कोरोना वायरस का बदलना कितनी बड़ी चिंता?

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- Author, जेम्स गैलेगर
- पदनाम, स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता
मेरा कोरोना वायरस के "नए वेरिएंट (प्रकार)" को समझने का एक सरल सा तरीक़ा है.
सवाल करना: "क्या वायरस की प्रकृति में बदलाव आया है?"
वायरस का बदलना सुनने में डरावना लगता है, लेकिन वायरस का बदलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.
ज़्यादातर बदलाव से कोई फर्क नहीं आता या फिर वायरस ख़ुद को इस तरह बदल लेता है कि वो हमें ज़्यादा तेज़ी से संक्रमिक करता है और नया प्रकार पूरी तरह से ख़त्म हो जाता है.
इस बात के कोई स्पष्ट सबूत नहीं हैं कि दक्षिण-पूर्व इंग्लैंड में पाया गया वायरस का नया प्रकार ज़्यादा आसानी से संक्रमित करता है, ज़्यादा गंभीर लक्षण देता है या वैक्सीन उसपर असरदार नहीं होगी.
हालांकि दो वजहों से वैज्ञानिक इसपर क़रीबी नज़र बनाए हुए हैं.
पहला कि जिन इलाक़ों में ये प्रकार पाया गया, वहां मामले ज़्यादा मिले.
ये चेतावनी का एक संकेत है, हालांकि इसे दो तरह से समझा जा सकता है.
वायरस ने ख़ुद को इसलिए बदला ताकि वो ज़्यादा आसानी से फैल सके और ज़्यादा लोगों को संक्रमित करे.
ये भी हो सकता है कि वायरस के प्रकार को सही लोगों को सही वक़्त पर संक्रमित करने का एक मौक़ा मिल गया. गर्मी में "स्पेनिश प्रकार" के वायरस के फैलने की एक वजह बताई जाती है कि हॉलीडे पर लोग इसकी चपेट में आए और फिर इस वायरस को घर ले आए.
लैब में प्रयोग करने के बाद ही पता चल पाएगा कि क्या ये प्रकार दूसरे तरह के वायरस के प्रकार से ज़्यादा संक्रामक है.

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जिस दूसरी बात ने वैज्ञानिकों की भौहें चढ़ा दी हैं वो है कि वायरस किस तरह ख़ुद को बदल रहा है.
कोविड-19 जीनोमिक्स यूके (COG-UK) कंसोर्टियम के प्रोफेसर निक लोमन कहते हैं, "हैरानी की बात है कि इस वायरस में बहुत से बदलाव हुए हैं. जितना कि हमने उम्मीद नहीं की थी और कुछ बदलाव दिलचस्प हैं."
दो ख़ास तरह के बदलाव हैं. दोनों महत्वपूर्ण स्पाइक प्रोटीन में पाए जाते हैं. वायरस स्पाइक प्रोटीन का इस्तेमाल हमारे शरीर की कोशिशकाओं को हाइजैक करने के लिए करता है.
म्यूटेशन N501 स्पाइक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बदल देता है, जिसे "रिसेप्टर-बाइंडिग डोमेन" कहता जाता है.
ये वो जगह है जहां स्पाइक हमारे शरीर की कोशिशकाओं की सतह से पहला संपर्क बनाता है. अगर कोई बदलाव वायरस को अंदर घुसना ज़्यादा आसान बना देता है तो वो बदलाव अहम है.
प्रोफेसर लोमन कहते हैं, "ये एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई पड़ता है."

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दूसरा म्यूटेशन है - H69 / V70 डिलिशन, ये इससे पहले भी कई बार पाया गया है. ये संक्रमित ऊदबिलाव जानवर में भी पाया जा चुका है.
चिंता की बात ये थी कि ठीक हुए व्यक्ति के खून में पाई जाने वाली एंटीबॉडी वायरस के इस तरह के प्रकार पर कम असरदार होती थी.
इसलिए इसको समझने के लिए और अध्ययनों की ज़रूरत होगी.

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बर्मिंघम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एलन मैकनली ने कहा, "हम जानते हैं कि ये एक नया प्रकार है. हम जैविक रूप से इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं."
"इसके असर के बारे में कोई अनुमान लगाना अभी जल्दबाज़ी होगी."
स्पाइक प्रोटीन में म्यूटेशन, वैक्सीन को लेकर सवाल खड़े करता है, क्योंकि तीनों प्रमुख टीके - फाइजर, मॉडर्न और ऑक्सफोर्ड - सभी प्रतिरक्षा प्रणाली को स्पाइक पर हमला करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं.
हालांकि, शरीर स्पाइक के कई हिस्सों पर हमला करना जानता है. यही कारण है कि स्वास्थ्य अधिकारी आश्वस्त हैं कि वैक्सीन इस प्रकार पर काम करेगी.
ये वायरस पहले जानवरों में पाया गया, जिसके बाद एक साल पहले ये इंसानों में आ गया.
तब से इसमें हर महीने क़रीब दो बदलाव हो रहे हैं. अगर आज एक सैंपल लिया जाए और उसकी तुलना चीन के वुहान में सबसे पहले मिले सैंपल से की जाए तो पाएंगे कि तब से अब तक क़रीब 25 म्यूटेशन हो चुके हैं.
इंसानों को अपनी चपेट में लेने के लिए कोरोना वायरस अब भी लगातार ख़ुद को बदल रहा है.
लेकिन जल्द ही बड़े पैमाने पर होने जा रहा टीकाकरण वायरस पर एक तरह का दबाव बनाएगा, क्योंकि फिर इम्यून हो चुके लोगों को संक्रमित करने के लिए उसे ख़ुद को बदलना होगा.
अगर वायरस कोई तरीक़ा निकाल लेता है तो हमें लगातार वैक्सीन में भी बदलाव करते रहने होंगे, जैसे हम फ्लू के लिए करते हैं.
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