उस्मानिया सल्तनत के स्वर्णिम इतिहास को दोहराने की कोशिश करता तुर्की

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- Author, मारियानो एगुरी
- पदनाम, बीबीसी मुंडो के लिए
अगर आप अभी नक़्शे पर मध्य-पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र और मध्य एशिया के इलाकों को देखे तो संभव है कि आप इन इलाकों में लगभग सभी संघर्ष वाले क्षेत्रों में तुर्की की मौजूदगी देखकर हैरान हो जाए.
कुछ साल पहले तक तुर्की का दावा था कि उसका अपने 'पड़ोसियों के साथ बिल्कुल भी किसी तरह का तनावपूर्ण रिश्ता नहीं' है. लेकिन आज की तारीख में सीरिया, लीबिया और नागोर्नो-काराबाख जैसे संघर्ष वाले क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी दिखती है.
सीरिया और उसके अपने क्षेत्रों में वो कुर्दों के साथ संघर्ष करते हुए दिख रहा है तो वहीं वो साइप्रस को लेकर एथेंस के साथ भिड़ा हुआ है. भूमध्यसागर के इलाके में वो दूसरे देशों के साथ ऊर्जा संसाधनों को लेकर टकराव की स्थिति में है.
उसी तरह से रूस, अमरीका, इसराइल, यूरोपीय संघ और नैटो के साथ भी तुर्की का तनाव बढ़ता जा रहा है. 600 सालों तक उस्मानिया सल्तनत दक्षिण पूर्व यूरोप से लेकर वर्तमान के ऑस्ट्रिया, हंगरी, बाल्कान, ग्रीस, यूक्रेन, इराक़, सीरिया, इसराइल, फ़लस्तीन और मिस्र तक फैला हुआ था.
16वीं और 17वीं सदी के बीच इसके प्रभाव में और इजाफा हुआ था. इसका प्रभाव उत्तरी अफ्रीका के अल्जीरिया से लेकर अरब तक था. 2002 से तुर्की की सत्ता पर काबिज़ रेचेप तैय्यप अर्दोआन सरकार ने अपने इस स्वर्णिम इतिहास के मद्देनज़र एक महत्वकांक्षी विदेश नीति को अख्तियार कर रखा है.

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क्षेत्रीय ताकत
तुर्की के लोग और वहाँ की फ़ौज अपने देश को आबादी, आर्थिक स्थिति और व्यवसायिक क्षमता के लिहाज से एक क्षेत्रीय ताकत के तौर पर देखते हैं. तुर्की की सीमा आठ देशों से मिलती है. यहाँ 74 फ़ीसद आबादी सुन्नी मुसलमान हैं. यहाँ की आबादी करीब साढ़े आठ करोड़ है.
तुर्की एक ऐसा देश है जिसकी स्थापना उस्मानिया सल्तनत के खात्मे के बाद हुआ था. 1928 के बाद से तुर्की ने आधिकारिक तौर पर धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाई हुई थी. हालांकि इस्लाम का प्रभाव यहाँ के समाज और राजनीति में फिर भी था.
राष्ट्रपति अर्दोआन ने शुरुआत में इस्लामवादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश की थी लेकिन इसके साथ ही एक मज़बूत धार्मिक रुझान वाली निरंकुश सत्ता की भी नींव डाली.
2014 और 2016 के बीच तुर्की ने 'पड़ोसियों के साथ किसी भी तरह के कोई संघर्ष नहीं' की नीति को बढ़ावा दिया. इसके बाद कई अंतरराष्ट्रीय विवादों में उन्होंने मध्यस्थता की पहल की. ग़ैर-सैन्य गतिविधियों को भी तुर्की ने प्रोत्साहित करना शुरू किया. मसलन उसने अफ्रीका और लातिन अमरीका में दूतावास खोले, दक्षिण-दक्षिण विकास सहयोग, संस्कृति और सभ्यताओं के मेल-मिलाप की कोशिशें कीं.
ऑस्ट्रिया के यूनिवर्सिटी ऑफ़ ग्राज़ के सेंटर फॉर साउथइस्ट यूरोपियन स्टडीज के प्रोफेसर केरेम ऑक्टेम बताते हैं कि आर्दोआन ने बाल्कान और मध्य पूर्व में निवेश को प्रोत्साहित किया और सीरिया, जॉर्डन और लेबनॉन के साथ एक मुक्त व्यापार क्षेत्र का निर्माण किया.
इसराइल-फ़लस्तीन टकराव के बीच भी तुर्की एक अहम और विरोधाभासी भूमिका निभाता नज़र आता है. एक तरफ तो अर्दोआन और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के बीच द्वेषपूर्ण संबंधों की बात सार्वजनिक है.
इसराइल और तुर्की के बीच 2010 में कूटनीतिक टकराव की स्थिति उस वक़्त बन गई थी जब तुर्की ने फ़लस्तीन की मानवीय आधार पर सहायता की थी. इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यवसायिक और फ़ौजी ताल्लुकात काफी हद तक कम हो गए थे.
तुर्की फ़लस्तीन का समर्थन करता है. तुर्की तेल अवीव से दूतावास यरूशलम ले जाने की अमरीकी फ़ैसले की आलोचना भी कर चुका है. यह कदम संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना के विपरीत है.

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प्रभाव बढ़ाने को लेकर आम सहमति
बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने हाल में इसराइल को मान्यता दिया है और फ़लस्तीन को पहुँचाने वाली मदद से हाथ खींच लिया है. पिछले महीने इस्ताम्बुल में फ़लस्तीन के दो विरोधी धड़ों फतह और हमास के बीच तुर्की ने मध्यस्थता करने की भी कोशिश की.
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की ओर से इसराइल को लेकर पड़ने वाले दबावों पर भी तुर्की ने क़तर का समर्थन किया है. तुर्की मिस्र को लेकर भी आलोचक रहा है. उसका आरोप है कि मिस्र ने मुस्लिम ब्रदरहुड का नीचा दिखाया है.
तुर्की के इन सब रवैये के बावजूद इस तरह के संकेत दिख रहे हैं कि इसराइल के साथ उसके रिश्ते सुधर सकते हैं. अर्दोआन का धीरे-धीरे अपनी फ़ौज पर नियंत्रण बढ़ता जा रहा है. तुर्की की फ़ौज परंपरागत तौर पर धर्मनिरपेक्ष झुकाव वाली रही है.
उन्होंने 'अरब स्प्रिंग' के दौरान मुस्लिम बदरहुड का साथ दिया था. इसके अलावा उन्होंने सीरिया में बशर अल-असद के ख़िलाफ़ इस्लामी मिलिशिया का भी समर्थन किया है. जुलाई, 2016 में अपने ख़िलाफ़ तख्तापलट की नाकामयाब कोशिश के बाद उन्होंने कट्टरवादी रुख अपना लिया है.
शांति के क्षेत्र में रिसर्च करने वाले इंस्टीट्यूट 'पिनार टैंक' के मुताबिक आर्थिक और वित्तीय संकट और सीरिया के शरणार्थियों की मजबूत मौजूदगी ने अर्दोआन की पार्टी को नुकसान पुहँचाया है और धुर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी नेशनल एक्शन पार्टी को फ़ायदा पहुँचाया है.
इस्ताम्बुल के कादिर हास यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सोली ओज़ेल मानते हैं कि शीत युद्ध के बाद अलग-अलग विचारधारा के स्कूलों में इस विचार को फैलाया है कि तुर्की की अपने हितों को लेकर एक विस्तारवादी नज़रिया रही है और फ़ारस की खाड़ी में वो क्षेत्रीय वर्चस्व कायम करना चाहते हैं.
मौजूदा वक्त में जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी (पीजेडी) के इस्लामवादी स्कूल राष्ट्रवादी, पश्चिम-विरोधी और एशिया का समर्थन करने वाले हो चुके हैं. इसमें आम नागरिक और फ़ौज दोनों ही फ़ौजी आधार की स्थापना और ताकत के विस्तार को लेकर एकमत है.
पूर्वी-भूमध्यसागर क्षेत्र में तनाव
शीत युद्ध के दौरान तुर्की पश्चिम का एक मजबूत सहयोगी देश था और नैटो और यूरोपीय कौंसिल का सदस्य देश था. अपनी भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक विशेषताओं जिसमें इस्लाम एक मज़बूत धर्मनिरपेक्ष परंपरा के साथ मौजूद है, उसकी वजह से पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु की तरह समझा जाता था.
इसके साथ ही वो इलाके में संयुक्त राष्ट्र के प्रभाव के ख़िलाफ़ भी एक दीवार की तरह माना जाता था. सितंबर 2001 की घटना के बाद भी वो कट्टरवादी राजनीतिक इस्लाम से अछूता रहा. हालांकि इसके बावजूद ऐसा नहीं था कि तुर्की की यह स्थिति बिना किसी विवाद के बनी हुई थी.
नैटो के दूसरे देश ग्रीस के साथ साइप्रस की स्वायत्ता के मुद्दे पर वो संघर्ष की स्थिति में था. 1974 में साइप्रस के उत्तरी इलाके में तुर्की ने अतिक्रमण किया था. साल 1983 में तुर्की ने उस इलाके को उत्तरी साइप्रस का तुर्की गणराज्य घोषित किया था. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हालांकि इसे मान्यता नहीं मिली थी.
पिछले अगस्त में ग्रीस और तुर्की के बीच तनाव फिर से शुरू हो गया जब अर्दोआन ने साइप्रस के इस इलाके में गैस की संभावनाओं को तलाशने की कोशिश शुरू की.
इसराइल, ग्रीस, साइप्रस, इटली और मिस्र आपस में भूमध्यसागर के क्षेत्र में गैस उत्सर्जन की संभावनों को लेकर एक डील पर समझौता कर चुके हैं. तुर्की मानता है कि इस पर उसका हक़ है. जर्मनी ग्रीस और तुर्की के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश कर रहा है लेकिन इसने मुद्दे ने यूरोपीय संघ और नैटो के सहयोगियों को बांट कर रख दिया है.
अमरीका ने अपने आप को ग्रीस के साथ रखा है. तुर्की ने यूरोपीय संघ को सीरिया और दूसरे देशों के लाखों शरणार्थियों को लेकर एक चिट्ठी लिखी है. तुर्की ने 2016 में यूरोपीय संघ के साथ छह बिलियन यूरो के एवज में शरणार्थियों को शरण दने के समझौते पर भी हस्ताक्षर किये हैं.

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कुर्द और सीरिया
कुर्दों की वजह से भी पश्चिम के साथ टकराव की स्थिति बनी हुई है. कुर्दों की आबादी दो करोड़ है और यह चार देशों (इराक़,सीरिया,तुर्की और ईरान) में फैले हुए है. तुर्की में कुर्द पूर्वी एंतोलिया के क्षेत्र में अच्छी संख्या में हैं. वहाँ कुर्दों की 55 फ़ीसद आबादी है. यह तुर्की की कुल आबादी का 20 फ़ीसद है.
दशकों से तुर्की कुर्दों की आज़ादी की कोशिश के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं और उन्हें दबाने में लगे हुए हैं. 2015 के बाद से तुर्की सरकार ने कुर्दी राजनेताओं और सिविल सोसायटी के अहम सदस्यों के ख़िलाफ़ दमन बढ़ा दिया है.
अक्टूबर, 2019 में तुर्की फ़ौज ने सीरिया के इदलीब में घुसकर कुर्दिश संगठनों सीरियाई डेमोक्रेटिक यूनिटी पार्टी और उसके सशस्त्र विंग पिपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स पर हमला किया था. कुर्दिश अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन की मदद से इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं.
अर्दोआन को लगता है कि सीरिया में कुर्दों के बढ़ते प्रभाव की वजह से तुर्की में भी कुर्दों का अलगाववाद को लेकर मनोबल बढ़ सकता है. अमरीका ने अक्टूबर में घोषणा की थी कि वो अपने 2500 जवानों को वापस बुला रहा है.
इसके बाद बशर अल असद ने कुर्दिश प्रभाव वाले इलाकों को फिर से वापस अपने नियंत्रण में ले लिया था. तुर्की रूस और सीरिया के बीच संबंध भी प्रगाढ़ हुए. तुर्की और रूस की फ़ौज ने क्षेत्र में नियंत्रण स्थापित करने को लेकर आपस में बेहतर समन्वय भी स्थापित किया.
नैटो ने इस कदम की जब आलोचना की तो अर्दोआन ने कहा कि तुर्की अपने राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में 'बिना किसी की इजाज़त' के कोई भी कदम उठा सकता है.
लीबिया और नार्गोन-काराबाख में दखल
रूस और तुर्की लीबिया में चल रहे नागरिक युद्ध में अलग-अलग पक्षों को समर्थन दे रहे हैं. अफ्रीका में सबसे बड़ा तेल भंडार लीबिया में ही मौजूद है. पिछले दिसंबर में तुर्की सरकार ने घोषणा की थी कि वो लीबिया की गर्वनमेंट ऑफ़ नेशनल एकॉर्ड (जीएएन) को फ़ौजी मदद देगा.
जीएएन को संयुक्त राष्ट्र का भी समर्थन प्राप्त है. खलीफा हफ्तार के नेतृत्व में विद्रोहियों ने विद्रोह छेड़ा हुआ है. खलीफ हफ्तार पूर्व राष्ट्रपति मुअम्मर गद्दाफी के सेना के कमांडर थे. वो विद्रोहियों के जिस गुट का नेतृत्व कर रहे हैं, उसमें कुछ कट्टरपंथी इस्लामवादी भी शामिल हैं.
इसे लीबियाई नेशनल आर्मी कहते हैं. जीएएन का तुर्की फ़ौज और कतर, इटली और मुस्लिम बदरहुड की बदौलत देश के पश्चिमी हिस्से पर नियंत्रण है. जबकि वहीं जनरल हफ्तार को संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और जॉर्डन का समर्थन प्राप्त है.
ली मॉड अखबार के डायरेक्टर सिल्वी कॉफमैन के मुताबिक रूस ने हफ्तार को 1000 लड़ाके मुहैया कराए हैं. फ्रांस की भूमिका भी यहाँ बहुत साफ नहीं है लेकिन वो हफ्तार के पक्ष में झुकता हुआ नज़र आता है और वो रूस के साथ मिलकर चलने की कोशिश कर रहा है.
पूर्वी भूमध्यसागर के क्षेत्र में ऊर्जा संसाधनों को लेकर भी तुर्की के साथ फ्रांस के हित टकराव की स्थिति में है. लीबिया के अलावा नार्गोन-काराबाख के क्षेत्र में भी तुर्की और रूस आमने-सामने आ गए हैं.
रूस जहाँ एक तरफ आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच मध्यस्थता की कोशिश में लगा हुआ है तो वहीं तुर्की ने खुलकर अज़रबैजान का साथ दिया है. इससे पहले तुर्की अज़रबैजान का कूटनीतिक तौर पर समर्थन करता रहा था लेकिन अब रूस के मुताबिक तुर्की ने अज़रबैजान को हथियारों से भी मदद की है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नार्गोन-काराबाख के क्षेत्र पर अज़रबैजान के नियंत्रण को मान्यता प्राप्त है लेकिन इस क्षेत्र में रहने वाली अधिकांश आबादी आर्मीनियाई है. ये दोनों ही देश पहले सोवियत संघ के हिस्सा थे.

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रूस और तुर्की: दोस्त या दुश्मन?
रूस और तुर्की के राजनीतिक रिश्ते लंबे समय से बाल्कन, ब्लैक सी और कॉकासस पर नियंत्रण और मध्य पूर्व पर प्रभाव जमाने के इर्दगिर्द घूमता रहा है. अलग-अलग विवादों पर दोनों ही मुल्कों के मुख़्तलिफ़ स्टैंड रहे हैं लेकिन जो कॉमन रही है, वो ये है कि दोनों ही देशों ने भविष्य के मुताबिक़ नज़रिया अपनाया है.
अर्दोआन और पुतिन दोनों ही नेता ये मानते हैं कि ये दुनिया एक बहुध्रवीय विश्व है और उनके देश चीन और अन्य उभरते हुए देशों के साथ अमरीका और यूरोप की तुलना में ज़्यादा ताक़त हासिल करने की तमन्ना रखते हैं.
थिंकटैंक 'पिनार टैंक' का मानना है कि रूस और तुर्की के नए गठबंधन को नैटो को बेदखल या कमज़ोर करने के इरादे से बनाए गए संगठन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. ये दरअसल सुविधाओं का संगम है जो दोनों ही देसों के राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करता है. तुर्की विदेश नीति के मामले में अलग रुख अपनाना चाहता है और रूस के निशाने पर तुर्की के नैटो के साथ रिश्ते हैं.
भले ही दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय मुद्दों पर कई मतभेद हों लेकिन इसके बावजूद तुर्की और रूस के दरमियां क़रीबी कारोबारी रिश्ते हैं. रूस तुर्की का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है और वो उसकी ऊर्जा ज़रूरतों की आपूर्ति करने वाला सबसे प्रमुख देश हैं. यहां कि परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भी दोनों देशों की भागीदारी है.
बीते जनवरी में दोनों देशों ने फ़ैसला किया था कि वे 930 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन की परियोजना को मिलकर अंज़ाम देंगे. यूरोप को गैस की आपूर्ति करने वाला ये पाइप लाइन ब्लैक सी से होकर गुजरेगा लेकिन यूक्रेन से दूर रहेगा.

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नैटो और यूरोपीय संघ के साथ दिक्कतें
तुर्की से अमरीका के रिश्तों में भी कम विरोधाभास नहीं हैं. अमरीका की ये कोशिश रही है कि रेचेप तैय्यप अर्दोआन की हुकूमत का झुकाव पूरी तरह से ईरान के पक्ष में न चला जाए. ईरान के साथ परमाणु समझौते से बाहर निकलने के ट्रंप प्रशासन के फ़ैसले की तुर्की ने हमेशा ही आलोचना की है.
लेकिन दूसरी तरफ़ अमरीका और नैटो का तुर्की में सैनिक अड्डा है. और इसी अड्डे से अतीत में अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और दूसरी जगहों पर मिलिट्री ऑपरेशंस को अंजाम दिया जाता रहा है. हालांकि अर्दोआन की हुकूमत ने इस सैनिक अड्डे को बंद करने की धमकी दी है.
अमरीका ने अर्दोआन के विरोधी फेतुल्लाह गुलेन के प्रत्यर्पण से भी इनकार कर दिया था. साल 2019 में तुर्की और अमरीका के रिश्ते में नया मोड़ उस वक़्त आया जब अर्दोआन हुकूमत ने रूस से एंटी मिसाइल सिस्टम S-400 ट्रायंफ़ खरीदने का तकरीबन मन बना लिया था.
तुर्की का कहना था कि अमरीका ने साल 2017 में उसे पैट्रियट मिसाइल बेचने से इनकार कर दिया था. इसके अलावा तुर्की में रह रहे सीरियाई शरणार्थियों का भी एक मुद्दा है. तुर्की इन शरणार्थियों को सीरिया के एक इलाके में रखना चाहता है और इसे लेकर परिस्थितियां जटिल हो रही हैं.
यूरोप के बाहर तुर्की का नाम वेनेज़ुएला के राजनीतिक संकट में भी लिया जा रहा है. दिसंबर में वहां चुनाव प्रस्तावित हैं और तुर्की यूरोपीय संघ के साथी देशों के साथ विपक्षी राजनीतिक दलों को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने के लिए मनाने की कोशिशों में लगा हुआ है.
यूरोपीय संघ शर्तों के साथ इस प्रक्रिया का हिस्सा बनने को तैयार है लेकिन अमरीका इसका विरोध कर रहा है.
थिंकटैंक कार्नेगी यूरोप के मार्क पिएरिनी कहते हैं, "यूरोप के नज़र से देखें तो तुर्की की तीन पहचान हैं. वो यूरोप का रणनीतिक साझीदार है. ख़ासकर अर्थव्यवस्था और व्यापार में. मध्य पूर्व और पूर्वी भूमध्यसागर में वो उनका विरोधी है और नैटो में एक नेगेटिव प्लेयर."
(लेखक मारियानो एगुरी थिंकटैंक चैथम हाउस में फेलो हैं)
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