बिन्यामिन नेतन्याहू ने जॉर्डन घाटी पर क़ब्ज़े की बात क्यों कही?: नज़रिया

    • Author, हरेंद्र मिश्र
    • पदनाम, यरुशलम से, बीबीसी हिंदी के लिए

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने मंगलवार को एक विवादास्पद बयान में कहा कि अगर 17 सितंबर के आम चुनावों में जनता उन्हें दोबारा चुनती है तो वो पश्चिम तट की जॉर्डन घाटी पर क़ब्ज़ा कर लेंगे.

देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वो पश्चिम तट के कई और इलाक़ों को इसराइली नियंत्रण में लेने के अपने पुराने वादे के लिए प्रतिबद्ध हैं.

वो ये क़दम अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के साथ तालमेल बनाकर उठाएंगे. ट्रंप ने ऐलान किया है कि वो अपना मध्य पूर्व शांति प्रस्ताव इसराइली चुनावों के बाद ही पेश करेंगे.

माना जा रहा है कि नेतन्याहू का ये रुख़ इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष ख़त्म करने की कोशिशें नाकाम कर देगा और दो राष्ट्रों के निर्माण द्वारा समस्या का बहुचर्चित हल निकालने की प्रक्रिया को पूरी तरह से विफल कर देगा.

फ़लस्तीनी क्षेत्र के नेताओं ने इसकी निंदा करते हुए कहा है कि नेतन्याहू ने अमन की उम्मीद पर पानी फेर दिया है. वहीं इसराइल के विपक्षी नेताओं और विश्लेषकों ने इसे दक्षिणपंथी समर्थकों के वोट हासिल करने की 'घिनौनी कोशिश' कहा है.

नेतन्याहू ने क्यों दिया ऐसा बयान?

क्या नेतन्याहू का ये बयान वाकई एक 'ऐतिहासिक अवसर' है, जैसा वो बता रहे हैं, या चुनावी सर्वेक्षणों से उदासीन नेता की एक उन्मत्त कोशिश?

नेतन्याहू पिछले चुनावों में भी विवादस्पद वक्तव्य देते रहे हैं, जिसकी भर्त्सना होती रही है, मगर चुनाव जीतने के बाद उन्होंने उन पर अमल नहीं किया.

नेतन्याहू पिछले साढ़े दस साल से प्रधानमंत्री पद पर हैं और इसराइल के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का कीर्तिमान पिछले जुलाई महीने में उनके हाथ आया.

बीते ढाई साल में उन पर डोनल्ड ट्रंप और बड़े पैमाने पर उदासीन अंतरराष्ट्रीय समुदाय का किसी भी प्रकार का दबाव नहीं था.

ट्रंप ने तो उनका इस कदर साथ दिया कि अप्रैल में हुए चुनाव के दौरान ट्रंप पर इसराइल चुनावों नतीजों पर असर डालने की कोशिश करने का इल्ज़ाम तक लगा.

अमरीकी राष्ट्रपति ने तब नेतन्याहू का खुलकर साथ दिया और उपहार के तौर पर विवादस्पद गोलान हाइट्स को चुनाव के ठीक पहले इसराइल का हिस्सा क़रार दिया.

इस दौरान, जब इसराइल और नेतन्याहू पर किसी प्रकार का दबाव नहीं था, उन्होंने वेस्ट कोस्ट के इलाकों के कब्ज़े को लेकर कोई कदम नहीं उठाया.

फ़लस्तीन के साथ शांति समझौता

ऐसा नहीं है कि नेतन्याहू शांति समझौता नहीं चाहते हैं. दो दशक से पहले लिखी गई अपनी किताब में उन्होंने 'दीर्घकालीन शांति' का प्रस्ताव रखते हुए कहा था कि ये तभी संभव है जब इसराइल का वेस्ट कोस्ट के अधिकांश हिस्सों पर नियंत्रण हो और फलस्तीनी लोग अर्ध-स्वायत्त एन्क्लेव की एक श्रृंखला में रहें.

यही कारण है कि उन्होंने फलस्तीनियों के लिए कभी कोई असल रियायत नहीं की, सिवाय इसके कि वो अपने पहले कार्यकाल में ओस्लो समझौते की शर्तों पर न्यूनतम स्तर पर पालन करते रहे.

लेकिन जैसा कि वो अपनी किताब में लिखते हैं, "इच्छा के मुताबिक़ परिणाम आने में लंबा वक़्त लगेगा और ये शायद उनके जीवनकाल में न हो पाए. तब तक इसरायल को इसके लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, खास तौर पर तब, जब ईरान के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ बनाने जैसी बहुत ज़रूरी प्राथमिकताएं हों."

गौरतलब है कि नेतन्याहू ने पिछले चुनाव के पहले भी एक साक्षात्कार में माले अदुमिम और गुश एटज़ियोन की बस्तियों को कब्ज़ा करने का एलान किया था मगर चुनाव जीतने के बाद उस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया.

पिछले चुनाव के बाद हुए गठबंधन (जो बाद में टूट गया) में उन्होंने अपने दक्षिणपंथी सहयोगियों की ओर से ये याद दिलाये जाने पर इसे नज़रअंदाज़ कर दिया था. विश्लेषकों का मानना है कि इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा और ये महज़ चुनाव जीतने की रणनीति का हिस्सा है.

हार का डर तो नहीं!

दैनिक अखबार 'हारेत्ज़' के समीक्षक अनशेल फेफर ने इसे दक्षिणपंथी वोटों के लिए एक 'एतिहासिक प्रयास' करार दिया है.

उन्होंने लिखा है, "नेतन्याहू उन चुनावी विश्लेषणों को पढ़ते हैं, जो हम सभी देख रहे हैं, और साथ ही कई और जो निजी तौर पर कमीशन करते हैं. वो जानते हैं कि अगले मंगलवार को उनके सिकुड़ते गठबंधन की जीत की संभावनाएं बहुत कम हैं. अब अपने पद पर बने रहने का उनके पास सबसे अच्छा मौका ब्लू एंड व्हाइट पार्टी के साथ एक राष्ट्रीय एकता सरकार बना कर ही संभव है. लेकिन ब्लू एंड व्हाइट पार्टी के नेता बेनी गैंट्ज़ ने साफ़ तौर पर आपराधिक मामलों में लिप्त एक प्रधानमंत्री की सरकार में बैठने की गुंजाइश से भी इनकार किया है."

नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के चार आरोप दर्ज हैं और अगर वो चुनाव हारते हैं तो संकट में पड़ सकते हैं.

उन्होंने इन आरोपों का खंडन किया है लेकिन साथ ही वो अपने संभावित गठबंधन की पार्टियों के साथ अप्रैल चुनावों के बाद एक ऐसे नियम को लागू करने की कोशिशों में नज़र आए जिसके ज़रिये पदासीन प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ अभियोग न लाया जा सके.

नेतन्याहू के बयान पर अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या वो वाकई एक 'ऐतिहासिक अवसर' पर नज़र लगाए हुए हैं या अपने राजनीतिक अस्तित्व और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनाव में जीत के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं?

चुनाव के ठीक एक सप्ताह पहले ऐसे बयान का अर्थ घबराहट का संकेत है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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