ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला क्यों अब भी है आसान

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- Author, फ़्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ट्रंप युग का अंत ईरान के लिए कुछ हद तक राहत का संकेत है.
खाड़ी क्षेत्र में कुछ लोगों को डर था कि डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के आख़िरी दिनों में ईरान पर और दबाव बढ़ा सकते हैं. साथ ही ईरान के परमाणु संयंत्रों और अन्य ठिकानों पर सैन्य स्ट्राइक कर सकते हैं.
नवंबर में आयीं रिपोर्ट्स से संकेत मिले थे कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस विकल्प पर विचार कर रहे हैं, लेकिन उनके सलाहकारों ने उन्हें ऐसा ना करने के लिए मना लिया.
इसके उलट, नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने साफ़ किया कि वे चाहते हैं कि अमेरिका फिर से ईरान परमाणु समझौते का हिस्सा बने.
जिसका मतलब होगा ईरान से प्रतिबंध हटा लिए जाएंगे और ईरान के पूर्ण अनुपालन के बदले में उसे आर्थिक सहयोग दिया जाएगा.

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तो क्या ईरान अब हमले से सुरक्षित है?
एक शब्द में इसका जवाब है, नहीं.
इसराइल अब भी ना सिर्फ़ ईरान की परमाणु गतिविधियों से बहुत ज़्यादा चिंतिंत रहेगा, बल्कि उसके बैलिस्टिक मिसाइलों के अपने शस्त्रागार को विकसित करने के कार्यक्रम से भी परेशान रहेगा.
गुरुवार को इसराइल के रक्षा मंत्री बेनी गेंट्ज़ ने ईरान के परमाणु विकास कार्यक्रम को लेकर कहा, "ये साफ़ है कि इसराइल को टेबल पर एक सैन्य विकल्प रखना होगा. इसमें संसाधनों और निवेश की ज़रूरत होगी और मैं उस पर काम कर रहा हूँ."
इस्लामिक गणराज्य का घोषित दुश्मन इसराइल, ईरान के हाथों में परमाणु बम को अपने अस्तित्व के लिए ख़तरा मानता है और दुनिया से अपील कर चुका है कि देर होने से पहले ईरान को रोका जाए.
ईरान हमेशा से ज़ोर देकर कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन बढ़ाने के उसके हालिया क़दमों ने सबके कान खड़े कर दिये हैं.
1981 में इसराइल ने शक जताया था कि इराक़ी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने के बारे में सोच रहे हैं.
ऑपरेशन बेबीलोन में उसने अपने एफ़-15 और एफ़-16 विमानों से सफल हवाई हमले को अंजाम दिया था और इराक़ के ओसिरक परमाणु रिएक्टर को नष्ट कर दिया था.
26 साल बाद 2007 में उसने सीरिया में ऑपरेशन 'आउटसाइड द बॉक्स' में भी ऐसा ही किया और दीर अल-ज़ौर के नज़दीक रेगिस्तान में एक गुप्त प्लूटोनियम रिएक्टर को एक्टिवेट होने से पहले ही नष्ट कर दिया.

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ईरान के परमाणु संयंत्रों तक पहुँच मुश्किल, लेकिन...
लेकिन ईरान दूरी, पहुँच और हवाई सुरक्षा के मामले में इससे कहीं मुश्किल टारगेट है.
सवाल है कि क्या इसराइल अमेरिका की मदद के बिना एक सफल हवाई हमला कर पाएगा, जिसके लिए बाइडन प्रशासन का राज़ी होना मुश्किल है.
ईरान के परमाणु संयंत्रों पर लंबे समय से अमेरिका, इसराइल और संभवत: खाड़ी के अरब देशों का ख़तरा बना हुआ है.
इसे देखते हुए ईरान ने काफ़ी पैसा लगाकर कुछ संयंत्रों को अपने पहाड़ों में ज़मीन के बहुत नीचे पहुँचा दिया है.
ईरान का परमाणु उद्योग सीधे तौर पर सेना से जुड़ा नहीं है, लेकिन फिर भी देश के सैन्य और सुरक्षा बुनियादी ढाँचे के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है.
अब ईरान के अंडरग्राउंड संयंत्रों तक पहुँचना मुश्किल है. लेकिन फिर भी ईरान के परमाणु संयंत्रों पर तीन मोर्चों से हमले का ख़तरा बना हुआ है.

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सीधा हमला
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) के एसोसिएट रिसर्चर और हथियार नियंत्रण के विशेषज्ञ मार्क फ़िट्जपैट्रिक कहते हैं कि "ईरान के संयंत्र अभेद्य नहीं हैं."
"नतांज़ में स्थित संयंत्र पर बंकर बमबारी का ख़तरा है. दो सटीक निशानों से ऐसा हो सकता है. एक गड्ढा खोदने के लिए और दूसरा अंदर घुसने के लिए या कम से कम वहाँ की मशीनों को हिलाने के लिए."
लेकिन ईरान एक विशाल देश है और उसके परमाणु संयंत्र गहराई में बने हुए हैं.
2012 में विशेषज्ञों ने कहा था कि फ़ोर्डो स्थित पहाड़ के कम से कम 80 मीटर नीचे बने यूरेनियम संवर्धन प्लांट को अमेरिका के शक्तिशाली 'बंकर-बस्टिंग' बम से निशाना बनाया जा सकता है.
मार्क फ़िट्ज़पैट्रिक कहते हैं कि "फ़ोर्डो की गहराई संयंत्र को बंकर-बस्टर से तो बचाती है, लेकिन वहाँ तोड़-फोड़ होने से नहीं बचा सकती."
लेकिन इन तक पहुँचने के लिए एक नहीं, संभवत: दो एयर स्ट्राइक्स की ज़रूरत होगी जिसका मतलब है - ईरान के हवाई क्षेत्र में काफ़ी भीतर तक जाना और उनके एयर डिफ़ेंस पर क़ब्ज़ा कर लेना.
ईरान ने सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों को और विकसित करने के लिए भारी निवेश किया है.
ईरान ने 'बावर-373' नामक मिसाइल सिस्टम बनाया है जो रूस के एस-300 डिफ़ेंस सिस्टम जैसा है. इस सिस्टम की क्षमता काफ़ी ज़्यादा बताई जाती है. कहा जाता है कि ये सिस्टम 300 किलोमीटर दूर से एयरक्राफ़्ट को ट्रैक कर सकता है और उसे निशाना बनाने में सक्षम है.

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आत्मघाती हमला
इस तरह के हमले पहले से होते रहे हैं. इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद ने ईरान में अपने एजेंटों का एक ज़बरदस्त नेटवर्क विकसित किया है. इसे बनाने में मोसाद को कामयाबी मिली है.
मोसाद का यह नेटवर्क कितना ज़बरदस्त है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब ईरान के शीर्ष सैन्य वैज्ञानिक ब्रिगेडियर जनरल मोहसिन फ़ख़रीज़ादे 27 नवंबर को अपने संरक्षित क़ाफ़िले में तेहरान के पूर्व में स्थित एक सुनसान सड़क पर थे, तो उन पर हमला करने वालों को उनके रास्ते और यात्रा के समय की सटीक जानकारी थी.
हालांकि, इसे लेकर रिपोर्ट्स अलग-अलग हैं कि उस दिन उन पर हमला कैसे किया गया था.
ईरान का दावा है कि इस हमले के लिए एक मशीन गन का इस्तेमाल किया गया जो सैटेलाइट से नियंत्रित थी और इस मशीन गन को एक पिक-अप ट्रक के ऊपर लगाया गया था. जबकि सूत्रों का कहना है कि यह हमला मोसाद के ही प्रशिक्षित एजेंटों की एक टीम ने किया था जो वहाँ से बचकर निकलने में सफल रही.
आज भी मोहसिन फ़ख़रीज़ादे को 'ईरान के परमाणु कार्यक्रम के गॉडफ़ादर' के रूप में जाना जाता है जिनके बारे में अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों का कहना है कि उन्होंने परमाणु हथियारों पर गुप्त कार्य किया जिसके लिए उनकी हत्या की गई.
इसराइल ने इस बारे में आधिकारिक तौर पर कभी कोई टिप्पणी नहीं की कि इस हमले के पीछे कौन था.
इससे पहले, 2010 से 2012 के बीच, ईरान के चार प्रमुख परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या ईरान में ही की गई थी.
एक बार फिर, इसराइल ने ऐसे हमलों में ना तो अपनी भागीदारी की पुष्टि की है और ना ही खंडन किया है. लेकिन जिस तरह से हत्याएं होती रहीं हैं, उससे पता चलता है कि ईरान ने जो भी सुरक्षा व्यवस्थाएं की हैं, उनके बावजूद हत्यारे अपने लक्ष्यों तक पहुँचने में सक्षम हैं.

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साइबर हमला
साइबर स्पेस में एक अघोषित युद्ध लगातार चल ही रहा है जिसमें ईरान एक तरफ़ है और अमेरिका, इसराइल और सऊदी अरब उसके ख़िलाफ़.
साल 2010 में, एक मालवेयर जिसका कोडनाम 'स्टक्सनेट' था, उसे गुप्त रूप से ईरान के उन कंप्यूटरों में डाल दिया गया था जो नतांज़ के यूरेनियम संवर्धन प्लांट में लगे थे. इसका नतीजा ये हुआ कि सब अस्त-व्यस्त हो गया. सेंट्रीफ़्यूज नियंत्रण से बाहर हो गये और इस साइबर हमले ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सालों पीछे कर दिया.
ज़्यादातर रिपोर्ट्स में इस हमले को इसराइली हमला कहा गया, लेकिन माना जाता है कि अमेरिका और इसराइल के विशेषज्ञों ने मिलकर 'स्टक्सनेट' को विकसित किया था.
पर ईरान ने जल्द ही जवाब दिया. उसने अपने यहाँ बनाये गए 'शमून' नामक मालवेयर को सऊदी अरब की सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी सऊदी अरामको के कंप्यूटरों में डाल दिया जो कंपनी के क़रीब तीस हज़ार कंप्यूटरों को निष्क्रिय करने में सफल रहा. इससे सऊदी अरामको के लिए बड़ा संकट पैदा हुआ था.
इसके बाद भी ऐसे हमले होते रहे हैं.

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लगातार जोखिम
साल 2015 के परमाणु समझौते के तहत ईरान की परमाणु गतिविधियों पर इस तरह के कड़े प्रतिबंध लगने थे कि यह माना जाने लगा कि समझौते के बाद ईरान पर किसी सैन्य हमले की संभावनाएं नहीं रह जायेंगी.
हालांकि, इसराइल और सऊदी अरब इस सौदे को लेकर हमेशा ही संशय में रहे, क्योंकि वे इसे बहुत उदार और अस्थायी मानते थे. साथ ही इसने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के संबंध में कुछ नहीं किया था, तो दोनों देशों को इससे और भी कम उम्मीदें रहीं.
अब जो बाइडन के आने के बाद, अगर अमेरिका दोबारा ईरान के साथ परमाणु समझौता करता है और इसराइल-सऊदी अरब की चिंताओं को सुना नहीं जाता, तो स्थिति वही रहने वाली है.
यह एक सच्चाई है कि खाड़ी क्षेत्र में कोई भी नया संघर्ष नहीं देखना चाहता. लेकिन इसके लिए आपसी विश्वास बहुत ज़रूरी है.
साल 2019 में, सऊदी अरब की तेल फ़ैक्ट्रियों पर हुए मिसाइल हमलों के लिए व्यापक रूप से ईरान और उसके सहयोगियों पर आरोप लगे. लेकिन इसका कोई जवाब नहीं मिला.
और जब तक यह संदेह बना रहता है कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु युद्धक क्षमता विकसित करने पर काम कर रहा है, तब तक उसके ठिकानों पर हमलों का ख़तरा हमेशा बना रहेगा.
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