साल 2020 में मील का पत्थर साबित हुईं ये पाँच राजनीतिक घटनाएं

तालिबान अमेरिका के बीच समझौता

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साल 2020 ने सिर्फ लोगों के ज़हन पर ही नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति पर भी गहरी छाप छोड़ी है.

कोरोना वायरस महामारी ने ना सिर्फ बड़े पैमाने पर आर्थिक संकट पैदा किया बल्कि वैश्विक मतभेदों और प्रतिस्पर्धाओं को भी और गहरा किया. इसका अमेरिका और चीन के रिश्तों पर भी गहरा असर रहा है.

साल 2020 में नागार्नो-काराबाख जैसे कुछ प्राचीन विवाद भी फिर उभर आए.

भारत और चीन की सीमा पर पैंतालीस सालों में सबसे भीषण तनाव भी हुआ.

लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ टकराव ही हुए हों. कुछ देश करीब भी आए और लंबे समय तक असर रखने वाले ऐतिहासिक समझौते भी हुए.

अफ़ग़ानिस्ता में युद्ध से प्रभावित लोग

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1. अमेरिका का तालिबान के साथ समझौता

अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिका के आक्रमण के 18 साल बाद राष्ट्रपति ट्रंप उसी तालिबान से समझौता करने में कामयाब रहे जिसकी सरकार को अमेरिका ने उखाड़ दिया था. अफ़ग़ानिस्तान से अमेरीकी सैनिकों को वापस लाना ट्रंप के साल 2016 के चुनावी वादों में शामिल था.

अफ़ग़ानिस्तान-अमेरिका युद्ध की मानवीय क़ीमत भी बहुत भारी रही है. अनुमान के मुताबिक 157000 से अधिक लोग मारे गए हैं जिनमें 43 हज़ार से अधिक आम नागरिक हैं. अब 25 लाख अफ़ग़ान नागरिक शरणार्थी भी बन गए हैं.

अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने भी भारी क़ीमत चुकाई है. अमेरिका के 2400 से अधिक सैनिक मारे गए जबकि नेटो सहयोगियों के 1100 से अधिक सैनिकों ने अफ़ग़ानिस्तान में जान गंवाई. अनुमान के मुताबिक अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान युद्ध पर दो अरब डॉलर से अधिक ख़र्च किए हैं.

अमेरिका ओसामा बिन लादेन का खात्मा करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में घुसा था

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इमेज कैप्शन, अमेरिका ओसामा बिन लादेन का खात्मा करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में घुसा था

साल 2020 में अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने के लिए अमेरिका और तालिबान के बीच अहम समझौता हुआ. अमेरिकी सैनिकों की वापसी के अलावा इस समझौते के तहत तालिबान और अफ़ग़ान सरकार के बीच भी वार्ता होनी है.

विश्लेषकों के मुताबिक तालिबान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की ओर से दिए जा रहे संकेतों को पढ़ने में कामयाब रहा और मौके को भुना लिया.

साल 2016 से 2018 तक पेंटागन में अफ़ग़ानिस्तान मामलों को निदेशक रहे जेसन कैंपबेल को इस समझौते की कामयाबी पर शक है हालांकि वो मानते हैं कि आज का तालिबान पहले के मुकाबले अधिक व्यवहारिक है.

कैंपबेल के मुताबिक आज का तालिबान पश्चिमी देशों और अमेरिका के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है ख़ासकर व्यापार और विकास के मामलों में. वो कहते हैं, 'वो 1990 के दौर में वापस नहीं लौटना चाहते हैं जब वो एक नाकाम राष्ट्र थे.'

इसराइली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतनयाहू

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2. इसराइल का बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात के साथ रिश्ते बनाना

अगस्त और सितंबर 2020 के बीच संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की घोषणा की. ये पहले अरब देश हैं जिन्होंने पिछले 25 सालों में यहूदी देश इसराइल के साथ रिश्तों को मान्यता दी है.

इससे पहले मिस्र ने 1979 में और जोर्डन ने 1994 में इसराइल को मान्यता दी थी. इन समझौतों को मध्य पूर्व में इसराइल की बदलती भूमिका के तौर पर भी देखा जा रहा है. अब इसराइल पहले से अधिक सुरक्षित स्थिति में है.

इसराइल और मध्य पूर्व के दो देशों के बीच हुए समझौतों का डोनल्ड ट्रंप ने खुला समर्थन किया. लेकिन इनके पीछे कुछ और भी कारण थे. इनमें से एक है ईरान के प्रति इन देशों का डर.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार रियान बोह्ल के मुताबिक अरब देश इसराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ़ अनौपचारिक ब्लॉक बना रहे हैं. अगर अमेरिका मध्य पूर्व से बाहर निकलकर एशिया की तरफ़ बढ़ता है तो मध्य पूर्व में इसराइल के अमेरिका की जगह लेने की संभावना है.

यूरोपीय संघ

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3. यूरोपीय संघ ने तोड़ी धारणाएं

कोरोना वायरस संक्रमण यूरोपीय संघ के लिए गंभीर परीक्षा रहा है. हालांकि अब ये संकट यूरोपीय संघ को और मज़बूत करने में भी अहम साबित हो सकता है.

जुलाई में चार दिन चली बैठक के बाद यूरोपीय संघ के देश कोरोना संकट से निबटने के लिए 860000 मिलियन डॉलर का फंड बनाने पर तैयार हो गए थे. ये उन सदस्य देशों की मदद के लिए है जिन पर कोरोना संकट का गहरा असर हुआ है.

इसमें से 445000 मिलियन डॉलर मदद के तौर पर बाकी 41000 मिलियन डॉलर कम ब्याज़ दर पर क़र्ज़ के तौर पर दिए जाएंगे. ये पहला कार्यक्रम होगा जिसके तहत यूरोपीय संघ के देश साझा तौर पर क़र्ज़ ले पाएंगे.

विश्लेषकों का मानना है कि ये रिकवरी फंड यूरोपीय संघ के भीतर सहयोग को और मजबूत करेगा.

आरसीईपी समझौता

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4. आरसीईपी यानी दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता

नवंबर में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 15 देशों ने दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसे रीजनल कंप्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप यानी आरसीईपी कहा गया है. इस समझौते में शामिल देशों में दुनिया की एक तिहाई आबादी रहती है.

इसमें दक्षिण एशिया के दस देशों के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड भी शामिल हैं. भारत इस आर्थिक समझौते का हिस्सा नहीं है. इस समझौते के यूरोपीय संघ और मेक्सिको-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते से भी बड़ा माना जा रहा है.

आरसीईपी को सबसे पहले चीन ने साल 2012 में बढ़ावा दिया था लेकिन इसमें अहम प्रगति पिछले तीन सालों में ही हुई. माना ये भी जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की परोक्ष मदद से ही ये समझौता अंजाम तक पहुंचा है.

साल 2017 में ट्रंप ने अमेरिका को ट्रांस-पेसिफिक पार्टनर्शिप (टीपीपी) से अलग कर लिया था. इस समझौते में शामिल कुछ देश अब आरसीईपी का हिस्सा हैं. माना जा रहा है कि इस आर्थिक समझौते से सबसे ज़्यादा फ़ायदा चीन को ही होगा.

ब्रेक्ज़िट

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5. ब्रेग्जिट

31 जनवरी 2020 को इतिहास में ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के दिन के तौर पर याद किया जाएगा. जून 2016 में हुए जनमत संग्रह में यूरोपीय संघ से अलग होने के फैसले को अंजाम तक पहुंचाते हुए ब्रिटेन की सरकार ने ब्रेग्जिट को मंज़ूरी दे दी थी.

इस दिन ब्रिटेन और यूरोपीय संघ एक दूसरे को अलग होने के लिए 11 महीने का समय देने के लिए तैयार हुए थे. इस दौरान दोनों पक्षों ने भविष्य में रिश्तों की शर्तों को लेकर वार्ताएं की. ब्रेग्जिट ने 1973 में बनी साझेदारी को तोड़ दिया. तब ब्रिटेन ने यूरोपीय आर्थिक कम्युनिटी से हाथ मिलाया था.

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