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सीरिया की जंग के दस साल, और दस ख़ास बातें
"पिछले 10 सालों में दुनिया ने सीरिया संघर्ष के दौरान भारी बर्बादी और ख़ूनख़राबा देखा है. सीरियाई नागरिकों ने व्यवस्थित तरीके से और बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का सामना किया है. संघर्ष में शामिल पक्षों ने भी बार-बार अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन किया, पर वे अब तक किसी भी तरह की सजा से बचे रहे हैं."
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का ये बयान सीरिया में लड़ाई छिड़ने की 10वीं वर्षगांठ पर आया है.
अब से 10 साल पहले यानी 15 मार्च, 2011 को सीरिया के दक्षिणी शहर डेरा में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन के बाद हिंसा भड़की थी. यह प्रदर्शन लोकतंत्र बहाली को लेकर सीरिया के कई पड़ोसी देशों में फैले अरब स्प्रिंग के प्रभाव में हुआ था. गुटेरेस के शब्दों में कहें तो यह सीरिया के लिए बहुत डरावना सपना साबित हुआ.
सीरिया सरकार ने जब डेरा में प्रदर्शनकारियों की आवाज़ दबाने के लिए बल प्रयोग किया, तो पूरे देश में राष्ट्रपति बशर अल असद के इस्तीफ़े की मांग करते हुए आंदोलन भड़क उठा. इसके बाद जैसे—जैसे आंदोलन बढ़ा, वैसे—वैसे दमन भी बढ़ता गया.
फिर पूरे देश में हिंसा तेजी से फैलती गई. विपक्ष के समर्थकों ने हथियार उठा लिए और इस तरह सीरिया गृह युद्ध में जा फॅंसा. इसके बाद देश में हजारों विद्रोही समूहों उभर कर सामने आए. ज्यादा समय नहीं लगा जब यह संघर्ष सीरियाई नागरिकों के बीच राष्ट्रपति असद के पक्ष और विपक्ष का युद्ध बनकर रह गया.
संघर्ष का अंत
विदेशी शक्तियों ने भी किसी न किसी का पक्ष लेने के साथ ही पैसे, हथियार और लड़ाके भेजना शुरू किया. करेले पर नीम तब चढ़ गया जब खुद को 'इस्लामिक स्टेट' कहने वाले चरमपंथी संगठन और अलक़ायदा जैसे कई अतिवादी जिहादी संगठन भी अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए इस संघर्ष में कूद पड़े.
दस सालों बाद भी इस संघर्ष का कोई अंत निकट नहीं दिख रहा है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस लड़ाई में अब तक तीन लाख 87 हजार लोग मारे जा चुके हैं. 2011 में क़रीब आधी आबादी को मज़बूरन देश छोड़ना पड़ा, वहीं 60 फीसदी लोग भयानक ग़रीबी के दलदल में जा धॅंसे हैं.
इस संघर्ष ने सीरिया के युवाओं की जिंदगी तबाह कर दी है. शिक्षा और नौकरी से वे वंचित रहे ही, अपना घर बसाने में भी वे कामयाब नहीं हुए हैं.
सीरिया संघर्ष की भयावहता को बयान करते कुछ आंकड़ें यहां पेश किए जा रहे हैं.
1. पांच लाख से ज्यादा लोग मारे गए या गायब हैं
ब्रिटेन की संस्था सीरियन ऑब्जरवेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स यानी एसओएचआर के अनुसार, मार्च 2011 में लड़ाई की शुरुआत से दिसंबर 2020 तक लगभग 3,87,118 लोग मारे गए हैं. इनमें से 1,16,911 लोग आम नागरिक हैं. संस्था के अनुसार इनमें वैसे 2,05,300 लोग शामिल नहीं हैं, जो अब तक गायब हैं.
एसओएचआर के अनुसार, इनमें सरकारी जेलों में दमन से मरे लगभग 88 हजार लोग भी शामिल हैं. बच्चों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ़ के अनुसार, इस संघर्ष में 12 हजार से ज्यादा बच्चे भी मारे गए हैं. एसओएचआर का यह भी कहना है कि सीरिया के संघर्ष में क़रीब 21 लाख लोग स्थायी तौर पर अपंग हो चुके हैं.
2. एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने छोड़ा अपना घर
लड़ाई के पहले सीरिया की कुल 2.2 करोड़ की आबादी में से क़रीब आधे लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा. संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी संस्था यूएनएचसीआर के अनुसार, इनमें से 67 लाख लोग अपने ही देश में एक जगह से दूसरी जगह विस्थापित हुए. वहीं 56 लाख लोगों ने विदेशों में जाकर शरण ली.
इनमें क़रीब 93 फीसदी लोगों ने लेबनान, जॉर्डन और तुर्की में शरण ली है. इसे मानव इतिहास के सबसे बड़े शरणार्थी समस्याओं में से एक माना जा रहा है. हालत यह है कि अब तक 10 लाख से ज्यादा सीरियाई बच्चे देश से बाहर पैदा हुए हैं.
3. देश की 90 फीसदी आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे रह रही है
संयुक्त राष्ट्र संघ का आकलन है कि संघर्ष के चलते सीरिया के 20 लाख से ज्यादा लोग दयनीय ग़रीबी में गुज़र—बसर कर रहे हैं.
4. कुल 1.34 करोड़ लोगों को किसी भी तरह की मानवीय मदद की जरूरत है
संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, ऐसे लोगों में से क़रीब 60 लाख लोग अपनी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी करने में नाकाम हैं. यूनिसेफ़ का मानना है कि बच्चों की हालत सबसे ज़्यादा ख़राब है और उनमें से क़रीब 90 फीसदी को किसी तरह की मदद ज़रूर चाहिए. हालत इतनी ख़राब है कि कई परिवारों के पास अब कुछ भी नहीं बचा है.
इदलिब में एक टेंट में गुज़ारा कर रहे 28 साल की नूर अल-शाम ने बीबीसी को बताया, "पहले हम इदलिब के दक्षिण में एक घर में अपने परिवार के साथ रहते थे, जहां हमारे पास सब कुछ था. लेकिन अब मैं इदलिब के उत्तर में एक टेंट में आदिम समय की जिंदगी ग़ुजर—बसर कर रही हूं.''
उन्होंने बताया, ''भविष्य के लिए न तो मेरा और न ही अपने बेटे के लिए कोई सपना है. मेरे पति तुर्क़ी में कमाने के लिए हमें छोड़कर गए और तब से हम उन्हें नहीं देख सके.''
5. एक करोड़ से ज्यादा सीरियाई भुखमरी के कग़ार पर
रेडक्रॉस के अनुसार, देश की क़रीब 60 फीसदी आबादी ऐसी दशा में रह रही है. यूनिसेफ़ के अनुसार, 50 लाख से ज्यादा लोग कुपोषित हैं. वहीं पॉंच साल से कम उम्र के पांच लाख बच्चों का विकास गंभीर कुपोषण के चलते रुक गया है.
6. महंगाई चरम पर पहुंची
चीज़ों की कीमत पिछले एक दशक में 236 फ़ीसदी तक बढ़ गई है. संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, युद्ध के पहले के स्तर से तुलना करें तो कीमत का यह स्तर 29 गुना ज्यादा है.
7. 24.5 लाख से ज्यादा किशोर स्कूल से वंचित हैं
यूनिसेफ़ के अनुसार पड़ोसी देशों में रह रहे 7.5 लाख बच्चे भी स्कूल की पहुंच से दूर हैं. इनमें से 40 फीसदी लड़कियां हैं. इस बदतर हालत की एक वज़ह युद्ध में क़रीब एक तिहाई स्कूलों का बर्बाद हो जाना भी रही है.
8. देश के केवल आधे अस्पतालों में इलाज़ हो रहा है
सीरिया के केवल 58 फीसदी अस्पतालों और 53 फीसदी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही फिलहाल काम कर रहे हैं. फिजिशियंस फॉर ह्यूमन राइट्स नामक एनजीओ के अनुसार, मार्च 2020 तक 350 स्वास्थ्य संस्थानों पर कुल 595 हमले हो चुके हैं. इस चलते कुल 923 स्वास्थ्य कर्मियों की मौत हो चुकी है. यह तब है जब स्वास्थ्य कर्मियों को युद्ध के दौरान भी 'सुरक्षित' वाला दर्ज़ा मिला होता है.
9. केवल अलेप्पो में 35 हजार से ज्यादा ढ़ांचे ध्वस्त हुए
सीरिया संघर्ष में पूरे देश में जबरदस्त तबाही हुई है. संयुक्त राष्ट्र के सैटेलाइट विश्लेषण के अनुसार, 2016 में सरकार के कब्ज़े में आने के पहले केवल अलेप्पो में ही 35 हज़ार से ज़्यादा ढांचे ध्वस्त हो गए थे. सीरिया के ज्यादातर सांस्कृतिक विरासत भी इस लड़ाई में बर्बाद हो गए हैं. यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में सीरिया के छह स्थान शामिल हैं लेकिन इनमें से सभी को व्यापक क्षति पहुंची है.
10. रासायनिक हथियारों के 38 हमले दर्ज़ किए गए
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अनुसार इनमें से 32 हमलों की वजह सीरिया का शासन रही है.
कौन है संघर्ष में शामिल?
पिछले दशक के दौरान असद सरकार के मुख्य समर्थक रूस और ईरान रहा है, जबकि तुर्की, पश्चिमी ताक़तें और खाड़ी के कई देशों ने उनके विरोधियों का समर्थन किया.
रूस, जिसका लड़ाई से पहले से ही सीरिया में सैन्य बेस रहा है, ने सीरिया सरकार के समर्थन में 2015 में हवाई अभियान शुरू किया था. असल में असद सरकार के पक्ष में पूरा माहौल पलटने में इस मुहिम की बड़ी असरकारक भूमिका रही है.
माना जाता है कि ईरान ने भी सीरिया में असद की मदद के लिए भारी सैन्यबल के साथ अरबों डॉलर का खर्च किया है.
ईरान ने सीरिया की सेना की मदद करने के लिए हजारों शिया लड़ाकों को भेजा. उसने इन्हें हथियार के साथ-साथ प्रशिक्षण और पैसा भी मुहैया कराया. इनमें से ज़्यादातर लड़ाके जहां लेबनान के हिज़बुल्ला के थे जबकि कुछ ईराक, अफ़ग़ानिस्तान और यमन के भी रहने वाले थे.
दूसरी ओर अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने शुरू में 'नरमपंथी' माने जाने वाले विद्रोहियों का समर्थन भर किया. लेकिन जब वहां ज़िहादी मजबूत हो गए तब इन्होंने विद्रोहियों को कम घातक साबित होने वाली सहायता देने पर ज़ोर दिया.
अमेरिका ने सीरिया की सरकार के ख़िलाफ़ वैश्विक गठबंधन का नेतृत्व किया. उसने 2014 से सीरिया में न केवल हवाई हमले किए बल्कि वहां सेना भी तैनात की. गठबंधन ने कुर्द और अरब लड़ाकों के गठबंधन सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) को मदद पहुंचाई ताकि उत्तर-पूर्व में आईएस चरमपंथियों के कब्ज़े में जा चुके इलाक़ों को जीता जा सके.
विपक्ष का एक मज़बूत सहयोगी तुर्की भी रहा. वहीं सऊदी अरब ने ईरान के असर को रोकने के लिए विद्रोहियों को हथियार और धन से मदद पहुंचाई. इसराइल भी सीरिया में ईरान के बढ़ते दख़ल को लेकर चिंतित रहा और हवाई हमलों के ज़रिए हिज़बुल्ला और अन्य शिया लड़ाकों को काबू में करने की कोशिश करता रहा.
सीरिया में अब किसका कंट्रोल है
सीरिया सरकार ने फिर से देश के बड़े शहरों पर अपना नियंत्रण बना लिया है. लेकिन देश के कई हिस्से अभी भी विद्रोहियों, ज़िहादियों और कुर्दों के नेतृत्व वाले एसडीएफ के कब्ज़े में है. विद्रोहियों का आख़िरी मज़बूत किला अब इदलिब का उत्तर-पश्चिम प्रांत, उत्तरी हमा का पड़ोसी हिस्सा और अलेप्पो का पश्चिमी प्रांत बचा है. फिलहाल यहां लड़ाई रुकी हुई है लेकिन यह कभी भी फिर से भड़क सकती है.
क्या यह लड़ाई कभी रुकेगी?
अभी तो ऐसा होने की कोई उम्मीद नहीं है. लेकिन इस लड़ाई में शामिल सभी पक्षों की राय में इस लड़ाई का राजनीतिक हल निकाला जाना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 2012 जेनेवा समझौते को लागू करने की बात कही है. इसके तहत सबकी सहमति से एक अस्थायी गवर्निंग बॉडी बनायी जाएगी.
सुरक्षा परिषद की मध्यस्थता में नौ दौर तक चली बातचीत (जेनेवा-2 प्रक्रिया) के बाद भी अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है. राष्ट्रपति बशर अल असद विपक्षी राजनीतिक समूह से बातचीत को इच्छुक नहीं है, क्योंकि दूसरे पक्ष राष्ट्रपति का इस्तीफा मांग रहे हैं.
साल 2017 में रूस, ईरान और तुर्की ने अस्ताना प्रक्रिया के तहत राजनीतिक बातचीत शुरू की. इसके एक साल बाद संविधान बनाने के लिए 150 सदस्यों की एक समिति बनाने पर सहमति बनाई गई. तय हुआ कि संविधान बनने के बाद यूएन की देखरेख में निष्पक्ष चुनाव होंगे. लेकिन जनवरी 2021 में यूएन के विशेष दूत जी पेडेरसन ने दुख जताया है कि अभी तक सुधार की कोई रूपरेखा बनाने की शुरुआत भी नहीं हुई है. ऐसे में सीरिया संघर्ष का अंतिम नतीजा क्या होगा कोई नहीं जानता.
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