्ताओं से यरुशलम, "मुसलमानों और ईसाईयों की पवित्र जगह को बाहर से आकर बसे लोगों से बचाने के लिए एकजुट" होने को कहा.

यरुशलम दिवस के दिन हर साल इसराइलियों और फ़लस्तीनियों में विवाद होता है और अमूमन हर साल थोड़ी बहुत हिंसा भी होती है.

क्यों अहम है यरुशलम दिवस?

5 जून 1967 को अरब-इसराइल के बीच छह दिनों का युद्ध हुआ था जिसके बाद उसने पूर्वी यरुशलम पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

इस युद्ध के लिए इसराइल ने पहले से काफी तैयारी की थी. वो परमाणु हथियार हासिल करने के क़रीब पहुंच गया था और उसने फ़्रांस से विमान और ब्रिटेन से टैंक हासिल किए थे.

युद्ध के पांच दिनों में इसराइल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया की सेनाओं को उखाड़ फेंका. उसने मिस्र से गज़ा पट्टी और सिनाई, सीरिया से गोलन पहाड़ियों और जॉर्डन से वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम के इलाक़े छीन लिए.

इस युद्ध के बाद दो हज़ार साल में पहली बार यहूदियों के पवित्र स्थान यरूशलम पर यहूदियों का कब्ज़ा हुआ था. इसके बाद इसराइल ने पूरे शहर को अपनी राजधानी माना और यहां से फ़लस्तीनियों को बड़े पैमाने पर यहां से बेदखल होना पड़ा.

इसी दिन की याद में यहूदी हर साल यरुशलम दिवस के तौर पर मनाते हैं. हिब्रू कैलेंडर के अनुसार ये दिन अय्यार कैलेंडर के 28वें दिन पर पड़ता है. यहूदी मानते हैं कि इस दिन पश्चिमी यरुशलम और पूर्वी यरुशलम एक हो गए थे.

इस दिन हज़ारों की संख्या में इसराइली युवा झंडा मार्च (फ्लैग मार्च) निकालते हैं. वो हाथों में झंडे लिए राष्ट्रवादी गीत गाते हुए दमिश्क गेट से दाख़िल होते हैं और यरुशलम की पुरानी गलियों से होते हुए वेस्टर्न वॉल तक पहुंचते हैं.

इस सालाना मार्च में हज़ारों यहूदी यरुशलम के मुसलमान बहुल इलाक़ों से होते हुए वेस्टर्न वॉल की तरफ जाते हैं. वेस्टर्न वॉल यहूदियों की सबसे पवित्र मानी जाने वाले माउंट मंदिर की दीवार है. यहूदी मानते हैं कि यह मंदिर उस पवित्र पत्थर (डोम ऑफ़ रॉक) की जगह है जहां से दुनिया की शुरुआत हुई थी

अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार ये तारीख़ हर साल बदलती है. इस साल यरुशलम दिवस 10 मई को मनाया जाना था.

पूर्वी यरुशलम पर कब्ज़ा करने के बाद साल 1980 में इसराइल ने यरुशलम क़ानून पारित कर दोनों जगहों के एक होने को क़ानूनी तौर पर वैध बनाया.

हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसका समर्थन नहीं करता. फ़लस्तीनी पूर्वी यरुशलम को भविष्य के एक आज़ाद मुल्क की राजधानी के तौर पर देखते हैं.

यरुशलम क्यों है दुनिया का सबसे विवादित स्थल?

यरुशलम इसराइल-अरब तनाव में सबसे विवादित मुद्दा भी है. ये शहर इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्मों में बेहद अहम स्थान रखता है.

पैगंबर इब्राहीम को अपने इतिहास से जोड़ने वाले ये तीनों ही धर्म यरुशलम को अपना पवित्र स्थान मानते हैं.

यही वजह है कि सदियों से मुसलमानों, यहूदियों और ईसाइयों के दिल में इस शहर का नाम बसता रहा है. हिब्रू भाषा में येरूशलायीम और अरबी में अल-कुद्स के नाम से जाना जाने वाला ये शहर दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक है.

शहर के केंद्र में एक प्राचीन शहर है जिसे ओल्ड सिटी कहा जाता है. संकरी गलियों और ऐतिहासिक वास्तुकला की भूलभुलैया इसके चार इलाक़ों- ईसाई, इस्लामी, यहूदी और अर्मेनियाईं- को परिभाषित करती हैं.

इसके चारों ओर एक किलेनुमा सुरक्षा दीवार है जिसके आसपास दुनिया के सबसे पवित्र स्थान स्थित हैं. हर इलाक़े की अपनी आबादी है.

ईसाइयों के दो इलाक़े हैं क्योंकि आर्मीनियाई भी ईसाई ही होते हैं. चारों इलाक़ों में सबसे पुराना इलाक़ा आर्मीनियाइयों का ही है. ये दुनिया में आर्मीनियाइयों का सबसे प्राचीन केंद्र भी है. सेंट जेंम्स चर्च और मोनेस्ट्री में आर्मीनियाइ समुदाय ने अपना इतिहास और संस्कृति सुरक्षित रखी है.

चर्च की कहानी

ईसाई इलाक़े में 'द चर्च आफ़ द होली सेपल्कर' है. ये दुनियाभर के ईसाईयों की आस्था का केंद्र है. ये जिस स्थान पर स्थित है वो ईसा मसीह की कहानी का केंद्रबिंदु है.

यहीं ईसा मसीह की मौत हुई थी, उन्हें सूली पर चढ़ाया गया था और यहीं से वो अवतरित हुए थे. दातर ईसाई परंपराओं के मुताबिक, ईसा मसीह को यहीं 'गोलगोथा' पर सूली पर चढ़ाया गया था.

इसे ही हिल ऑफ़ द केलवेरी कहा जाता है. ईसा मसीह का मक़बरा सेपल्कर के भीतर ही है और माना जाता है कि यहीं से वो अवतरित भी हुए थे.

इस चर्च का प्रबंधन ईसाई समुदाय के विभिन्न संप्रदायों, ख़ासकर ग्रीक ऑर्थोडॉक्स पैट्रियार्केट, रोमन कैथोलिक चर्च के फ्रांसिस्कन फ्रायर्स और अर्मेनियाई पैट्रियार्केट के अलावा इथियोपियाई, कॉप्टिक और सीरियाई ऑर्थोडॉक्स चर्च से जुड़े पादरी भी संभालते हैं.

मस्जिद की कहानी

मुसलमानों का इलाक़ा चारों इलाक़ों में सबसे बड़ा है और यहीं पर डोम ऑफ़ द रॉक और मस्जिद अल अक़्सा स्थित है. यह एक पठार पर स्थित है जिसे मुस्लिम हरम अल शरीफ़ या पवित्र स्थान कहते हैं.

मस्जिद अल अक़्सा इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थल है.

मुसलमानों का विश्वास है कि पैगंबर मोहम्मद ने मक्का से यहां तक एक रात में यात्रा की थी और यहां पैगंबरों की आत्माओं के साथ चर्चा की थी. यहां से कुछ क़दम दूर ही डोम ऑफ़ द रॉक्स का पवित्र स्थल है यहीं पवित्र पत्थर भी है. मान्यता है कि पैगंबर मोहम्मद ने यहीं से जन्नत की यात्रा की थी.

यहूदियों की पवित्र दीवार

यहूदी इलाक़े में ही कोटेल या पश्चिमी दीवार है. ये वॉल ऑफ़ दा माउंट का बचा हिस्सा है. माना जाता है कि कभी यहूदियों का पवित्र मंदिर इसी स्थान पर था.

इस पवित्र स्थल के भीतर ही द होली ऑफ़ द होलीज़ या यूहूदियों का सबसे पवित्र स्थान था.

यहूदियों का विश्वास है कि यही वो स्थान है जहां से विश्व का निर्माण हुआ और यहीं पर पैगंबर इब्राहिम ने अपने बेटे इश्हाक की बलि देने की तैयारी की थी. कई यहूदियों का मानना है कि वास्वत में डोम ऑफ़ द रॉक ही होली ऑफ़ द होलीज़ है.

आज पश्चिमी दीवार वो सबसे नज़दीक स्थान है जहां से यहूदी होली ऑफ़ द होलीज़ की अराधना कर सकते हैं.

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