मुसोलिनी पर गोली चलाने वाली महिला जिसे इतिहास से भुला दिया गया

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- Author, माइकल शील्स मैक्नेमी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
दिन - 7 अप्रैल, साल - 1926. जगह - इटली की राजधानी रोम.
एक आयरिश महिला अचानक भीड़ को चीरती हुई आती हैं और 20वीं सदी के सबसे बदनाम तानाशाहों में से एक बेनिटो मुसोलिनी पर गोली चला देती हैं.
मुसोलिनी अपनी हत्या की इस कोशिश में बच तो जाते हैं लेकिन एक गोली उनकी नाक को छूती हुई निकल जाती. इतिहास में यूरोप में फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष करने के कई व्यक्तिगत किस्सों में वॉयलेट गिबसनका यह किस्सा लगभग भुला दिया गया है.
जिन चार लोगों ने मुसोलिनी को मारने का प्रयास किया था, उनमें वॉयलेट अपने मकसद में सबसे क़रीब पहुँच पाई थीं. अब उस घटना के एक सदी के बाद आयरलैंड के डबलिन में उनके नाम पर एक तख्ती लगाने की कोशिश तेज़ हो गई है.
मुसोलिनी के तीन साल तक सत्ता में रहने के बाद वॉयलेट ने उन्हें मारने की कोशिश की थी. उस वक्त मुसोलिनी एक सभा को संबोधित कर रहे थे. वॉयलेट ने उन पर एक के बाद एक तीन गोलियाँ चलाई थीं. इसके बाद उनकी बंदूक फंस गई थी. वहाँ मौजूद मुसोलिनी के समर्थकों ने उन्हें पकड़ लिया और मारना शुरू कर दिया था. पुलिस ने बीच में दखल देते हुए उन्हें जब गिरफ़्तार किया तब जाकर कहीं उन्हें बचाया जा सका.

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मानसिक रूप से बीमारों के अस्पताल में रखा गया
वायलेट को कुछ दिनों तक इटली के जेल में रखा गया. इसके बाद उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया था. ऐसी आशंका है कि ऐसा सार्वजनिक तौर पर इस मामले की सुनवाई की शर्मिंदगी से बचने के लिए किया गया था.
बाद में उन्हें सेंट एंड्रयू अस्पताल में रखा गया था. वो यहाँ 1956 में अपनी मौत के दिन तक रही थीं. यह मानसिक रूप से बीमारों का अस्पताल था.
हत्या की कोशिश नाकाम होने के कुछ दिनों के बाद आयरिश फ्री स्टेट के कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष डब्ल्यू.टी. कॉसग्रेव ने मुसोलिनी को पत्र लिखकर हमले से बचने की बधाई दी थी.
वॉयलेट गिबसन, एक एंगलो-आयरिश बैरन एशबोर्न एडवर्ड गिबसन की बेटी थीं. वो आयरलैंड के लॉर्ड चांसलर हुआ करते थे. बैरन एशबोर्न की उपाधि धारण करने वाले वो पहले चांसलर थे. लॉर्ड चांसलर का दफ्तर ही उस वक्त देश का सबसे सर्वोच्च क़ानूनी कार्यालय होता था.
डबलिन सिटी के काउंसिल ने अब शहर में वॉयलेट गिबसन के नाम की तख्ती लगाने की इजाज़त दे दी है. इसकी इजाज़त देते हुए कहा गया है कि, "फ़ासीवादी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति को लोगों की नज़र में लाया जाना चाहिए और आयरलैंड के इतिहास में उनकी एक मुकम्मल जगह पक्की की जानी चाहिए."
इतिहास में नहीं मिली जगह
इस प्रस्ताव को लाने वाले डबलिन सिटी के स्वतंत्र काउंसिलर मैनिक्स फ्लाइन ने कहा है कि "वॉयलेट गिबसन को आयरिश और ब्रिटेन के सत्ता प्रतिष्ठानों ने कुछ विषम कारणों से पूरी तरह से नज़रअंदाज कर दिया था."
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ से बातचीत में कहा, "असाधारण काम करने वाले ज़्यादातर लोग ख़ासकर औरतों को, हमेशा पीछे रखा जाता है."
"अगर आप प्रथम विश्व युद्ध या दूसरे विश्व युद्ध को देखें तो उस दौरान महिलाएँ मर्दों के साथ मिलकर लड़ रही थीं लेकिन हमने कभी उनके हिस्से का श्रेय उन्हें उस तरह से नहीं दिया. अब हम उनके हिस्से का श्रेय उन्हें खोज कर दे रहे हैं. यह एक असधारण बात है."
"कुछ अजीब कारणों से वॉयलेट गिबसन को शर्म का विषय बनाया गया. उनसे मुँह मोड़ लिया गया. उनके बारे में यह बताने की कोशिश की गई कि उन्हे अपने किए पर शर्म आ रही थी और वो पागल हो गई थीं."
मैनिक्स फ्लाइन ने बताया कि गिबसन के परिवार ने तख्ती लगाने के प्रस्ताव का समर्थन किया है. उन्होंने उम्मीद जताई है कि आने वाले हफ्तों में अगले चरणों में इस प्रस्ताव को कामयाबी हासिल होगी.
उन्होंने बताया कि संभव है कि ये तख्ती बचपन के उनके घर के पास लगाई जाए जो कि डबलिन के मेरियॉन स्कवायर में है. हालांकि यह इमारत के मौजूदा मालिक की अनुमति पर निर्भर करेगा.

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राजकुमारी से लेकर चर्चिल तक को लिखा खत
2014 में गिबसन की कहानी बड़े पैमाने पर लोगों तक आरटीई की एक रेडियो डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से लाई गई. इस डॉक्यूमेंट्री को सिओबन लाइनम ने तैयार किया था और उनके पति बैरी डोडॉल ने इसके आधार पर बनी एक फ़िल्म का निर्देशन किया था. इसे अभी कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में दिखाया जा रहा है. इस फ़िल्म का नाम है 'वॉयलेट गिबसन, द आयरिश वूमन व्हू शॉट मुसोलिनी.'
इसके अलावा फ्रांसिस स्टोनर-सॉन्डर्स ने 'द वूमन व्हू शॉट मुसोलिनी' नाम की किताब में चित्रों के माध्यम से इसका चित्रांकन किया था. लाइनम बताती हैं, "मुसोलिनी को मारने की कोशिश करने के लिए लोग तीर्थयात्रा तक करते थे लेकिन 50 साल की इस महिला ने उन पर प्वाइंटब्लैंक रेंज यानी बेहद क़रीब से गोली चलाई थी."
बैरी डोडॉल बताते हैं कि उनकी कहानी में एक 'प्रमुख चीज़' यह है कि उन्होंने सेंट एंड्रयू अस्पताल से कई ताकतवर को लोगों को अपनी रिहाई के लिए चिट्ठी लिखी थीं. इसमें उस दौर की राजकुमारी और अब महारानी एलिजाबेथ से लेकर विंस्टन चर्चिल तक शामिल थे.
ये वो लोग थे जो बहुत संभव है कि जब वो आयरलैंड में रह रही थीं तब उनके साथ उन्होंने वक्त गुजारा हो. क्योंकि आख़िरकार वो आयरलैंड की लॉर्ड चांसलर की बेटी थीं.
लाइमन और डोडॉल ने नॉर्थॉम्पटन में उनके खतों को देखा था जो कभी वहाँ नहीं पहुँच सके थे जिनके नाम वो भेजे गए थे. लाइमन बताती हैं, "उन्हें इटली से इस शर्त के साथ लाया गया था कि वो ताउम्र बंदी ही रहेंगी."

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औरत होने का ख़ामियाजा
इन दोनों ही पति-पत्नी, लाइमन और डोडॉल ने इटली में ऐतिहासिक दस्तावेजों में अपनी शोध के दौरान पाया कि मुसोलिनी को मारने की कोशिश करने वालों के बारे में जो जानकारियाँ थीं, उनमें से ज़्यादातर गिबसन के बारे में ही थीं.
डोडॉल कहते हैं, "अगर यह काम किसी मर्द ने किया होता तो उसकी प्रतिमा बनाई गई होती या ऐसा ही कुछ किया गया होता. लेकिन चूंकि वो एक महिला थीं इसलिए उन्हें किसी ग़ुमनामी में धकेल दिया गया. हम इसे लेकर काफ़ी खुश हैं कि हम उनकी कहानी दुनिया के सामने ले कर आए हैं और हम उन्हें इस गु़मनामी से बाहर निकाल सके."
वो कहते हैं कि उनकी याद में तख्ती लगाने का फ़ैसला अच्छा कदम है. इससे उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पता चलेगा.

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