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'इस्लाम' पर तुर्की और फ़्रांस आपस में क्यों भिड़े?
- Author, प्रवीण शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
तुर्की और फ़्रांस के बीच बने तनाव को हाल में ही एक विवाद ने और गहरा दिया है.
पिछले शुक्रवार को फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने जिसे वह अपनी भाषा में "इस्लामिक अलगाववाद" कहते हैं, से निबटने और देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बचाने के लिए सख़्त क़ानून लाने की योजनाओं की घोषणा की.
एक बहुप्रतीक्षित स्पीच में मैक्रों ने कहा कि फ़्रांस के अनुमानित 60 लाख मुसलमानों के एक अल्पसंख्यक तबक़े से "काउंटर-सोसाइटी" पैदा होने का ख़तरा है.
काउंटर सोसाइटी या काउंटर कल्चर का मतलब एक ऐसा समाज तैयार करना है जो कि उस देश के समाज की मूल संस्कृति से अलग होता है.
उन्होंने अपनी स्पीच में कहा, "इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो कि आज पूरी दुनिया में संकट में है. ऐसा हम केवल अपने देश में होता नहीं देख रहे हैं." उनके इस बयान से एक बखेड़ा खड़ा हो गया है. दुनियाभर के मुसलमानों की ओर से इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है.
तुर्की के फ़्रांस के साथ रिश्ते
साथ ही इस बयान ने तुर्की को फ़्रांस पर हमलावर होने का एक और मौक़ा दे दिया है. तमाम मसलों को लेकर तुर्की के फ़्रांस के साथ रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण बने हुए थे. ऐसे में फ्रांसीसी राष्ट्रपति के मुसलमानों को लेकर दिए गए इस बयान से इन संबंधों के और नीचे जाने की आशंका पैदा हो गई है.
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यप अर्दोआन ने मंगलवार को फ़्रांस के राष्ट्रपति के मुस्लिमों को लेकर दिए गए बयान पर सख़्त प्रतिक्रिया देते हुए इसे एक "खुला उकसावा" क़रार दिया.
अर्दोआन ने पूछा, "इस्लाम की संरचना के बारे में बात करने वाले आप कौन होते हैं?" तुर्की के राष्ट्रपति ने मैक्रों पर अभद्र होने का आरोप लगाया.
अर्दोआन ने मैक्रों को सलाह दी कि वे "ऐसे मसलों पर बोलते वक़्त सावधानी बरतें." उन्होंने कहा, "एक औपनिवेशिक गवर्नर की तरह से काम करने की बजाय हम उनसे एक ज़िम्मेदार राजनेता होने की उम्मीद करते हैं."
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, "फ़्रांसीसी राष्ट्रपति की चिंता को इस तरह से समझा जा सकता है कि इस्लामिक स्टेट (चरमपंथी संगठन) में शामिल होने और सीरिया या लीबिया में जाने वाले सबसे ज़्यादा नागरिक यूरोप में ब्रिटेन के बाद फ्रांस से ही थे."
पाशा कहते हैं, "फ़्रांस की लीडरशिप को इन लोगों के समाज में इंटीग्रेशन को लेकर चिंता है."
पाशा कहते हैं कि दूसरी ओर, "फ़्रांस में मुस्लिम समुदाय के ज़्यादातर लोग उत्तरी अफ्रीका के हैं और ये ग़रीब तबक़े के लोग हैं. अर्दोआन को लगता है कि ये मुस्लिम वहां शोषण का शिकार हो रहे हैं."
अर्दोआन की टिप्पणी की क्या है वजह?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं कि अर्दोआन के रिएक्शन की राजनीतिक वजहें हैं.
वे कहते हैं, "अर्दोआन मुस्लिम वर्ल्ड के लीडर की भूमिका निभाना चाहते हैं. इस वक़्त सउदी अरब यमन की जँग में फँसा है और वहां के आंतरिक हालात ठीक नहीं हैं. ऐसे में जो शून्य पैदा हो रहा है उसे तुर्की भरने की कोशिश कर रहा है."
वे कहते हैं कि दरअसल तीन ग़ैर-अरब मुल्क- तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया मिलकर मुस्लिम जगत की लीडरशिप हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.
आग़ा कहते हैं, "इस वक़्त एक तरह से मुस्लिम वर्ल्ड में विभाजन हो गया है और तुर्की मुसलमानों से जुड़े हुए किसी भी मसले पर टिप्पणी करता है."
वे कहते हैं कि हालांकि, तुर्की की लीडरशिप अरबों को कभी भी स्वीकार्य नहीं होगी क्योंकि उनका तुर्की के साथ एक कड़वा अनुभव रहा है.
आग़ा कहते हैं, "तुर्की का मौजूदा नेतृत्व न तो कोई अच्छा धार्मिक लीडर है और न ही अच्छा पॉलिटिकल लीडर है. तुर्की में लिबरल इस्लामिक मूवमेंट को ख़त्म किया जा रहा है."
दोनों के बीच किन मसलों को लेकर है तनाव?
इस्लाम को लेकर दिया गया मैक्रों का बयान और उस पर तुर्की की प्रतिक्रिया दोनों देशों के बीच तनाव की कोई इकलौती वजह नहीं है.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि इन देशों के बीच विवाद का रिश्ता पहले विश्व युद्ध के समय का है.
पाशा कहते हैं, "फ़्रांस ने लीग ऑफ़ नेशंस के ज़रिए तुर्की के इलाक़े इदलिब और अलेप्पो को सीरिया में मिला दिया था. इन्हीं जगहों पर अभी भी लड़ाई हो रही है."
वे कहते हैं कि फ़्रांस ने पहले विश्व युद्ध में ग्रीस का सपोर्ट किया था. इससे तुर्की के कई इलाक़े ग्रीस को मिल गए.
हाल में पिछले एक दशक में सीरिया और लीबिया में क्रमशः बशारुल असद और कर्नल मोअम्मर गद्दाफ़ी के ख़िलाफ़ चले आंदोलनों को लेकर भी दोनों देशों के हित टकराए हैं.
प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, "अर्दोआन को लगता है कि जब चार साल पहले तुर्की में सैन्य बग़ावत हुई थी उसमें अमरीका के अलावा फ़्रांस भी इसराइल और यूएई के ज़रिए शामिल था. तब से ही इनके बीच में रिश्ते ख़राब होने शुरू हो गए थे."
पूर्वी भूमध्यसागर में एक बड़े गैस रिज़र्व पर क़ब्जे और समुद्री अधिकार को लेकर ग्रीस और तुर्की के बीच विवाद गहराया हुआ है. इस मामले में फ़्रांस ग्रीस का पक्ष ले रहा है और तुर्की को इस पर कड़ी आपत्ति है.
ग्रीस और तुर्की के बीच इस मसले पर बढ़े हुए तनाव के बीच फ़्रांस ने पूर्वी भूमध्यसागर में दो रफ़ाल फ़ाइटर जेट और एक नौसेना फ्रिगेट तैनात करने का ऐलान कर दिया था.
फ़्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों तुर्की से इस विवादित इलाक़े में तेल और गैस एक्सप्लोरेशन को रोकने की माँग कर चुके हैं.
इसके अलावा, आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच चल रहे युद्ध में तुर्की अज़रबैजान के साथ खड़ा है, जबकि फ़्रांस ने आर्मीनिया का साथ देने का ऐलान किया है. इस तरह से इस मसले पर भी दोनों देश एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हो गए हैं.
इसके अलावा लीबिया संकट को लेकर भी तुर्की और फ़्रांस में ठनी हुई है. लीबिया संकट में तुर्की, इटली और क़तर जीएनए का समर्थन कर रहे हैं. दूसरी ओर, रूस, मिस्र और यूएई जनरल हफ़्तार के पक्ष में खड़े हैं.
हालांकि, फ़्रांस जनरल हफ़्तार को समर्थन देता दिखाई दे रहा है, लेकिन फ़्रांसीसी नेता इससे इनकार करते रहे हैं.
लीबिया में हथियारों को लेकर यूएन का प्रतिबंध है, लेकिन इसका शायद ही कोई असर पड़ा है.
लीबिया के ख़िलाफ़ हथियारों के प्रतिबंधों को लेकर हाल में ही फ़्रांस नाटो के एक सिक्योरिटी ऑपरेशन से अस्थाई तौर पर हट गया था. फ़्रांस ने आरोप लगाया था कि तुर्की लीबिया को हथियारों की चोरीछिपे आपूर्ति कर रहा है.
क्या और नीचे जाएंगे तुर्की और फ्रांस के संबंध?
पाशा कहते हैं कि दोनों के रिश्ते ख़राब ही हो रहे हैं. वे कहते हैं, "मैक्रों और अर्दोआन के बीच मामला अब पर्सनल हो गया है. दोनों एक-दूसरे की निजी बेइज़्ज़ती कर रहे हैं. तो ऐसे में संबंध सुधरने के आसार कम ही नज़र आ रहे हैं."
आग़ा कहते हैं, "फ़्रांस और तुर्की के बीच पिछले कुछ वक़्त से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों की एक बड़ी वजह इस्लामिक जगत की लीडरशिप है. इसके अलावा लीबिया, सीरिया और दूसरे देशों में फ़्रांस के हितों पर तुर्की चोट करना चाहता है."
वे कहते हैं, "फ़्रांस में मौजूद बड़ी संख्या में मुस्लिम लोगों में चरमपंथ को तुर्की कहीं बढ़ावा तो नहीं दे रहा है, इसे लेकर भी फ़्रांस चिंतित है."
आर्मीनिया और अज़रबैजान की जँग में माना जा रहा है कि तुर्की ने हज़ारों लड़ाके अज़रबैजान की ओर से लड़ने के लिए भेजे हैं.
आर्मीनिया यूरोप से सटा हुआ है. ऐसे में फ़्रांस को डर है कि वहां चरमपंथ बढ़ने का असर उसके यहां भी हो सकता है.
फ़्रांस में आतंकी घटनाएं
सितंबर के अंत में फ़्रांस की राजधानी पेरिस में एक शख़्स ने मांस काटने वाले क्लीवर से दो लोगों को ज़ख़्मी कर दिया था. इस शख़्स ने स्वीकार किया था कि उसने चार्ली हेब्दो मैगज़ीन के छापे गए कार्टूनों के विरोध में यह हमला किया था.
18 साल का यह शख़्स पाकिस्तानी मूल का था. इस हमले को एक चरमपंथी घटना के तौर पर लिया गया था.
इससे पहले 2015 में भी चार्ली हेब्दो के दफ़्तर पर जिहादियों ने हमला किया था और इसमें 12 लोग मारे गए थे. इनमें फ़्रांस के कुछ मशहूर कार्टूनिस्ट भी शामिल थे.
इस हमले के लिए 14 लोगों पर अभी भी मुक़दमा चल रहा है.
7 जनवरी 2015 को चार्ली हेब्दो पर हुए हमलों के बाद फ़्रांस में इन चरमपंथी घटनाओं की एक लहर सी आ गई थी. इन घटनाओं में सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है.
13 नवंबर 2015 को स्टाडे डे फ्रांस, बार, रेस्टोरेंट्स और बाटाक्लान कॉन्सर्ट हॉल पर श्रंखलाबद्ध हमलों में 130 लोगों की हत्या कर दी गई थी.
13 जून 2016 को मैग्ननविले में एक पुलिस कमांडर और उनके सहयोगी पर हमला किया गया.
2016 में नाइस में जिहादियों ने 86 लोगों की हत्या कर दी. इसमें बास्टिले डे मना रहे लोगों को एक लॉरी से कुचल दिया गया था.
फ्रांस में इस्लाम
मैक्रों के इस्लाम को लेकर दिए गए बयान के बाद से मुस्लिमों में नाराज़गी देखी जा रही है. कई मुस्लिम इसे मैक्रों की इस्लाम को लेकर नापसंदीदगी के तौर पर देख रहे हैं.
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने लिखा है कि मैक्रों रैडिकल इस्लाम की बात करते-करते किसी भी तरह के इस्लाम के विरोध में उतर आए हैं और इस तरह से उन्होंने इस्लाम-विरोधी अपनी भावनाएं खुले तौर पर ज़ाहिर कर दी हैं.
फ़्रांस में इस्लामोफ़ोबिया या इस्लाम-विरोधी माहौल पिछले कुछ अरसे से जारी है. ख़ासतौर पर 2015 में चार्ली हेब्दो पर हमले के बाद इसमें बढ़ोतरी हुई है.
इस्लामिक रैडिकलाइज़ेशन पर क़मर आग़ा कहते हैं, "कट्टरपंथी विचारधारा से इस्लाम ही नहीं बल्कि वैश्विक शांति को भी ख़तरा है. अल-क़ायदा, आईएसआईएस, जैश-ए-मुहम्मद, लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे संगठन निर्दोष लोगों को मार रहे हैं और पूरी दुनिया में फ़साद फैला रहे हैं. ये एक बड़ा ख़तरा हैं. अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान या इराक़ में अल्पसंख्यकों के ऊपर इन्होंने ज़ुल्म किए हैं. ये लिबरल इस्लाम के लिए भी एक ख़तरा हैं."
वे कहते हैं, "इनके छेड़े गए जिहाद से पूरी दुनिया में मुसलमानों को नफ़रत का सामना करना पड़ रहा है. मुसलमानों को ही इससे सबसे ज़्य़ादा नुक़सान हो रहा है."
मशहूर फ़्रांसीसी लेखक मीशेल वेलबेक ने अपने उपन्यास 'सबमिशन' में लिखा था कि साल 2022 तक फ्रांस का इस्लामीकरण हो जाएगा. देश में मुस्लिम राष्ट्रपति होगा और महिलाओं को नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित किया जाएगा. विश्वविद्यालयों में क़ुरआन पढ़ाई जाएगी.
इस उपन्यास पर काफ़ी विवाद छाया रहा. उपन्यास में कल्पना की गई है कि फ़्रांस में 2022 तक महिलाओं का पर्दा करना अच्छा माना जाएगा और एक से ज़्यादा शादी करना क़ानूनी हो जाएगा.
इसी साल फ़रवरी में फ़्रांस सरकार ने इस्लामी कट्टरपंथ और अलगाववाद से निपटने के लिए विदेशी इमामों के देश में प्रवेश पर रोक लगाने की योजना का ऐलान किया था. राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा था कि फ़्रांस में मौजूद सभी इमामों को फ़्रेंच सीखना अनिवार्य होगा. साथ ही उन्होंने कहा था कि फ़्रांस में रहने वाले लोगों को यहां के क़ानूनों का सख़्ती से पालन करना अनिवार्य होगा.
2015 की चरमपंथी घटनाओं के बाद फ़्रांस में रैडिकल इस्लाम पर लगाम लगाने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं. नेशनल सिक्योरिटी के नाम पर कई मस्जिदें बंद कर दी गईं.
लंबे अरसे से फ़्रांस में "इस्लाम इन फ्रांस" को "इस्लाम ऑफ़ फ्रांस" में तब्दील करने की कोशिशें चल रही हैं. इसी के तहत मुस्लिमों में रैडिकलाइज़ेशन और चरमपंथ को रोकने के लिए फ़्रांस में तमाम उपाय किए जा रहे हैं.
अब राष्ट्रपति मैक्रों जिन उपायों को क़ानून के तौर पर लाने की बात कर रहे हैं ताकि "इस्लामिक अलगाववाद" को ख़त्म किया जा सके उनमें कई चीज़ें शामिल हैं.
इनमें खेल संगठनों और दूसरे एसोसिएशनों की कड़ी मॉनिटरिंग करना शामिल है ताकि वे इस्लामिक शिक्षा के लिए इस्तेमाल न किए जा सकें.
बाहरी देशों से इमामों का फ़्रांस में आना बंद कराया जाना भी इनमें शामिल है. मस्जिदों को होने वाली फ़ंडिंग पर भी गहरी निगरानी की बात इसमें है. साथ ही होम-स्कूलिंग पर पाबंदी लगाना भी इनमें शामिल किया गया है.
फ़्रांस के स्कूलों में हिजाब पहनने पर पहले से रोक है. साथ ही सरकारी नौकर अपने दफ़्तरों में भी हिजाब नहीं पहन सकते हैं.
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