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इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष: टिकटॉक पर बहुत पहले छिड़ गई थी लड़ाई
- Author, टॉबी लुकहर्स्ट
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इसराइल और फ़लस्तीनी चरमपंथियों के बीच पिछले एक हफ़्ते से संघर्ष छिड़ा है लेकिन फ़लस्तीनी अरबों और इसराइल का ये संघर्ष सिर्फ़ ज़मीनी हमलों और हवाई बमबारी तक ही सीमित नहीं रह गया है. सोशल मीडिया भी दोनों गुट भिड़ रहे हैं.
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जारी इस संघर्ष में सबसे अहम हथियार है टिककटॉक.
किसी समय में वायरल डांस ट्रेंड और दूसरे वीडियोज़ से लिए जाना जाने वाला यह ऐप अब न्यूज़ शेयर करने का एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बन गया है.
एक अनुमान के अनुसार, दुनियाभर में टिकटॉक के क़रीब सात सौ मिलियन एक्टिव यूज़र्स हैं. चीनी स्वामित्व वाले इस ऐप के ज़्यादातर यूज़र्स युवा हैं.
इसराइल पर रॉकेट दागा जाना, ग़ज़ा में तबाही का मंज़र, फ़लस्तीनियों का विरोधी प्रदर्शन का और इस संघर्ष से जुड़े तमाम ऐसे ही वीडियो टिकटॉक पर वायरल हैं. जिसका नतीजा ये हुआ है कि इसे इस्तेमाल करने वालों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है.
लेकिन चिंता की बात ये हैं कि वो चाहे टिकटॉक हो या दूसरे सोशल प्लेटफॉर्म्स, वहां फ़ेक ख़बरों की भी भरमार है, जिससे भ्रम को बढ़ावा मिल रहा है.
टिकटॉक पर हफ़्तों से था तनाव
ग़ज़ा और इसराइल में एक सप्ताह पहले छिड़ी हिंसा 2014 के बाद से अब तक का सबसे गंभीर संघर्ष है.
पूर्वी यरुशलम में फ़लस्तीनी अरबों और इसराइल के बीच हफ़्तों तक तनाव के बाद 7 मई को यरुशलम की अल-अक़्सा मस्जिद के पास हुई झड़प अब युद्ध में तब्दील हो चुकी है.
मगर संघर्ष भले एक हफ़्ते पहले शुरू हुआ हो, फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के बीच ये ठना-ठनी टिकटॉक पर बहुत पहले ही शुरू हो गई थी.
अप्रैल महीने में पूर्वी यरुशलम में कुछ लड़कों का एक वीडियो इस वीडियो ऐप पर वायरल हुआ था. इस वीडियों में ये लड़के पब्लिक ट्रांसपोर्ट में एक यहूदी को थप्पड़ मारते दिख रहे हैं. हालांकि दो सप्ताह बाद पुलिस ने संदिग्ध लड़कों को गिरफ़्तार कर लिया था.
इसके बाद टिककॉक पर प्रदर्शन के कई वीडियो क्लिप्स आने लगे. यूज़र्स ने हैशटैग #SaveSheikhJarrah के साथ कई वीडियो पोस्ट किये. ये वीडियो पूर्वी यरुशलम के पास एक फ़लस्तीनी परिवार को उनके घर से बेदख़ल करने के संदर्भ में थे. और अब इस तरह के वीडियो दुनिया भर में देखे और शेयर किये जा रहे हैं.
"टिकटॉक बूम: चाइना द यूएस एंड द सुपरपावर रेस फ़ॉर सोशल मीडिया के लेखक" क्रिस स्टॉकली-वॉकर ने बीबीसी से कहा, "टिकटॉक को इस्तेमाल करना काफी सरल है और जिस हिसाब से ये लोकप्रिय है इस पर मौजूद सामग्री तेज़ी से दुनिया भर में फैल जाती है."
वो कहते हैं, "वीडियो बनाने के उपलब्ध टूल्स की मदद से यहां वीडियो बनाना इतना आसान है कि 12 साल के एक बच्चे से लेकर 90 साल के बुज़ुर्ग भी बड़ी ही आसानी से यहां वीडियो बना सकते हैं. यहां कोई भी वीडियो बना सकता है जिसे बहुत अधिक तकनीकी जानकारी ना हो वो भी यहां वीडियो बना सकता है."
वॉकर आगे कहते हैं, "टिकटॉक के यूज़र्स भी बड़ी संख्या में हैं. दुनिया भर में क़रीब 732 मिलियन लोग मासिक तौर पर इसके एक्टिव यूज़र्स हैं. ऐसे में अगर आप यहां कुछ भी पोस्ट करते हैं तो इस बात की संभावना अपने आप ही बढ़ जाती है कि दुनिया में काफी अधिक संख्या में लोग इसे देखेंगे. "
दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी 'संघर्ष'
लेकिन डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जारी संघर्ष सिर्फ़ टिकटॉक तक सीमित नहीं है. टिकटॉक के अलावा फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर भी ये 'जंग' जारी है.
इन सोशल मीडिया साइट्स पर भी इसराइल सुरक्षा बलों और ग़ज़ा के मौजूदा ज़मीनी हालात के कई वीडियो अपलोड किये गए हैं. इनमें से कई वीडियोज़ को #SaveSheikhJarr हैशटैग के साथ पोस्ट किया गया है.
अमेरिका स्थित एक न्यूज़ साइट मुस्लिम ने भी एक इस हैशटैग के साथ एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें ग़ज़ा में हुए इसराइली हमले के बाद भाग रहे लोग दिखाई दे रहे हैं. इस वीडियो को अकेले टिकटॉक पर ही 44 मिलियन से अधिक बार देखा जा चुका है.
टिकटॉक यूज़र सबरीना अबूख़दीर ने भी इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष का एक वीडियो अपलोड किया था. उनके इस पोस्ट को क़रीब 1.5 मिलियन बार देखा जा चुका है. इस वीडियो में ग़ज़ा में एक ध्वस्त बहुमंज़िला इमारत नज़र आ रही है और कुछ रोते-बिलखते फ़लीस्तीनी बच्चे.
उन्होंने इस वीडियो को पोस्ट करते हुए लोगों से अपील की है कि वे इसे अधिक से अधिक शेयर करें. उन्होंने इस वीडियो के साथ लिखा है- "आप दोस्तों को पता है कि आपको क्या करना है."
एकतरफ़ा नहीं हैं पोस्ट
इसराइल समर्थकों ने भी टिकटॉक और दूसरे मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर कई वीडियो पोस्ट किये हैं.
एक वीडियो में नज़र आ रहा है कि कथित तौर पर एक इसराइली सैनिक एक फ़लस्तीनी महिला की ढाल बनकर उसे बचा रहा है. फ़लस्तीनी एक प्रदर्शन के दौरान पथराव कर रहे हैं और ये सैनिक उस महिला को घायल होने से बचा रहा है. वीडियो ऐप टिकटॉक पर इस क्लिप को 15 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है.
इसके अलावा इसराइल डिफ़ेंस फोर्सेस (IDF) भी काफ़ी एक्टिव हैं और उनकी पहुंच भी काफी अधिक है.
ट्विटर पर इनके क़रीब 15 लाख और टिकटॉक पर लगभग 70 हज़ार से अधिक लोग उनके हैंडल को फ़ॉलो करते हैं. अपने इन हैंडल्स पर वे अपनी सशस्त्र सेना के फ़ुटेज और इसराइल के भीतर के कई वीडियो पोस्ट करते हैं.
आईडीएफ़ के अकाउंट से पोस्ट किये गए एक वीडियो में दर्शकों से पूछा गया है कि "अगर ये आपका शहर होता तो आप क्या करते?"
इस वीडियो को तीन लाख से अधिक बार देखा गया है.
इसराइल के हाइफ़ा यूनिवर्सिटी के डॉ. गैब्रिएल वेइमैन कहते हैं "सोशल मीडिया पर ये 'दिल और दिमाग'के बीच की जंग है और अब ये 'बराबरी का युद्ध' नहीं रहा."
डॉ. गैबरियल वेइमैन टिकटॉक और दूसरे प्लोटफॉर्म्स पर इसराइल के लिए किये गए पोस्ट्स पर कहते हैं कि "इसराइल की तरफ़ से आपको एक काउंटर फ़्लो नज़र आएगा. और मुझे बिल्कुल ये कहना चाहिए ये उतना प्रभावशाली नहीं है.ना ही ये ऑर्गेनाइज़्ड है. और अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि ये उतना प्रेरक भी नहीं है."
ग़लत संदर्भ के साथ फ़ेक वीडियो की भरमार
इसी महीने एक वीडियो ट्विटर समेत टिकटॉक पर भी वायरल हुआ. जिसमें यहूदी नाच रहे हैं और जयघोष कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर अल-अक्सा मस्जिद परिसर में एक पेड़ धू-धूकर जल रहा था. सोशल मीडिया पर ये दावा किया गया कि ये जश्न मस्जिद को तोड़ने के बाद का है.
हालांकि असल में वे लोग यरुशलम दिवस मनाने के लिए जमा हुए थे.
इसराइल की पुलिस ने कहा कि यह आग फ़लस्तीनी प्रदर्शकारियों की आतिशबाज़ी के कारण लगी थी जबकि प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह आग अधिकारियों द्वारा दागे गए स्टन-ग्रेनेड्स के कारण लगी.
गुरुवार की रात, इसराइल के रक्षा मंत्री बेनी गैंट्ज़ ने फ़ेसबुक और टिकटॉक से ये वीडियो हटाने की अपील की. उन्होंने इस अपील के पक्ष में तर्क दिया कि इससे और अधिक हिंसा भड़केगी.
उन्होंने कहा कि इन पोस्ट्स को हटाकर सीधे तौर पर वो क़दम उठाए जा सकते हैं जो हिंसा को रोकने में मददगार होंगे. हमारे देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे चरमपंथी तत्व जानबूझकर सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट डालकर भड़का रहे हैं.
उन्होंने मदद की अपील करते हुए कहा कि "वर्तमान समय में हम सोशल इमरजेंसी के दौर में हैं और आपसे मदद की अपेक्षा रखते हैं."
इसराइल नेशनल न्यूज़ के मुताबिक़, दोनों कंपनियों के अधिकारियों ने इस संबंध में प्रभावी तरीक़े से काम करने का वादा किया है.
शायदानाय उरबानी फ़र्स्ट ड्राफ़्ट न्यूज़ के लिए काम करती हैं. यह संस्थान ऑनलाइन मौजूद ग़लत और झूठी सूचनाओं का खंडन करने का काम करता है.
उरबानी ने बीबीसी को बताया, "हमने ऑनलाइन बहुत सी ऐसी सामग्री देखी है जो पुरानी है. उन्हें अलग-अलग संदर्भ के फैलाया जा रहा है. उनके वास्तविक समय से इतर एकदम अलग समय का बताकर, जगह का बताकर फैलाया जा रहा है."
न्यूयॉर्क टाइम्स ने हाल ही में इसका एक उदाहरण भी रखा था.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने दावा किया था कि एक फ़ुटेज जोकि यूट्यूब पर क़रीब एक साल पुराना है उसे अब ग़लत संदर्भ के साथ फैलाया जा रहा है.
यह वीडियो वायरल है जिसे फलस्तीनियों के कथित 'झूठे अंतिम संस्कार के' तौर पर शेयर किया जा रहा है.
टिकटॉक पर इस वीडियो को हज़ारों बार देखा जा चुका है. इस वीडियो में कुछ लोगों का एक समूह दिखाई दे रहा है जिसने अपने कंधे पर एक शव उठा रखा है. वो इसे लेकर चले जा रहे हैं. इससे पहले की वो उसे दफ़नाते, पीछे से सायरन के बजने की आवाज़ आती है. वो लोग शव को नीचे रखकर भाग जाते हैं. शव वहीं बीच सड़क पर पड़ा रहता है और कुछ ही देर बाद वो शव अचानक से 'जीवित' हो उठता है और भाग जाता है.
लेकिन असल में, न्यूयॉर्क टाइम्स का दावा है कि यह वीडियो क़रीब एक साल पहले यू-ट्यूब पर अपलोड किया गया था. जिसके लिए कैप्शन दिया गया था- "यह जॉर्डन का एक परिवार था जो नकली अंतिम संस्कार कर रहा था."
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