पाकिस्तान में मंदिर निर्माण को लेकर इमरान सरकार पसोपेश में

- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
पाकिस्तान में इस्लामिक आइडियोलॉजी काउंसिल ने सरकार को सलाह दी है कि वह इस्लामाबाद के सैदपुर में स्थानीय हिंदू समुदाय के लिए पहले से मौजूद एक हिंदू मंदिर और उससे सटी धर्मशाला को खोले.
धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने इस साल जुलाई में इस्लामाबाद में एक नए कृष्ण मंदिर के निर्माण के लिए 4 कनाल (20,000 स्क्वेयर फ़ुट) ज़मीन देने के लिए काउंसिल से उसकी राय पूछी थी, जिसके बाद कट्टर राजनेताओं और मुस्लिम धार्मिक समूहों ने इसका विरोध किया था.
काउंसिल ने कहा था कि संवैधानिक रूप से हर समुदाय और समूह को अपने धार्मिक संस्कार निभाने के लिए धर्म स्थल का अधिकार है.
लेकिन साथ ही काउंसिल ने कहा था कि राजधानी में हिंदू आबादी को देखते हुए उसे लगता है कि सैदपुर गाँव में पहले से मौजूद पुराने मंदिर को खोलना चाहिए.
काउंसिल ने यह भी कहा कि सरकार के नियंत्रण के बाहर मौजूद धार्मिक स्थलों पर सार्वजनिक पैसा ख़र्च करने का कोई चलन नहीं है. इसलिए नए कृष्ण मंदिर के निर्माण के लिए पैसा देने का समर्थन नहीं किया जा सकता है.
इस्लामिक आइडियोलॉजी काउंसिल ने ये भी सलाह दी कि सभी धर्म के लोगों को अपनी परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार करने का भी अधिकार है, इसलिए हिंदू समुदाय के पास इस्लामाबाद में श्मशान घाट की व्यवस्था करने का अधिकार है.
काउंसिल की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि काउंसिल को हिंदू समुदाय के लिए शादी और बैठक के लिए कम्युनिटी सेंटर के होने पर कोई आपत्ति नहीं है और इसमें संवैधानिक या शरिया के हिसाब से कोई बाधा भी नहीं है.
काउंसिल ने सलाह दी कि इसके अलावा इवाक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड को अधिकार दिया जाना चाहिए कि वो जनसंख्या का आकलन करके अल्पसंख्यक समुदायों के लिए सुविधाएँ बढ़ाए या सरकार धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों के लिए एक विशेष फ़ंड का प्रबंध करे. ये फ़ंड उन्हें दे दिया जाए ताकि वे इसका इस्तेमाल कर सकें.
इस्लामिक आइडियोलॉजी काउंसिल सरकार को इस्लामी मामलों पर सलाह देता है और इसकी सलाह मानने के लिए सरकार स्वतंत्र है.
हिंदू समुदाय की प्रतिक्रिया
मानवाधिकारों के संसदीय सचिव लाल चंद मल्ही ने बीबीसी से कहा कि पाकिस्तान हिंदू पंचायत ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है और इसे सही दिशा में एक अच्छा क़दम माना है.
उन्होंने कहा कि इस्लामिक आइडियोलॉजी काउंसिल ने धार्मिक समुदायों की सहायता और सरकार की ओर से फ़ंड के आबंटन को लेकर एक दिशा दिखाई है.
इसमें कहा गया है कि सरकार अल्पसंख्यकों के लिए एक ख़ास फ़ंड की व्यवस्था कर सकती है. यह उसका कर्तव्य है कि देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों का कल्याण सुनिश्चित हो सके.
मल्ही कहते हैं कि हिंदू पंचायत मानता है कि इस्लामिक आइडियोलॉजी काउंसिल ने न केवल श्मशान घाट के निर्माण का समर्थन किया है, बल्कि इस्लामाबाद के अलावा पूरे देश में कम्युनिटी सेंटर के निर्माण का भी समर्थन किया है.
उन्होंने बीबीसी से कहा कि पाकिस्तान हिंदू पंचायत की इच्छा है कि वह इस्लामाबाद के एच-9 सेक्टर में श्मशान घाट और कम्युनिटी सेंटर की चारदीवारी के निर्माण का काम शुरू करे. वहाँ पर सरकार ने समुदाय को ज़मीन दी है.
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू समुदाय इस्लामिक आइडियोलॉजी काउंसिल और धार्मिक मामलों के मंत्रालय के साथ सलाह के बाद ही इस परियोजना पर आगे बढ़ेगा.

मामला कहाँ से शुरू हुआ
राजधानी विकास प्राधिकरण ने इस्लामाबाद में पहले हिंदू मंदिर के निर्माण के लिए भूमि आबंटित की थी, लेकिन इसके कुछ दिन बाद ही इस साल जुलाई में इस प्रोजेक्ट की राह में रोड़ा आ गया.
प्रसिद्ध जामिया अशरफिया मदरसा के एक मुफ़्ती ने इसके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी कर दिया और इस्लामाबाद में एक वकील निर्माण रुकवाने के लिए हाई कोर्ट चले गए.
23 जून को एक छोटे समारोह में मानवाधिकारों के संसदीय सचिव लाल चंद मल्ही ने इस्लामाबाद में हिंदू मंदिर के लिए दी गई जगह पर शिलान्यास किया था.
20 हज़ार स्क्वेयर फ़ीट ज़मीन पहले 2017 में स्थानीय हिंदू काउंसिल को दी गई थी, लेकिन प्रशासनिक वजहों से निर्माण में देरी हुई.
जब प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पहले चरण के निर्माण के लिए 10 करोड़ पाकिस्तानी रुपए देने का वादा किया, तब जून में सरकार ने इस्लामाबाद हिंदू पंचायत को हरी झंडी दे दी.
तब लाल चंद ने ट्वीट किया था, "इस्लामाबाद का ये पहला मंदिर होगा. सरकार ने मंदिर के निर्माण के लिए 4 कनाल ज़मीन दे दी है."
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 1
घोषणा होने के तुरंत बाद समुदाय ने आपस में इकट्ठा किए पैसों से मंदिर स्थल की बॉउंड्री का निर्माण शुरू कर दिया.
मल्ही ने उस वक़्त बीबीसी से कहा था कि इस्लामाबाद हिंदू पंचायत स्थल पर एक विशाल परिसर का निर्माण करना चाहती है, जहाँ मंदिर के साथ-साथ, श्मशान घाट, लंगर खाना, सामुदायिक भवन और रहने के लिए कमरे होंगे.
उन्होंने कहा था, "इस्लामाबाद हिंदू पंचायत ने अपने ख़ुद के पैसों से बॉउंड्री की दीवार का निर्माण शुरू कर दिया है क्योंकि सरकार की ओर से फ़ंड जारी होने में कुछ समय लगेगा."
साथ ही लाल चंद ने कहा था, "यह एक बहु-धार्मिक देश है, सभी धर्मों के लोग यहाँ रहते हैं, और पाकिस्तान के प्रत्येक नागरिक का राजधानी इस्लामाबाद पर समान अधिकार है. यह एक प्रतीकात्मक क़दम है. यह क़दम पूरे पाकिस्तान को आपसी सद्भाव का संदेश देगा."
लाल चंद मल्ही के मुताबिक़, राजधानी विकास प्राधिकरण ने अन्य अल्पसंख्यकों जैसे ईसाई और पारसियों को उसी सेक्टर में 20-20 हज़ार स्क्वेयर फीट ज़मीन आबंटित की थी.
वो कहते हैं, "अलग-अलग धर्मों के बीच आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए और क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना के विज़न के अनुरूप पाकिस्तान को एक समावेशी राष्ट्र दिखाने के लिए ऐसा किया गया."

इमेज स्रोत, Getty Images
घोषणा का विरोध - फ़तवा और कोर्ट केस
लाहौर में जामिया अशरफ़िया एक देवबंदी इस्लामिक मदरसा है, जो फ़िरोज़पुर रोड पर स्थित है. पाकिस्तान बनने के ठीक बाद 1947 में इसकी स्थापना हुई थी और तब से अब तक इस संस्थान से हज़ारों देवबंदी स्कॉलर ग्रेजुएट होकर निकले हैं.
इसे देश में देवबंदी सीखने के लिए महत्वपूर्ण जगहों में से एक माना जाता है और दुनिया भर के विद्वान इस्लामिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए यहाँ आते हैं.
मदरसे के प्रवक्ता के मुताबिक़ मुफ़्ती मोहम्मद ज़करिया क़रीब 20 साल से जामिया अशरफ़िया से जुड़े हैं.
कृष्ण मंदिर के निर्माण की घोषणा के कुछ दिन बाद ही उन्होंने एक फ़तवा जारी किया, जिसका अन्य वरिष्ठ मुफ़्तियों ने भी समर्थन किया.
उनका फ़तवा कहता है कि इस्लाम के मुताबिक़ अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थल खुले रखना और उनकी मरम्मत का ध्यान रखना ठीक है, लेकिन नए मंदिर या पूजा स्थल के निर्माण की अनुमति नहीं है. उन्होंने अपने फ़तवे के समर्थन में कुछ ऐतिहासिक ग्रंथों का ज़िक्र और दूसरे उदाहरण भी दिए.
बीबीसी से बातचीत में मुफ़्ती मोहम्मद ज़करिया ने कहा कि नागरिकों के उठाए सवालों के जवाब में फ़तवा जारी किया है.
उन्होंने कहा, "हम क़ुरान और सुन्नत के अनुसार लोगों का मार्गदर्शन करने और उन्हें शिक्षित करने की कोशिश करते हैं, हम अपने मन से कुछ भी नहीं कहते हैं. मेरी समझ यह कहती है कि इस्लामी राज्य में अन्य धर्मों के लिए नए मंदिरों या पूजा स्थलों का निर्माण करना ग़ैर-इस्लामी है."
जब उनसे पूछा गया कि अगर सरकार उनकी नहीं सुनती, तो वो क्या करेंगे?
उन्होंने कहा, "हमारे पास सरकार को कुछ करने के लिए बाध्य करने की शक्ति नहीं है, हम सिर्फ़ धर्म के मुताबिक़ मार्गदर्शन कर सकते हैं. हमने अपना काम कर दिया है."
क़ानूनी आधार पर "कृष्ण मंदिर परिसर" का निर्माण रुकवाने के लिए इस्लामाबाद में एक वकील ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है.
वकील तनवीर अख़्तर ने बीबीसी से कहा, "मुझे सिर्फ़ एक आपत्ति है, जब सरकार ने सेक्टर एच -9 में भूमि अधिग्रहण किया था और राजधानी विकास प्राधिकरण ने शहर के लिए मास्टर प्लान बनाया था, तो क्या उस असली मास्टर प्लान में मंदिर के लिए आरक्षित भूमि का कोई ज़िक्र था? अगर नहीं, तो प्राधिकरण अब हिंदू मंदिर के निर्माण के लिए ज़मीन कैसे दे सकता है, उसे मास्टर प्लान का उल्लंघन करने से रोका जाना चाहिए."
पुरानी मांग
पाकिस्तान में क़रीब 80 लाख हिंदू रहते हैं. इनमें से ज़्यादातर दक्षिणी सिंध प्रांत के उमरकोट, थारपारकर और मीरपुर ख़ास जिलों में रहते हैं. इस्लामाबाद में क़रीब 3000 हिंदू रहते हैं.
इस्लामाबाद हिंदू पंचायत के पूर्व अध्यक्ष प्रीतम दास अपने समुदाय के उन पहले चंद लोगों में शामिल हैं, जो 1973 में थारपारकर से इस्लामाबाद आ गए थे.

वो बताते हैं, "मैं उन कुछ पहले लोगों में शामिल हूँ, जो मारगला पहाड़ों की तलहटी में इस नई राजधानी शहर के बनने के छह साल बाद यहाँ आए थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में समुदाय के लोगों की संख्या कई गुना बढ़ गई है."
इस्लामाबाद के सैदपुर गाँव में एक छोटा सा ढाँचा था, जिसे गाँव का राष्ट्रीय धरोहर घोषित होने पर खोल दिय गया था. लेकिन यह सिर्फ़ एक प्रतीकात्मक ढाँचा है, यह राजधानी में बढ़ते हिंदू समुदाय की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकता है.
प्रीतम दास कहते हैं, "समुदाय को रस्म-रिवाज़ करने में मुश्किल आ रही थी, जैसे हमारे पास शमशान घाट नहीं था, इसलिए अंतिम संस्कार के लिए हमें शवों को दूसरे शहर ले जाना पड़ता था. हमारे पास कम्युनिटी सेंटर नहीं था, जहाँ हम दिवाली और होली मना सकते. इसलिए ये हमारी लंबे वक़्त से चली आ रही मांग थी और मुझे ख़ुशी है कि सरकार ने आख़िरकार सुन ली."
राजनीतिक प्रतिक्रिया
मुफ्ती ज़कारिया की बात का समर्थन करते हुए एक वरिष्ठ नेता और पंजाब विधानसभा के स्पीकर चौधरी परवाज़ इलाही ने इस्लामाबाद में एक नए मंदिर के निर्माण की निंदा की.
उनके मीडिया सेल की ओर से जारी एक वीडियो में परवाज़ इलाही ने कहा कि पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बनाया गया था, और राजधानी इस्लामाबाद में एक नए मंदिर का निर्माण न केवल इस्लाम की भावना के ख़िलाफ़ है, बल्कि ये उस मदीना राज्य का भी अनादर है, जो पैगंबर मोहम्मद ने बनाया था.
उन्होंने यह भी कहा कि पैगंबर मोहम्मद ने मक्का पर विजय प्राप्त करने के बाद काबा में 360 प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया था.
परवेज़ इलाही ने कहा कि वह और उनकी पार्टी अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा की वकालत करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि नए निर्माण की बजाय केवल मौजूदा मंदिरों को ही बहाल किया जाना चाहिए.
पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान परवाज़ इलाही ने कटासराज मंदिर के जीर्णोद्धार की परियोजना शुरू की थी.
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने हमेशा पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की वकालत की है और वो मुस्लिमों के साथ भारत के बर्ताव की अक्सर आलोचना करते हैं.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 2
एक ट्वीट में उन्होंने कहा था, "मैं हमारे लोगों को चेतावनी देना चाहता हूँ कि अगर कोई पाकिस्तान में ग़ैर-मुस्लिम नागरिकों या उनके पूजा स्थलों को निशाना बनाता है, तो उससे सख़्ती से निपटा जाएगा. हमारे अल्पसंख्यक इस देश के समान नागरिक हैं."
लेकिन पाकिस्तान में धार्मिक लॉबी के राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए इमरान ख़ान की सरकार ने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ने से पहले राय लेने के लिए इस मामले को इस्लामिक आइडियोलॉजी काउंसिल के पास भेज दिया था.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)



















