मोहम्मद अज़ीज़: अपने देश को मलेरिया मुक्त करने वाले भुला दिए गए एक नायक

मोहम्मद अज़ीज़

इमेज स्रोत, THE CYPRUS REVIEW

    • Author, तबीथा मॉर्गन
    • पदनाम, साइप्रस से जुड़े मामलों की विश्लेषक

उन्होंने उन्हें महान मुक्तिदाता कहा. उनका नाम मोहम्मद अज़ीज़ था. साइप्रस की पिछली सदी की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक के पीछे उनका हाथ था. फिर भी साइप्रस के मुट्ठी भर लोगों के अलावा उन्हें कोई और नहीं जानता.

अज़ीज़ साइप्रस में तुर्की मूल के एक स्वास्थ्य अधिकारी थे, जिन्होंने ये सुनिश्चित किया कि साइप्रस मलेरिया को पूरी तरह मिटाने वाला दुनिया का पहला देश बन जाए.

अपने देशवासियों में 'द फ़्लाई मैन' के नाम से मशहूर अज़ीज़ ने नोबेल पुरस्कार विजेता मलेरिया विशेषज्ञ सर डोनाल्ड रॉस के अधीन अध्ययन किया. रॉस ने ही मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के प्रकार की खोज की थी.

ब्रिटेन के उपनिवेश रहे साइप्रस के बारे में एक किताब के शोध के दौरान मुझे संयोगवश अज़ीज़ की कहानी का पता चला.

वर्ष 1936 तक साइप्रस दुनिया के ऐसे देशों में शुमार था, जहाँ दुनिया के सबसे ज़्यादा मलेरिया के मामले सामने आते थे. उस समय साइप्रस ब्रिटेन का उपनिवेश था और हर साल यहाँ मलेरिया के क़रीब 18000 मामले सामने आते थे.

ये बीमारी ख़ासतौर पर बच्चों के लिए काफ़ी ख़तरनाक थी. अपने बचपन के दिनों की याद करते हुए एक बुजुर्ग व्यक्ति ने बताया कि इस बीमारी के कारण कई बच्चों को जान गँवानी पड़ी. कई बच्चे इस बीमारी की चपेट में आने के कारण बच तो गए, लेकिन वे दिन का एक काम भी नहीं कर पाते थे.

सैनिक स्टाइल वाला अभियान

सर रोनाल्ड रॉस

इमेज स्रोत, Getty Images

10 साल बाद मुख्य स्वास्थ्य निरीक्षक के रूप में काम करते हुए अज़ीज़ को कोलोनियल डेवेलपमेंट फ़ंड से मदद मिली. इस फंड का मक़सद था मलेरिया फैलाने वाले एनोफिलीज़ मच्छरों से साइप्रस को मुक्ति दिलाना.

उन्होंने सैनिकों के काम करने के तर्ज़ पर अपने अभियान की योजना बनाई. उन्होंने पूरे द्वीप को 500 ग्रिड्स में बाँटा, जिनमें से हरेक की निगरानी 12 दिनों तक एक व्यक्ति को करनी थी.

उनकी टीम ने ग्रिड योजना के मुताबिक़ व्यवस्थित तरीक़े से काम किया. इसके तहत हर मीटर पर पानी के सभी स्रोतों पर डीडीटी का छिड़काव किया गया. इनमें पीने वाले पानी के कुएँ भी शामिल थे.

अज़ीज़ की टीम ने कम से कम कीटनाशकों का उपयोग करने के लिए अलग तकनीक अपनाई. उन्होंने मच्छरों के लार्वा को अंडे सेने से रोकने के लिए पानी की सतह पर पेट्रोलियम की एक बहुत पतली परत डाली.

इस नक्शे से ये पता चलता है कि 1946 और 1947 में मलेरिया के ख़िलाफ़ अभियान कैसे चला

इमेज स्रोत, CONSTANTINOS EMMANUELLE

इमेज कैप्शन, इस नक्शे से ये पता चलता है कि 1946 और 1947 में मलेरिया के ख़िलाफ़ अभियान कैसे चला

जून 1948 में अख़बार साइप्रस रिव्यू के मुताबिक़, "हर तालाब, झरने और पानी जमने वाले इलाक़ों में कीटनाशकों का छिड़काव किया गया." यहाँ तक कि जानवरों के खुरों के स्थान को भी नहीं छोड़ा गया. इस अभियान के क्रम में अज़ीज़ के सहयोगी कभी दलदल में उतारे गए, तो कभी रस्सियों की मदद से गुफाओं में उतारे गए.

जिन इलाक़ों में कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता था, उनकी साप्ताहिक जाँच भी होती थी कि कहीं मच्छरों का लार्वा फिर तो पैदा नहीं हो गया. अगर कहीं से इसके सबूत मिलते थे, तो वहाँ फिर से छिड़काव किया जाता था.

जब तक ये अभियान चला, गंदे स्थानों से साफ़-सुथरे स्थानों की ओर से आने वाले परिवहन के सभी साधनों पर भी छिड़काव होता था.

वीडियो कैप्शन, अब मलेरिया का मिटेगा नामोनिशान?
मलेरिया

इमेज स्रोत, Science Photo Library

मलेरिया क्या है

मलेरिया प्लाज़्मोडियम परजीवी के कारण होने वाली एक ऐसी बीमारी है, जिसका इलाज संभव है और जिसकी रोकथाम भी हो सकती है. मलेरिया मादा मच्छरों के काटने से लोगों में फैलती है.

एक बार इस परजीवी संक्रमित हो जाने पर व्यक्ति बीमार हो जाता है. मलेरिया के कारण लिवर की कोशिकाएँ और लाल रक्त कोशिकाएँ संक्रमित हो जाती हैं. इस बीमारी का प्रभाव पूरे शरीर पर, यहाँ तक कि मस्तिष्क पर भी पड़ता है और ये घातक भी हो सकता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ वर्ष 2019 में दुनियाभर में मलेरिया के 22 करोड़ 90 लाख मामले थे और एक आकलन के मुताबिक़ इससे 409,000 लोगों की मौत हुई थी. इनमें दो तिहाई बच्चे थे.

अज़ीज़ की बेटी तुर्कान अपने पिता की आधिकारिक स्वास्थ्य निरीक्षक वाली वर्दी को याद करती हैं, जो सैनिक स्टाइल की होती थी. इस वर्दी में भी कंधे पर बिल्ला और फीता लगा होता था.

वे बचपन के पिकनिक के दिनों को भी याद करती हैं, जब वे अपने पिता के पीछे-पीछे सूखी नदियों के किनारे भागती थी और उनके पिता अथक रूप से पानी के रिसाव के स्रोतों की खोज करते रहते थे.

अमेरिका के एक मलेरिया विशेषज्ञ ने अज़ीज़ के साथ साइप्रस के उस गाँव का दौरा किया, जहाँ के 72 फ़ीसदी बच्चों में मलेरिया संक्रमण के लक्षण थे.

इस अमेरिकी विशेषज्ञ ने अज़ीज़ के बारे में बाद में लिखा, "वे मच्छरों के रहने वाली जगह की तलाश में सीढ़ियाँ ढूँढ़ लाते थे और ऊँची-ऊँची छतों पर भी मच्छरों को ढूँढ़ते थे. आख़िरकार उन्हें गाँव के एक बाथरूम की गीली दीवार मिली, जहाँ बड़ी संख्या में मच्छर मिले."

तीन साल से कुछ ही समय ज़्यादा लगा और फरवरी 1950 तक साइप्रस दुनिया का पहला मलेरिया मुक्त देश था.

पहले हीरो माना गया, फिर भुला दिया गया

रिटायरमेंट के बाद अपनी पत्नी के साथ मोहम्मद अज़ीज़

इमेज स्रोत, CONSTANTINOS EMMANUELLE

इमेज कैप्शन, रिटायरमेंट के बाद अपनी पत्नी के साथ मोहम्मद अज़ीज़

लंदन न्यूज़ क्रॉनिकल ने अज़ीज़ को एक महान मुक्तिदाता कहा, जबकि उनके सहयोगियों को मलेरिया के ख़िलाफ़ लड़ाई में फ़्रंट लाइन फ़ाइटर्स कहा गया.

औपनिवेशिक मामलों के तत्कालीन विदेश मंत्री ने दुनियाभर के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के बीच प्रसिद्धि प्राप्त करने के कारण अज़ीज़ की सराहना की और उन्हें ब्रिटेन का उत्कृष्टता पदक (एमबीई) दिया गया. एमबीई यानी मेम्बर ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर. ओबीई और सीबीई के बाद एमबीई की ऑर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर अवार्ड में तीसरे नंबर पर आता है.

मलेरिया ख़त्म करने के अभियान के ख़त्म होने के बाद भी अज़ीज़ ने मुख्य स्वास्थ्य निरीक्षक के रूप में अपना काम जारी रखा और उन्होंने टायफ़ाइड और टीबी जैसे संक्रामक रोगों के बारे में कई स्वास्थ्य शिक्षा अभियान चलाए और पूर्वी भूमध्यसागर के कई विश्वविद्यालयों में लेक्चर दिए.

लेकिन उनकी सफलता ने उन्हें स्थायी प्रसिद्धि नहीं दिलाई. जो चीज़ उनकी कहानी को ख़ासतौर पर दिलचस्प बनाती है, वो उनकी उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि एक देश के इतिहास से उन्हें पूरी तरह भुला दिया जाना है.

इसकी वजह एक छोटे से द्वीप के इतिहास में है, जो एक विद्वेषपूर्ण आज़ादी और उसके बाद आंतरिक संघर्ष के कारण टुकड़े-टुकड़े हो गया.

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति (जिसमें साइप्रस के कई लोग बहादुरी से लड़े) और फिर ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार के चुनाव के बाद कई लोगों को उम्मीद बँधी थी कि अब ये द्वीप जल्द ही औपनिवेशिक शासन से मुक्त हो जाएगा.

लेकिन ये साइप्रस के लिए दुर्भाग्य था कि मध्यपूर्व के अन्य हिस्सों में अशांति के कारण ब्रिटेन का 'अनसिंकेबल एयरक्राफ़्ट कैरियर' पहले की तुलना में सामरिक रूप से और महत्वपूर्ण हो गया. इसका मतलब ये भी था कि ब्रितानी इतनी आसानी से वहाँ से जाने वाले नहीं थे.

वीडियो कैप्शन, अब मलेरिया की पहचान कर सकेंगे कुत्ते

1955 में, अज़ीज़ की बेहतरीन सफलता के पाँच साल बाद, ब्रिटेन के हठ को लेकर साइप्रस की हताशा हिंसक संघर्ष में भड़क उठी. आख़िरकार 1960 में साइप्रस को ब्रिटेन से स्वतंत्रता तो मिल गई, लेकिन ये देश जातीय, धार्मिक और राजनीतिक आधार पर तेज़ी से विभाजित होने लगा. और इन्हीं दरारों के बीच मोहम्मद अज़ीज़ की कहानी भी चुपचाप फिसल गई.

वर्ष 1974 में साइप्रस का विभाजन हो गया. तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर हमला किया क्योंकि उस समय ग्रीस में सत्ता में मौजूद सैनिक सरकार यहाँ विद्रोह का समर्थन कर रही थी.

उस समय से देश के एक तिहाई उत्तरी हिस्से पर मुख्य रूप से टर्किश साइप्रस के लोग बसे हुए हैं, जबकि दक्षिणी दो तिहाई हिस्से पर ग्रीक साइप्रस लोग रहते हैं.

इस विभाजन ने मोहम्मद अज़ीज़ जैसे लोगों के काम का जश्न मनाने और उन्हें याद करने की बहुत कम जगह छोड़ी है.

द फ़्लाई मैन के रूप में मशहूर साइप्रस में मलेरिया के ख़िलाफ़ अभियान के नायक अज़ीज़ की मौत 1991 में 98 वर्ष की आयु में निकोसिया के उत्तरी हिस्से में हो गई. वे रिटायर होने के बाद से वहाँ अपना जीवन शांतिपूर्ण तरीक़े से सरकारी पेंशन पर जी रहे थे. बिना किसी आधिकारिक समारोह के उन्हें दफ़ना दिया गया.

साइप्रस के ग्रीक और टर्किश दोनों मिलकर अगर अज़ीज़ को फिर से वो सम्मान दिलाएं, जिनके वो हक़दार थे, तो ये साइप्रस के बारे में एक अलग कहानी बताने की दिशा में एक छोटा क़दम हो सकता है.

(तबीथा मॉर्गन 'स्वीट एंड बिटर आइलैंड: ए हिस्ट्री ऑफ़ द ब्रिटिश इन साइप्रस 1878-1960' की लेखिका हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)