पाकिस्तान की मुंबई कहे जाने वाले कराची शहर की किस्मत बदलेगी?

    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद

70 साल की मुराद बीबी बलूच जनजाति से हैं.

उनका परिवार उन सैकड़ों खानदानों में से एक है जो दशकों पहले अपनी माली हालत सुधारने के लिए कराची आ गया था.

वो मालीर नादी के करीब गदाप कस्बे के इलाके में रह रही थीं. लेकिन कराची में अगस्त के महीने में हुई बारिश ने उनके घर को तहस-नहस कर दिया.

मुराद बीबी की पांच साल की बेटी भी डूब गई.

"सुबह से मूसलाधार बारिश हो रही थी. दोपहर में मैं असर की नमाज़ की तैयारी कर रही थी तभी मैंने एक जोर का धमाका सुना. हमारे घर की दीवार गिर गई थी और बाढ़ का पानी हमारे घर में घुस कर सब कुछ तबाह कर रहा था. घर डूब गया था, फर्नीचर डूब गए थे हमारा सारा समान बह गया था."

पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी

मुराद बीबी कांपती हुई आवाज़ में यह सब बता रही थीं और अपने आंसुओं को दुपट्टे से पोछती जा रही थीं.

वो आगे कहती हैं, "लेकिन सबसे बुरा यह हुआ कि मेरी गुड़िया, मेरी पोती चली गई. वो पांच साल की थी. वो तैर नहीं सकती थी. हम उसे पानी के बहाव में अपने आंखों के सामने डूबते हुए देख रहे थे लेकिन उसकी मदद नहीं कर सके. मुझे ऐसा लग रहा था आकाश फट पड़ा है और मेरे सिर पर छत टूट कर गिर गई है."

कराची मुंबई की तरह का ही एक शहर है. यहाँ की आबादी दो करोड़ है. यह पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी है.

देश भर से लोग काम की तलाश में यहाँ आते हैं. अगस्त के अंत में यहां भारी बारिश हुई थी. यहाँ की सड़कें मानों नदियों में तब्दील हो गई थीं. जान बचाने के लिए लोगों को सुरक्षित स्थान की तलाश में भागना पड़ा था. कम से कम 41 लोगों की जान जाने की रिपोर्ट भी है. बचावकर्मियों को मुराद बीबी जैसे लोगों तक पहुँचने के लिए घंटों मशक्कत करना पड़ा था.

देश की अर्थव्यवस्था

कई दिनों तक बिजली कटी रही थी. काम-धंधे और बाज़ार बंद रहे थे. अस्पताल समय से नहीं पहुँच पाने की वजह से कई लोग मारे गए.

यहाँ तक कि सबसे रिहाइशी इलाकों में भी कई दिनों तक पानी जमा रहने की वजह से बदबू आती रही थी.

इन सब का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा और उसमें गिरावट आई.

लोगों ने इस अफरा-तफरी के बीच सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया.

लोगों ने सवाल खड़े करने शुरू कर दिए कि सालों से 'टैक्स देने वाले के पैसे' कहाँ गए.

इमरान ख़ान का वादा

इसका नतीजा यह निकला कि इमरान खान को कराची पहुँच कर शहर के विकास को लेकर बड़ी योजना की घोषणा करनी पड़ी ताकि आम लोगों और व्यापारियों का गुस्सा शांत हो सके.

उन्होंने घोषणा की, "मैंने कराची के विकास के लिए 1100 बिलियन का ऐतिहासिक पैकेज मुकर्रर किया है. प्रांतीय और संघीय सरकारों को इसके तहत पैसे मिल रहे हैं. हमने छोटे, मध्यम और दीर्घ अवधि की योजनाएँ बनाई हैं. जो सबसे ज्यादा वक़्त की योजना है, वो तीन सालों की होगी."

इमरान खान ने कहा है कि वो समझते हैं कि कैसे समस्याओं का अंबार खड़ा हो गया है और लोगों के लिए इससे निपटना कितना मुश्किल है लेकिन उन्होंने कहा कि हाल में पैदा हुआ संकट इन सभी पुरानी समस्याओं को निपटाने का एक मौका है.

आपसी राजनीति का खामियाजा भुगत रहा है कराची?

कराची की राजनीति काफी जटिल है. यह दक्षिणी सिंध प्रांत का हिस्सा है.

ऐतिहासिक रूप से सिंध भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है लेकिन कराची में मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट का शासन रहा है.

यह पार्टी मुहाजिर क़ौमी मूवमेंट से निकली थी. उर्दू बोलने वाली आबादी जो बंटवारे के समय भारत से पाकिस्तान आए थे उनके बीच इस पार्टी का दबदबा रहा है.

एमक्यूएम के टूटने के बाद इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी 2018 के आम चुनाव में यहाँ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी.

राष्ट्रीय संसद में भी इस पार्टी का प्रतिनिधत्व सबसे बड़ा है.

सरकारों का राजनीतिक टकराव

हालांकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने सिंध के बाकी हिस्सों में ज्यादातर सीटों पर जीत दर्ज की थी और यहाँ सरकार बनाने में कामयाब भी रही थी.

कराची शहर के मेयर जिन्होंने कुछ हफ़्ते पहले ही अपना कार्यकाल पूरा किया है, वो एमक्यूएम से थे.

शहर की योजना तैयार करने वाले प्लानर गुलरेज़ खान का कहना है कि सालों से शहर में जो मौजूद आधारभूत संरचनाएँ हैं वो बढ़ती हुई आबादी की जरूरतों को पूरा करने में नाकामयाब रही है और नागरिक सुविधाओं को विकसित करने में निवेश की कमी की वजह से आपदा जैसी परिस्थितियाँ तैयार हो गई हैं.

गुलरेज़ का मानना है कि तीन-तीन अलग-अलग पार्टियों की सरकारों के राजनीतिक टकराव की वजह से यह हालात पैदा हो गए हैं.

वो कहते हैं, "यह तीन राजनीतिक पार्टियो के बीच सत्ता का संघर्ष है जिसमें सभी पार्टियों के पास अपने पक्ष और दूसरे के ख़िलाफ़ में दलीलें हैं. लब्बोलुआब यह है कि तीनों पार्टियां अपने-अपने स्तर पर एक ही संसाधन को लेकर जूझ रहे हैं ना कि मिलकर शहर की समस्याओं का हल निकालने की कोशिश कर रहे हैं."

जलवायु परिवर्तन क्या इसके लिए जिम्मेवार है?

गुलरेज़ खान का कहना है कि भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था कराची की सबसे मुख्य समस्या है. कई अवैध कॉलोनियों के निर्माण ने पानी निकलने के रास्ते को रोक रखा है. सीवेज सिस्टम खराब है. पीने का पानी मुहैया कराने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है. दो करोड़ आबादी वाले शहर के पास एक ट्रांजिट सिस्टम भी उपलब्ध नहीं है.

"लोगों को एक गरिमामयी ज़िंदगी जीने का अधिकार है. यह अचरज की बात है कि पाकिस्तान के छोटे शहरों में भी ट्रांजिट बस और ट्रेनें मौजूद हैं लेकिन सबसे बड़े शहर में जहाँ से देश का 60 फ़ीसद राजस्व आता है, वो इससे वंचित है."

हालांकि कुछ लोग हाल में आई आपदा के लिए जलवायु परिवर्तन को उत्तरदायी ठहराने में लगे हुए हैं लेकिन आफिया सलाम जैसी पर्यावरण कार्यकर्ता इससे इत्तेफाक़ नहीं रखती.

"जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है. इसका असर मॉनसून पर पड़ता है जिसकी वजह से पाकिस्तान में बारिश होती है. कराची में यह बहुत असामान्य बात है कि सितंबर तक मॉनसून रहा. मौसम का समय और पैटर्न बदल रहा है."

हालांकि वो कहती हैं कि हालिया आपदा के लिए सिर्फ़ प्रकृति को दोष नहीं दिया जा सकता है. यह इंसानों की पैदा की गई मुसीबत ज्यादा है.

वो आगे कहती हैं, "जब हम विश्व जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं तो हमें बहुत सावधान रहने की जरूरत है. किसी आपदा के लिए जिम्मेवार ठहराने के लिए हमारे पास वैज्ञानिक आकड़े उपलब्ध होने चाहिए और अब तक जो आकड़े उपलब्ध हैं, उसे देखकर यह नहीं लगता कि पाकिस्तान में कोई बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन हुआ. हालांकि जो देश जलवायु परिवर्तन से सबसे बुरी तरह से प्रभावित हो सकते हैं उसमें पाकिस्तान का ना अग्रणी देशों में है. हाल में जो आपदा आई है, वो राजनीति और हमाने नेताओं की प्रबंधन की नाकामी ज्यादा है."

आगे क्या होगा?

कुछ लोगों को उम्मीद है कि हाल में आई आपदा से लोगों को ध्यान शहर के प्रबंधन की ओर जाएगा और यह कराची के लिए किस्मत बदलने वाला साबित हो सकता है. लेकिन गुलरेज़ इसे लेकर आश्वस्त नहीं दिखते हैं.

वो कहते हैं, "पहला सवाल पैसे का है. इसमें लगने वाली लागत कहाँ से आएगी और अगर फंड उपलब्ध है तो फिर दूसरा सवाल होगा कि कौन इसे अंज़ाम देने में सक्षम होगा. क्या सिंध प्रांत की सरकार इसे कर पाएगी? क्या वो करने में सक्षम है? किस स्तर की सरकार इसे अंज़ाम देगी?"

गुलरेज़ खान का मानना है कि लेकिन किसी भी बात से ज्यादा सबसे बड़ी चुनौती होगी उन हज़ारों लोगों को वहाँ से हटाने की जिन्होंने अवैध संपत्तियों को खरीद रखा है और वहाँ रह रहे हैं. इनमें से ज्यादातर लोग निम्न आय वर्ग के लोग हैं और उन्हें बेदखल करने की राजनीतिक क़ीमत चुकानी होगी.

वो कहते हैं, "किसी भी बड़ी संरचना को खड़ा करने का मतलब होगा कि लोगों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. लोगो को विस्थापित करना होगा. मुझे लगता है कि कराची में लोग इसकी मुखालफत करेंगे. वो आसानी से अपने घर और संपत्तियों को नहीं छोड़ेंगे. इसलिए इसका कोई मानवीय हल निकाले जाने की जरूरत है. आप शहर में आधारभूत संरचना खड़ा करने के लिए लोगों के घर नहीं तोड़ सकते हैं."

देश का फ़ौजी नेतृत्व यह मानता है कि कराची के हालात देश की सुरक्षा के लिए जोखिम भरा हो गया है. विश्लेषकों का कहना है कि ज़मीन पर फ़ौज की मज़बूत मौजूदगी और इस मामले में उनकी बढ़ती दिलचस्पी की वजह से राजनीतिक खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है. इसलिए सभी दलों को अपनी असहमतियाँ छोड़ एकजुट हो जाना चाहिए और कराची में हालात बेहतर करने को लेकर काम करना चाहिए.

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