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'इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष सुलझाने के लिए भारत को मध्यस्थता करनी चाहिए'
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
भारत में फ़लस्तीनी प्रशासन के दूत अदनान एम अबू अल-हाइजा का कहना है कि इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच शांति प्रक्रिया शुरू कराने में भारत को पहल करनी चाहिए.
बीबीसी से ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत का शांति प्रक्रिया में शामिल होना न केवल फ़लस्तीनियों के हित में होगा बल्कि ख़ुद भारत के लिए भी अच्छा होगा. उन्होंने कहा, "भारत की पश्चिम एशिया में बहुत रुचि है इसलिए इस क्षेत्र में शांति भारत के भी हित में होगी."
कुछ दिन पहले हमास और इसराइली सरकार के बीच हुए संघर्ष विराम की घोषणा के तुरंत बाद फ़लस्तीनी दूत ने बीबीसी से कहा कि पश्चिम एशिया में जल्द-से-जल्द स्थायी शांति स्थापित करने की आवश्यकता है.
मिस्र से जुड़ी ग़ज़ा पट्टी में हमास का शासन है जहाँ से हमास के चरमपंथी इसराइल पर रॉकेट दाग़ते हैं जबकि जॉर्डन से लगे पश्चिमी तट में फ़लस्तीनी प्रशासन (पीए) का शासन है. इसराइल इन दोनों फ़लस्तीनी क्षेत्रों के बीच में है.
भारत के फ़लस्तीनी अथॉरिटी और इसराइली सरकार दोनों से अच्छे संबंध हैं. फ़लस्तीनी और इसराइली जनता के बीच भारत एक लोकप्रिय देश है. इस तरह से भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल है जो दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर सकने की स्थिति में है.
भारत ने इस दिशा में कोई ऐसी बात नहीं कही है जिससे ऐसा संकेत मिलता हो कि भारत ऐसा करने को उत्सुक है. भारत के अब तक बयान बहुत संयत और संतुलित रहे हैं.
फ़लस्तीनी प्रशासन के दूत अदनान एम. अबू अल-हाइजा कहते हैं, "मुझे नहीं मालूम कि वो (भारत) तैयार हैं या नहीं लेकिन मैंने उन्हें तैयार होने के लिए कहा है."
उनके विचार में भारत को दूसरे देशों के साथ मिलकर कोशिश करनी चाहिए. वे कहते हैं, "हम चाहते हैं कि भारत कुछ बड़े देशों के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय शांति सम्मेलन बुलाए, ये समस्या जल्द-से-जल्द ख़त्म होनी चाहिए वर्ना हम भविष्य में ख़ून-ख़राबे का एक और दौर देखेंगे."
शुक्रवार को समाप्त हुई हिंसा में 12 इसराइली और 250 से अधिक फ़लस्तीनी मारे गए थे. मारे जाने वालों में बच्चे और महिलाएँ शामिल हैं. 2014 के बाद से दोनों पक्ष के बीच ये सबसे बड़ा संघर्ष था.
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दशकों से इन दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की भूमिका अमेरिका निभाता आया है लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासन में अमेरिका इसराइल के पक्ष में खुलकर सामने आया और इसने इसराइली सरकार की पूर्वी यरूशलम को अपनी राजधानी बनाने का समर्थन करके फ़लस्तीनियों को सख़्त नाराज़ कर दिया.
फ़लस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास ने कहा कि मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए अमेरिका ने तटस्थता का नैतिक अधिकार खो दिया है. वो इस बात से भी नाराज़ थे कि राष्ट्रपति ट्रंप ने कुछ अरब देशों के साथ इसराइल के साथ राजनयिक रिश्ते बनाने में उनकी मदद की.
फ़लस्तीनी दूत अदनान एम. अबू अल हाइजा से जब हमने पूछा कि क्या इसराइल अमेरिका के बजाय भारत या किसी और देश की मध्यस्थता स्वीकार करेगा तो उन्होंने कहा, "भारत संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, रूस और अमेरिका के साथ मिलकर मदद कर सकता है."
लेकिन फ़लस्तीनी अमेरिका से पूरी तरह से मायूस भी नहीं हुए हैं. राष्ट्रपति जो बाइडन के सत्ता पर आने के बाद फ़लस्तीनियों को ये उम्मीद हैं कि दोनों के बीच कोई समझौता हो जाए.
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भारत दोनों के क़रीब
इसराइल और भारत के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध की शुरुआत 1992 में हुई थी जिसके बाद इसराइल ने दिल्ली में अपना दूतावास स्थापित किया था. तब से भारत और इसराइल के बीच निकटता काफ़ी बढ़ी है.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू के बीच ज़ाहिरी तौर पर दिख रही गहरी दोस्ती ने दोनों देशों के बीच रिश्तों को और भी मज़बूत किया है.
दोनों नेता एक दूसरे के देश का सरकारी दौरा भी कर चुके हैं. सैन्य और आंतरिक सुरक्षा में इसराइल भारत का एक बड़ा सहयोगी है.
दूसरी तरफ़ भारत और फ़लस्तीनियों के बीच रिश्ते ऐतिहासिक हैं. प्रधानमंत्री मोदी पश्चिमी तट का दौरा करके फ़लस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास से मुलाक़ात भी कर चुके हैं. वे फ़लस्तीनी क्षेत्र और इसराइल का दौरा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं.
भारत फ़लस्तीनियों की कई क्षेत्रों में मदद करता आया है. फ़लस्तीनी दूत ने कहा, "भारत दो अस्पताल बनाने में हमारी मदद कर रहा है. भारत ने हमारे विदेश मंत्रालय के लिए एक राजनयिक संस्थान बनाने में भी मदद की है. एक महिला सशक्तीकरण केंद्र, कई स्कूल, एक विश्वविद्यालय और एक टेक्नो पार्क बनाने में भी भारत ने हमारी सहायता की है."
इन प्रोजेक्ट्स की लागत 6 करोड़ डॉलर के क़रीब है.
हाइजा कहते हैं, ''भारत ने हमेशा आगे आकर हमारी मदद की है. हमने कुछ उनसे कभी माँगा नहीं है. अब हम भारत से सियासी मदद मांगते हैं."
दो राष्ट्र फ़ॉर्मूले का समर्थन
हाल के वर्षों में भारत ने दोनों पक्षों के बीच अक्सर निष्पक्षता का रास्ता अपनाया है. भारत इस पुरानी समस्या को 'दो-राष्ट्र समाधान' के फ़ार्मूले के ज़रिए हल करने के पक्ष में है.
दो-राष्ट्र समाधान में इसराइल के साथ एक स्वतंत्र फ़लस्तीन राज्य का प्रावधान है. दोनों राष्ट्रों के बीच की सीमा को लेकर विवाद अभी निबटा नहीं है, फ़लस्तीनी और अरब नेतृत्व "1967 की सीमाओं" पर ज़ोर दे रहे हैं, जिसे इसराइल ने स्वीकार नहीं किया है.
दोनों पक्षों के बीच 11 दिन चले युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पहली सार्वजनिक बैठक को संबोधित करते हुए, न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी दूत टीएस तिरुमूर्ति ने हाल में ''फ़लस्तीनियों के लिए भारत के मज़बूत समर्थन और दो-राष्ट्र समाधान के लिए अपनी अटूट प्रतिबद्धता" को दोहराया था.
साथ ही, उन्होंने दोनों पक्षों से 'संयम' दिखाने का आग्रह किया और "तत्काल तनाव घटाने" पर ज़ोर दिया.
अबू अल हाइजा भारत में 2014 से फ़लस्तीनी दूत हैं और भारत के कई राज्यों का दौरा कर चुके हैं. वो कहते हैं कि उन्हें दूसरे देशों की तुलना में भारत से अधिक उम्मीद है.
हमास 'आतंकवादी संगठन'
फ़लस्तीनी अथॉरिटी का शासन केवल पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) तक सीमित है. 2007 में हमास ने ग़ज़ा पट्टी में चुनाव जीता और अब तक सत्ता हमास की राजनीतिक शाखा के हाथों में है.
इसके सैन्य अंग को इसराइल आतंकवादी कहता है. इसराइल का कहना है कि यही लोग इसराइल के अंदर रॉकेट दागते हैं. इसराइली सरकार का कहना है कि ग़ज़ा से आने वाले रॉकेटों के जवाब में इसराइली ग़ज़ा पर हवाई हमले करता है.
फ़लस्तीनी प्रशासन हमास के रॉकेट हमलों को रोक क्यों नहीं पाता? इस पर हाइजा कहते हैं कि वो हमास से हमेशा वार्ता करते हैं लेकिन इस बार इसराइली हमला जवाबी कार्रवाई है, ये कहना सही नहीं है. वो कहते हैं, "हमास का रॉकेट बरसाना एक्शन नहीं है, ये जवाबी हमला है इसराइल की हिंसा का."
वो हमास के पक्ष को समझाने को कोशिश करते हैं, "हमास ने इसराइली सरकार से बार-बार मस्जिद अल-अक़्सा में नमाज़ियों के साथ हिंसक सलूक न करने की अपील की है. लेकिन इसराइली सुरक्षाकर्मी मस्जिद में घुस आए और मुसलमानों के तीसरे सबसे पवित्र स्थान में घुसकर उसे अपवित्र और अपमानित किया."
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