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तुर्की के साथ बढ़े विवाद के बीच फ़्रांस में चरमपंथियों पर कार्रवाई तेज़
- Author, लुसी विलियमसन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पेरिस
पेरिस के उत्तर-पूर्वी इलाक़े पेनटिन में स्थित मस्जिद को देखते ही हमें इस बात के संकेत मिलते हैं कि इस बार कुछ अलग हो रहा है.
पूरी तरह ख़ाली दिख रही यह बंद बिल्डिंग किसी एयरक्राफ्ट हैंगर की तरह लगती है. इस ख़ाली बिल्डिंग में छोटी खिड़कियां हैं और बाहर एक सरकारी नोटिस चिपका है.
बारिश से बचाने के लिए नोटिस पर प्लास्टिक चिपकाया गया है. नोटिस में लिखा है कि इस्लामी मूवमेंट में शामिल होने और सैमुअल पैटी नाम के एक टीचर को निशाना बना कर सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करने की वजह से सरकार को इस बिल्डिंग को जबरन बंद करना पड़ा है.
पेरिस के बाहरी इलाक़े में कुछ लोगों ने इतिहास पढ़ाने वाले इस टीचर का गला काट डाला था. इसके बाद से ही फ़्रांस की सरकार ने इस्लामी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ रखा है.
अब तक सरकार का यह अभियान बेहद तेज़ और कड़ा रहा है. लोगों से पूछताछ की बाढ़ आ गई है. कई जगहों पर मकानों को सील किया जा रहा है. चरमपंथियों को क़ाबू में करने के लिए योजनाओं और प्रस्तावों की एक के बाद एक ऐसी झड़ी लगी कि इन पर नज़र रखना मुश्किल हो रहा है.
पिछले सप्ताह रक्षा परिषद की बैठक में फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा था कि अब 'डर दूसरी ओर के लोगों को लगेगा'. उनकी इस टिप्पणी की ख़ासी चर्चा रही.
सरकार ने बताया है कि अब तक अलग-अलग लोगों के 120 मकानों की तलाशी ली जा चुकी है और इस्लाम के प्रचार में जुटे कई संगठनों पर कार्रवाई की गई है.
मैक्रों प्रशासन ने बताया है कि चरमपंथियों की फ़ंडिंग रोकने के लिए उसने क्या क़दम उठाए हैं. शिक्षकों के लिए नई मदद का ऐलान किया गया और सोशल मीडिया कंपनियों पर कंटेंट की मॉनिटरिंग का दबाव बढ़ाया गया है.
इससे पहले फ़्रांस में मैक्रों सरकार के शासन में 20 लोगों की क्रूर हत्या के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर अभियान नहीं चलाया गया था.
पहले भी पुलिस अधिकारियों, क्रिसमस पर शॉपिंग करते ख़रीदारों और एक ट्रेन में एक महिला की हत्या हो चुकी थी. लेकिन सैमुअल पैटी की हत्या के बाद कथित इस्लामी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ जैसा अभियान चला है वैसा इससे पहले कभी नहीं दिखा. आख़िर पहले की तुलना में अब चलाए जा रहे अभियान में क्या अंतर है?
बड़े पैमाने पर निगरानी
जेरोम फोरके एक राजनीतिक विश्लेषक हैं और IFOP पोलिंग एजेंसी के डायरेक्टर भी. उनका मानना है कि यह हमला (सैमुअल पैटी पर) बिल्कुल अलग था. जिस तरह से एक टीचर को इतनी क्रूरता से निशाना बनाया गया है, वह इसे पहले के हमलों से अलग कर देता है. यही वजह है कि सरकार के अंदर चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने के मामले में तेज़ी का रुख़ दिखा है.
जेरोम ने कहा, "अब हम सिर्फ़ संगठित जिहादी नेटवर्कों का सामना नहीं कर रहे हैं. हमारा मुक़ाबला अब ऐसे अलग-थलग युवा आतंकवादियों से है, जो अपने ही देश के हैं और जिन्हें चरमपंथी जुनून से भर दिया गया है."
वह कहते हैं, "सरकार का मानना है कि सिर्फ़ क़ानून-व्यवस्था को दुरुस्त बना कर इसका मुक़ाबला नहीं किया जा सकता है. सरकार को सोशल नेटवर्क और एसोसिएशनों को क़ाबू में रखना होगा क्योंकि यह त्रासद घटना बताती है कि किस तरह एक पूरा नेटवर्क लोगों के बीच हेट स्पीच फैलाने में लगा हुआ है. दरअसल सिस्टम में बदलाव लाने की ज़रूरत है."
वे बताते हैं कि दो साल पहले IFOP ने जो सर्वे किया था, उसके मुताबिक़ लगभग एक तिहाई शिक्षकों ने 'ख़ुद को सेंसर' कर रखा था ताकि सेक्यूलरिज्म के सवाल पर होने वाले संघर्षों से बच सकें.
जेरोम का कहना है कि सरकार ने फ़्रांसीसी गणराज्य के क़ानूनों और देश की सुरक्षा को एक विचारधारा से मिल रही चुनौती के ख़िलाफ़ क़दम उठा कर बिल्कुल सही किया है.
लेकिन फ़्रांस के नेशनल सेंटर फ़ॉर साइंटिफ़िक रिसर्च के समाजशास्त्री लॉरेन मुचेली कहते हैं कि राष्ट्रपति मैक्रों ने राजनीतिक वजहों से 'ओवर रिएक्ट' किया है.
फ़्रांस में 2022 में राष्ट्रपति का चुनाव है इसलिए मैक्रों ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "मैक्रों आग में घी डालने का काम कर रहे हैं. अपनी कार्रवाई से वह यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि दक्षिण और धुर दक्षिणपंथी पार्टियों की तरह ही वह भी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ क़दम उठाने में ज़्यादा पीछे नहीं हैं. उनका सबसे बड़ा मक़सद 2022 में दोबारा राष्ट्रपति चुनाव जीतना है. इसलिए वह दक्षिणपंथियों के प्रभाव क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं. 19वीं सदी की समाप्ति के बाद से ही दक्षिणपंथी पार्टियों के मुद्दे में कोई बदलाव नहीं आया है. वे सिर्फ़ आप्रवासी और देश की सुरक्षा को मुद्दा बनाते आए हैं."
पिछले सप्ताह हुए एक सर्वे के मुताबिक़ धुर दक्षिणपंथी नेता मेरिन ली पेन 'आतंकवाद' के ख़िलाफ़ सबसे भरोसेमंद नेता बन कर उभरी हैं. मैक्रों इस सर्वे में चार प्वाइंट पीछे हैं. हो सकता है जब 18 महीने बाद राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ शुरू हो तो दोनों आमने-सामने हों.
सिक्योरिटी का मामला मैक्रों की दुखती रग माना जाता है. विदेश में अपनी ताक़तवर इमेज और मज़बूत आर्थिक सुधारों के बावजूद वह इस मामले में पिछड़े नज़र आते हैं. लेकिन मैरिन ली पेन इस्लाम की शांतिपूर्ण सार्वजनिक अभिव्यक्ति को भी फ़्रांस की राष्ट्रीय पहचान के लिए ख़तरा मानती हैं.
सांस्कृतिक तनाव
अपने अब तक के शासन के दौरान मैक्रों ने देश पर मंडरा रहे सुरक्षा ख़तरों और धर्म निरपेक्षता के बीच फ़र्क़ करने में बड़ी सावधानी से काम लिया है. लंबे समय से वह हेड स्कार्फ़, बुर्किनी स्विमसूट और स्कूलों में हलाल भोजन से जुड़े सवालों को टालते आए हैं. लेकिन फ़्रांस में धार्मिक अभिव्यक्ति के इर्द-गिर्द जो राजनीतिक हो-हल्ला मचाया जा रहा है उन हालात में इस तरह की चालाकी दिखाना कभी-कभी लग्ज़री जैसा लगता है.
सितंबर में मैक्रों की ला रिपब्लिका एन मार्च (LREM) पार्टी की एक सांसद एन-क्रिस्टिन लांग संसद से वॉकआउट कर गई थीं. दरअसल उन्हें सिर पर इस्लामी स्कार्फ़ पहनी एक महिला की ओर से पेश किए जा रहे बयान को सुनने के लिए कहा जा रहा था. लेकिन उन्होंने इसका विरोध किया और संसद से बाहर निकल गईं.
उन्होंने कहा, "उन्हें राजनीति के दिल संसद में किसी का इस तरह हिजाब पहन कर आना बिल्कुल मंज़ूर नहीं. हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते."
टीचर और मेयर जैसे लोकसेवकों को कहा गया है कि वे अपने धार्मिक विश्वास का खुला प्रदर्शन न करें. लेकिन आम लोगों के लिए क़ानूनी तौर पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है. सार्वजनिक भवनों में भी उनके लिए ऐसा करना ज़रूरी नहीं है.
इन हालातों की वजह से देश में कई बार विवाद उठ खड़े हुए हैं. अक्सर ये सवाल उठाए गए हैं कि क्या माता-पिता का बच्चों के स्कूल में स्कार्फ़ पहन कर जाना ठीक है. क्या समुद्र तटों पर महिलाओं को बुर्किनी स्विमसूट पहनना चाहिए. जब भी इस तरह की बहस होती है उनमें दक्षिणपंथी पार्टियां अक्सर सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही हैं और वामपंथी पार्टियों सरकार पर देश में इस्लामोफ़ोबिया पैदा करने के आरोप लगाती हैं.
फ़्रांस में इस तरह की राजनीतिक गहमागहमी के बीच यह नया हादसा हुआ जब एक ख़ास वर्ग के लोगों को मोहम्मद साहब का कार्टून दिखाने के आरोप में सैमुअल पैटी की हत्या कर दी गई है.
अंतरराष्ट्रीय पहलू
कथित चरमपंथियों के ख़िलाफ़ क़दम उठा कर राष्ट्रपति मैक्रों अपने घर में समर्थकों का दिल जीत पाए हों या नहीं लेकिन देश के बाहर उनके आलोचकों को मौक़ा मिल रहा है.
लीबिया, बांग्लादेश और ग़ज़ा पट्टी में फ़्रांस सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए और उनमें फ़्रांसीसी चीज़ों के बहिष्कार की अपील की गई. इसके साथ ही तुर्की के साथ फ़्रांस का वाक युद्ध भी तेज़ हो गया है.
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इन बहिष्कारों का समर्थन किया और जब पिछले सप्ताह मैक्रों ने फ़्रांस के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का बचाव किया तो उन्होंने कहा कि फ़्रांसीसी राष्ट्रपति का दिमाग़ ख़राब हो गया है. फ़्रांस ने तुर्की से अपने राजदूत को बुला लिया है.
लेकिन तमाम जटिल रिश्तों की तरह ही फ़्रांस और तुर्की के विवादित रिश्तों का एक लंबा इतिहास है. मैक्रों के पास तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन के ख़िलाफ़ शिकायतों का एक बड़ा पुलिंदा है. सीरिया में कुर्दिश मिलिशिया के ख़िलाफ़ तुर्की के अभियान पर फ़्रांस के अंदर एक नाराज़गी है. इसके अलावा पूर्वी भूमध्यसागर में तेल की खोज के सवाल पर उसका तुर्की से झगड़ा हो चुका है. लीबिया को हथियार सप्लाई से प्रतिबंध हटाने को लेकर भी दोनों के बीच विवाद है.
और अब एक दिल दहला देने वाली हत्या और इस पर फ़्रांस की प्रतिक्रिया ने धर्म और राजनीति की सीमा के सवाल पर देश के भीतर और बाहर विवादों को फिर हवा दे दी और साथ ही इसे भी कि सत्ता में बैठे लोग इन मुद्दों का कैसे इस्तेमाल करते हैं.
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