बरसते रॉकेटों के बीच इसराइल में रहने वाले भारतीयों की ज़िंदगी

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“हमें अपनी जान बचाने के लिए 15 से 30 सेकेंड का वक़्त मिलता है. चाहे आप जो भी काम कर रहे हों लेकिन रॉकेट के हमले का साइरन बजते ही आपको शेल्टर में जाना होता है. लेकिन, सौम्या संतोष ख़ुद को नहीं बचा पाई होंगी और उनकी जान चली गई.”
इसराइल में रहने वाले भारतीय प्रसाद ऐले उन्हीं सौम्य संतोष की बात कर रहे हैं जो ग़ज़ा से आए एक रॉकेट हमले में मारी गईं.
केरल की रहने वालीं सौम्या संतोष इसराइल के अश्कलोन शहर में केयरगिवर के तौर पर काम करती थीं.
इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच पिछले क़रीब दो हफ़्तों से संघर्ष चल रहा है जिसमें ग़ज़ा की तरफ़ से इसराइल पर रॉकेट बरसाए जा रहे हैं तो इसराइल भी ग़ज़ा में आक्रामक कार्रवाई कर रहा है जिसमें कई लोगों की जान चली गई है.
ग़ज़ा से आए ऐसे ही एक रॉकेट हमले में सौम्या संतोष की जान चली गई.

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प्रसाद ऐले सौम्या संतोष को जानते थे और इस संघर्ष के बीच वो ख़ुद भी उन्हीं हालात से गुज़र रहे हैं.
अश्कलोन में ही रहने वाले प्रसाद कहते हैं, “सौम्या जहां रहती थीं वो उनके घर से 50 मीटर की दूरी पर है. अगर रॉकेट ज़रा भी ईधर-उधर हुआ होता तो वो मेरे घर पर गिरता. पिछले साल भी मेरे घर से कुछ दूरी पर रॉकेट गिरा था. हमारी जान तो आयरन डोम के कारण बची हुई है.”
अश्कलोन ग़ज़ा से लगभग 43 किलोमीटर की दूरी पर है. ऐसे में रॉकेट हमलों का वहां ज़्यादा असर दिख रहा है और लोगों को जान बचाने का मौक़ा भी कम मिल रहा है.
ग़ज़ा के बेहद नज़दीकी इलाक़ों में लोगों को शेल्टर (सेफ्टी रूम) में जाने के लिए बस 15 सेकेंड का वक़्त मिलता है.
‘पूरी रात बार-बार बजता रहा सायरन’
इसराइल में जब रॉकेट से हमला होता है तो लोगों को सायरन बजाकर अलर्ट किया जाता है. तब उन्हें तुरंत घर में ही ज़मीन के नीचे बने शेल्टर यानी सेफ्टी रूम में जाना होता है. यहां पर रॉकेट के हमले का असर नहीं होता.
ऐसे शेल्टर लगभग हर घर में बने हैं लेकिन कुछ पुराने घरों में नहीं हैं. सौम्य जिस घर में थीं वहां भी ऐसा शेल्टर नहीं था. कुछ पब्लिक शेल्टर भी हैं जहां कई लोग एकसाथ इकट्ठा हो सकते हैं.
प्रसाद बताते हैं, “12 तारीख़ तक ऐसा हाल था कि रात भर हम सो नहीं पा रहे थे. मिनट-मिनट में सायरन बजता था. अंधाधुंध फ़ायरिंग होती है. जाने कितनी बार मुझे और जिनकी मैं देखभाल करता हूं उन्हें लेकर शेल्टर में जाना पड़ा था. अब अलर्ट कुछ कम आ रहे हैं.”
प्रसाद तेलंगाना में सिरीसिल्ला ज़िले के रहने वाले हैं. वो 13 साल पहले इसराइल आए थे और तब से यहां केयरगिवर यानी देखभाल करने का काम कर रहे हैं.
उनके जैसे कई भारतीय हैं जो सालों से इसराइल में रहकर नौकरी कर रहे हैं.
‘हवा में ब्लास्ट होते रॉकेट देखे’

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यहां तेलंगाना से इसराइल आए भारतीयों की एक इसराइल तेलंगाना एसोसिएशन भी है जिसके अध्यक्ष हैं रवि सोमा, जो तेलंगाना में निज़ामाबाद ज़िले में रहते हैं. उनके परिवार में मां, पत्नी और दो बच्चे हैं.
रवि सोमा 14 साल से तेल अवीव में केयरगिवर का काम कर रहे हैं.
मौजूदा स्थितियों को लेकर रवि सोमा कहते हैं, “यहां रॉकेट की समस्या नई नहीं है. पूरे साल भर अश्कलोन जैसे इलाक़े में रॉकेट गिरते रहते हैं और रोज़ अलर्ट के लिए सायरन बजता है. लेकिन, पिछले कुछ हफ़्तों में ये बहुत ज़्यादा हो गया है. तेल अवीव में ऐसा नहीं था लेकिन अब यहां भी रॉकेट बरस रहे हैं.”
“सायरन बजने के दो मिनट के अंदर हमें सेफ्टी रूम में जाना होता है. वहां पहुँच जाने पर हमें कोई दिक़्क़त नहीं होती.”
रवि सोम के मुताबिक़ इसराइल में तेलंगाना के 700-800 लोग हैं और आंध्र प्रदेश के क़रीब आठ हज़ार.
तेलंगाना के ही महेश्वर गौड़ भी तेल अवीव के रमादगन इलाक़े में छह साल से काम कर रहे हैं. वो एक सुपर मार्केट में फ्लोर मशीन चलाते हैं.
उन्होंने बताया, “कुछ दिनों पहले तो हाल ऐसा था कि हम 50 बार सेफ्टी रूम में गए थे. डर का माहौल बना हुआ था. हम आपस में बात कर एक-दूसरे का हाल पूछते रहते हैं. हम ख़ुद देखते हैं कि कैसे हवा में ही रॉकेट ब्लास्ट हो जाते हैं. अगर वो नीचे गिरें तो हज़ारों लोग मर जाएंगे.”
फ़िलहाल इसराइल के कई इलाक़ों में ऐसे ही हालात हैं और हर दिन मुश्किलों भरा है. हालांकि, फिर भी यहां रह रहे भारतीयों का कहना है कि उन्हें इसराइल का माहौल पसंद आता है.
भारत से इसराइल जाने वाले लोगों की बड़ी संख्या केयरगिवर की है. इसके अलावा यहां आईटी प्रोफ़ेशनल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी हैं जो अधिकतर मेनटेनेंस का काम करते हैं.

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इसराइल में भारत के क़रीब 12,500 लोग रहते हैं जिनमें से 11,500 केयरगिवर हैं. बाक़ी हीरा व्यापारी, आईटी प्रोफ़ेशनल और विद्यार्थी हैं.
इसराइल क्यों आते हैं भारतीय
इसराइल में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि इसराइल में दो तरह के भारतीय हैं. एक तो वो जो भारत से यहां काम करने आते हैं और हमेशा भारतीय नागरिक के तौर पर ही रहते हैं. उन्हें इसराइल की नागरिकता नहीं मिलती.
दूसरे हैं यहूदी-भारतीय जिनके पास इसराइल की नागरिकता है और वो इसराइल में ही बस गए हैं.
बिना इसराइली नागरिकता वाले लोगों की बात करें तो यहां केयरगिवर के तौर पर आने का सबसे ज़्यादा प्रचलन है.
हरेंद्र मिश्रा बताते हैं, “इसकी दो तीन वजहें हैं. एक तो यहां मिलने वाली तनख्वाह भारत और खाड़ी देशों से कहीं ज़्यादा है. खाड़ी देशों में काम कर चुके लोग बताते हैं कि तनख्वाह में तीन गुने का अंतर है. इसके अलावा यहां के नियम-क़ानून और सुविधाएं भी लोगों को आकर्षित करती हैं.”
भारत से सबसे ज़्यादा लोग केरल से आते हैं. इसके अलावा तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात से भी भारतीय रहते हैं.
भारत के अलावा फ़िलिपींस, नेपाल और श्रीलंका से भी केयरगिवर के तौर पर लोग इसराइल आते हैं.
रवि सोमा बताते हैं, “इसराइल में हमें लगता है कि जैसे हम भारत में ही रह रहे हैं. यहां लोग हमसे बहुत अच्छा व्यवहार करते हैं. हम उसी घर में रहते हैं और साथ खाना खाते हैं. कोई शिकायत करनी हो या किसी एजेंसी से संपर्क करना हो तो जल्दी मदद मिलती है.”
“यहां तनख्वाह भी बहुत अच्छी है. भारतीय रुपयों के हिसाब से यहां एक लाख तक तनख्वाह होती है जबकि खाड़ी देशों में इसी काम के लिए 30 से 40 हज़ार रुपये मिलते है.”

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इसराइल आने के लिए भाषा का कोई बड़ा टेस्ट भी नहीं देना होता. जैसे हिब्रू जानना ज़रूरी नहीं है बस अंग्रेज़ी आती हो लेकिन आईलेट्स की तरह परीक्षा नहीं होती.
केयरगिवर का काम के लिए नर्स होना भी ज़रूरी नहीं है. सिर्फ़ इस काम का अनुभव होना चाहिए.
रवि सोमा ने बताया कि इस काम के लिए मेडिकल केयर की न्यूनतम जानकारी होना ज़रूरी है जैसे बीपी, शुगर चेक करना, दवा देना. इसके लिए भारत में शॉर्ट टर्म कोचिंग भी दी जाती है.
हीरों के भारतीय व्यापारी
इसराइल में वो भारतीय भी हैं जो ज़्यादातर हीरों के व्यापारी हैं. उनकी संख्या बहुत कम है लेकिन उनका इसराइल से काफ़ी पुराना नाता है.
हरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि सन् 1983 में 30 भारतीय जैन परिवार इसराइल आए थे जो हीरों का व्यापार करते थे. वो लगभग यहां बस गए हैं.
भारत और इसराइल के कूटनीतिक संबंध जनवरी 1992 में बने. लेकिन, उन्हें यहां रहने की विशेष इजाज़त दी गई थी.
अब भी उनके पास भारतीय नागरिकता ही है क्योंकि वो यहूदी नहीं हैं और उन्हें इसराइल की नागरिकता नहीं मिल सकती.
भारत और इसराइल के बीच होने वाले द्विपक्षीय व्यापार में सुरक्षा संबंधी व्यापार को छोड़ दें तो बाक़ी 50 प्रतिशत से भी अधिक व्यापार हीरों में होता है. इसी के मद्देनज़र इसराइल ने उन्हें विशेष अधिकार दिया हुआ है.
हरेंद्र मिश्रा ने बताया, “जब दोनों देशों के बीच संबंध अच्छे हो गए तो आईटी पेशेवरों का भी यहां आना-जाना शुरू हो गया. यहां की आईटी कंपनियों ने भारत में अपने दफ़्तर खोले हैं. उन्होंने लोगों को नौकरी पर रखा और यहां ट्रेनिंग के लिए लाते रहे हैं.”
“कुछ भारतीय कंपनियों भी यहां आई हैं. यहां टीसीएस और एलएंडटी का दफ़्तर है. इन कंपनियों से संबंधित पेशेवर यहां पर रहते हैं.”
यहूदी मूल के भारतीय
इसराइल में रहने वाले भारतीयों में यहूदी मूल के भारतीयों की संख्या सबसे ज़्यादा है. ये यहूदी-भारतीय कहलाते हैं.
इसराइली दूतावास के मुताबिक़ ये क़रीब 85 हज़ार हैं जिनमें सबसे ज़्यादा बनी इसराइली हैं.
ये समुदाय चार तरह के हैं- बनी इसराइली, कोचीनी यहूदी, बग़दादी यहूदी और बनी मनाशे. इन्हें इसराइल की नागरिकता प्राप्त है.
हरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि बनी इसराइली का मतलब है इसराइल के बच्चे. ये महाराष्ट्र और गुजरात के इलाक़ों से आते हैं. इनकी संख्या 55 से 60 हज़ार के क़रीब है. इन लोगों ने 50 के दशक के आसपास इसराइल आना शुरू किया और लगातार आते रहे. इस मूल के तक़रीबन पाँच हज़ार लोग ही भारत में बचे हैं.

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बीबीसी मराठी संवाददाता ओंकार करमबेलकर कई बनी इसराइली लोगों से परिचित रहे हैं.
वह बताते हैं, “बनी इसराइली कभी-कभी भारत आते हैं, पुरानी यादें ताज़ा होती हैं, भावुक भी होते हैं लेकिन अब इसराइल उनका घर बन गया है. उन्हें मराठी भाषा भी आती है और उनके रीति-रिवाजों में मराठी संस्कृति की झलक भी दिखती है. भारत के लिए उनके मन में एक अलग जगह है जहां वो पले-बढ़े हैं.”
दूसरा समुदाय कोचीनी यहूदियों का है जो केरल के कोचीन इलाक़े से आए हैं. उनकी संख्या 20 से 25 हज़ार के क़रीब है.
तीसरा समुदाय बग़दादी यहूदियों का है जो कोलकाता से आए हैं. ये ज़्यादातर इंग्लैंड चले गए. इसराइल में उनकी संख्या एक हज़ार से कम है.
चौथा समुदाय बनी मेनाशे है. ये मणिपुर और मिज़ोरम से आते हैं. इस समुदाय के अभी भी भारत में छह से सात हज़ार लोग रह रहे हैं. मनाशे यहूदियों की एक जनजाति है. इसका मतलब मनाशे जनजाति के बच्चे.
हरेंद्र मिश्रा के मुताबिक़ इसराइल में तक़रीबन 2500 बनी मनाशे आ चुके हैं. इस समुदाय के हर साल क़रीब सौ लोग भारत से इसराइल में आ रहे हैं. यहां से कुछ हिब्रू स्कूल भी मणिपुर-मिज़ोरम में खुले हुए हैं. वहां इस समुदाय के लोग पढ़ रहे हैं. उन्हें इसराइल में बसने में मदद की जाती है.
भारतीयों की छोटी-सी संख्या फ़लस्तीनी इलाक़ों में भी रहती है. हरेंद्र मिश्रा के मुताबिक़ उनमें ज़्यादातर महिलाएं हैं जिन्होंने किसी फ़लस्तीनी से शादी की है और वहां रह रही हैं. लेकिन, वो फ़िलहाल मीडिया से दूर ही हैं.
फ़िलहाल इसराइल और फ़लस्तीनियों में चल रहे संघर्ष के बीच इसराइली हो, फ़लस्तीनी या भारतीय किसी के लिए भी जीवन सामान्य नहीं है. जब तक शांति नहीं हो जाती तब तक हर दिन ज़िंदगी दांव पर लगी हुई है.
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