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जॉर्डन: पूर्व क्राउन प्रिंस की नज़रबंदी आख़िर क्यों चौंकाने वाली है
अरब देशों में राजनीतिक स्थिरता के लिए सराहे जाने वाले जॉर्डन में पूर्व क्राउन प्रिंस हमज़ा बिन हुसैन के नज़रबंद होने की ख़बर ने दुनिया को चौंका दिया है.
कोरोना और सुस्त अर्थव्यवस्था से पहले से जूझ रहे जॉर्डन के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है.
वैसे जॉर्डन में उच्च स्तर के राजनीतिक लोगों को क़ैद करना सामान्य घटना नहीं मानी जाती.
इससे पहले अपने वकील के जरिए बीबीसी को भेजे एक वीडियो में प्रिंस हमज़ा ने अपनी नज़रबंदी की ख़बर बताई थी.
उन्होंने कहा था कि सरकार की आलोचना करने वाले कई लोगों पर हुई कार्रवाई के तहत मुझे नज़रबंद कर दिया गया है.
अल-सलाम पैलेस में नज़रबंदी
प्रिंस के मुताबिक़, उनके साथ सभी स्टाफ़ और परिजनों को राजधानी अम्मान के बाहरी इलाके में मौज़ूद अल-सलाम पैलेस में नज़रबंद किया गया है.
नज़रबंद होने वाले कुल 16 लोगों में देश के पूर्व वित्त मंत्री और देश में आर्थिक सुधार में मुख्य भूमिका निभाने वाले अर्थशास्त्री वसीम अवदल्लाह और शाही परिवार के एक सदस्य शरीफ़ हसन बिन ज़ायद भी हैं.
प्रिंस हमज़ा तक पहुंचने वाले संचार के सभी साधनों पर भी रोक लगा दी गई है.
उन्होंने कहा था कि ''चीफ़ ऑफ स्टाफ़ ने मुझे बताया कि आप न तो बाहर जा सकते हैं और न ही किसी से बात कर सकते हैं.''
उनके अनुसार, ''सरकार ने आरोप लगाया है कि मैंने उसकी नीतियों की आलोचना की है या कई बैठकों में शाह का विरोध किया है.''
प्रिंस हमज़ा का वीडियो
प्रिंस हमज़ा ने अपने वीडियो में कहा है, "शासन में टूट-फूट का जिम्मेदार मैं नहीं हूं, बल्कि हमारे शासन में पिछले 15 से 20 सालों से मौजूद भ्रष्टाचार और अक्षमता इसके लिए जिम्मेदार है."
उन्होंने कहा कि ''सरकारी संस्थाओं में लोगों के कम हो रहे भरोसे के लिए भी मैं जवाबदेह नहीं हूं.''
प्रिंस के मुताबिक, ''हालत यहां तक ख़राब है कि कोई भी किसी मसले पर अपनी बात कह नहीं सकता, क्योंकि ऐसा करने पर उसे परेशान किया जाता है, धमकाया जाता है या गिरफ़्तार कर लिया जाता है.''
इस मामले में प्रिंस हमज़ा की मां और जॉर्डन के पूर्व शासक किंग हुसैन की पत्नी क्वीन नूर ने भी अपनी राय रखी है.
एक ट्वीट में उन्होंने कहा, "दुआ कर रही हूं कि इस बदनामी का दाग़ जिन बेगुनाहों पर लगा है, उनके मामले में सच की जीत होगी और न्याय होगा."
नज़रबंदी क्यों हुई
जॉर्डन के उप-प्रधानमंत्री अयमान सफ़ादी ने प्रिंस हमज़ा पर सरकार के तख़्तापलट की कोशिश करने का आरोप लगाया है. सफ़ादी का आरोप है कि प्रिंस ने कबायली नेताओं को सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट करने की कोशिश की थी.
स्थानीय समाचार एजेंसी पेत्रा से बातचीत में सफ़ादी ने कहा कि प्रिंस 'विदेशी ताक़तों' के साथ मिलकर देश को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे थे.
सरकार ने यह भी कहा है कि तख़्तापलट की कोशिश को 'शुरू में ही ख़त्म' कर दिया गया है. हालांकि इन आरोपों का खंडन करते हुए प्रिंस हमज़ा ने कहा है कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है और न ही वे किसी साजिश का हिस्सा रहे हैं.
बीबीसी के सुरक्षा संवाददाता फ्रैंक गार्डनर ने ताज़ा घटनाक्रम का आकलन किया है. उनका कहना है कि ये मामला शाही परिवार के अंदरूनी संकट का नतीज़ा है जो अब हाथों से निकलता मालूम पड़ रहा है.
उनके अनुसार. सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था से लोग थोड़े नाराज़ थे, जबकि कोरोना आने के बाद यह नाराज़गी और बढ़ गई है. प्रिंस हमज़ा ने भी अपने वीडियो में सरकार पर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और अक्षम होने का आरोप लगाया है.
प्रिंस हमज़ा कौन हैं
प्रिंस हमज़ा देश के शासक किंग अब्दुल्ला द्वितीय के सौतेले भाई होने के साथ पूर्व शासक किंग हुसैन के बेटे भी हैं.
साल 1999 में किंग हुसैन के निधन के बाद किंग अब्दुल्ला जब शासक बने, तब उन्होंने अपने बेटे के बजाय सौतेले भाई हमज़ा को अपना वारिस बनाया था.
बताया जाता है कि प्रिंस हमज़ा की मां क्वीन नूर पूर्व शासक हुसैन की सबसे प्रिय रानी थीं.
हालांकि साल 2004 में हमज़ा को इस पद से हटा दिया गया था और साल 2009 में अब्दुल्ला ने अपने बेटे हुसैन बिन अब्दुल्ला को क्राउन प्रिंस बना दिया था.
माना जा रहा है कि इसके बाद से ही प्रिंस हमज़ा और किंग अब्दुल्ला के आपसी संबंध असहज हो गए.
जॉर्डन के संविधान के अनुसार राजा का स्वाभाविक उत्तराधिकारी उनका पुत्र ही होता है बशर्ते राजा अपने किसी भाई को अपना वारिस न बनाएं.
हाल में प्रिंस ने कबायली नेताओं के साथ मुलाकात की थी. इस मुलाक़ात में इन नेताओं ने प्रिंस के प्रति अपना समर्थन जताया था.
माना जाता है और सरकार ने भी इसे माना है कि प्रिंस का यह कदम उसे नागवार गुजरा.
जॉर्डन: रेगिस्तान में नखलिस्तान
अरब देशों में आज़ादी और लोकतंत्र के मामले में जॉर्डन एक अलग स्थान रहा है.
यही वजह है कि जब साल 2011 में अरब जगत में राजनीतिक आज़ादी और लोकतंत्र की बहाली को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुआ, तब भी जॉर्डन इससे लगभग अछूता रहा.
इस स्थिरता के लिए कई लोग जॉर्डन को 'रेगिस्तान में नखलिस्तान' क़रार देते हैं.
साल 1946 में आज़ाद हुए जॉर्डन में साल 1952 से संवैधानिक राजतंत्र है. यहां शासन का नियंत्रण राजा के हाथों में होता है, लेकिन उन्हें सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री और उनका मंत्रिमंडल होता है.
देश में दो सदन वाली संसद भी है. सऊदी अरब, इराक, सीरिया और इसराइल से घिरा ये देश मानव सूचकांक में बेहतर स्थिति में है.
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