तुर्की और ग्रीस के बीच बढ़ते झगड़े में कौन देश किसके साथ है?

    • Author, जोनाथन मार्कस
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले कुछ हफ़्तों से पूर्वी भूमध्य सागर में तनाव बढ़ रहा है. इसकी शुरुआत ऊर्जा संसाधनों की एक साधारण सी दिखने वाली होड़ से हुई.

तुर्की ने नौसेना की सुरक्षा के साथ एक गैस खोजी अभियान चलाया. यहां पर तुर्की का ग्रीस के आमना-सामना हो चुका था मगर अब फ्रांस भी ग्रीस के पक्ष में उतर आया है.

इसी बीच यूएई की ओर से ग्रीस का साथ देने लिए कुछ एफ़-16 विमान क्रेटे एयरबेस पर भेजने का एलान किया गया. हालांकि, इसे एक रूटीन तैनाती बताया जा रहा है.

उधर तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन का कहना है कि 'तुर्की एक क़दम भी पीछे नहीं हटेगा.'

लेकिन आख़िर यहां क्या हो रहा है? क्या यह तनाव गैस रिसोर्स को लेकर है? दूर-दराज़ के देश इस क्षेत्र की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं?

मगर जो कुछ हो रहा है, वो जटिल है और इस क्षेत्र के लिए ख़तरनाक भी.

तुर्की का अधिक मुखर होना

गैस की खोज तात्कालिक कारण है लेकिन इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं. यह ग्रीस और तुर्की के बीच लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष का हिस्सा है.

यह एक क्षेत्रीय भू-रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता है जिसमें कई अन्य पक्षों के ख़िलाफ़ अकेला तुर्की मुखरता से सामने आता है. इस संघर्ष का क्षेत्र लीबिया से पूर्वी भूमध्य सागर के पार जाकर कहीं आगे तक फैला हुआ है.

यह तनाव वास्तविक है और लगातार बढ़ रहा है. एक चिंता यह है कि जैसे-जैसे ज़्यादा देश तुर्की के ख़िलाफ़ लामबंद हो रहे हैं, तुर्की ख़ुद को अधिक अलग-थलग महसूस करने लगा है. इसी कारण तुर्की ज़्यादा आक्रामक हो रहा है.

ये तनाव एक और बदलाव की ओर इशारा कर रहा है – इस क्षेत्र में अमरीका की कम होती ताकत या यूं कहें कि ट्रंप सरकार की इस क्षेत्र में घटती रुचि.

जब तुर्की ने सतह से हवा में मार करने वाली रूसी मिसाइलें खरीदी थीं तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की को एफ़-35 युद्धक विमान कार्यक्रम से हटा दिया था.

तुर्की नेटो के भीतर अमेरिका की सीरिया और अन्य जगहों को लेकर नीतियों के ख़िलाफ़ रहा है. बावजूद इसके तुर्की पर अमरीका ख़ास दबाव नहीं बना पाया है.

अमरीका कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा, ऐसे में जर्मनी को ग्रीस और तुर्की के बीच मध्यस्ता के लिए आगे आना पड़ा है. वहीं फ्रांस का पलड़ा ग्रीस की तरफ़ झुका है.

अब इस इलाके में तनाव के कारणों की चर्चा करते हैं:

ऊर्जा

एक तरह से यह सब गैस के बारे में है. यहाँ के कई देशों में या तो महत्वपूर्ण गैस क्षेत्र पाये गए हैं या सक्रिय रूप से खोज जारी है.

इससे देशों के बीच होड़ को बढ़ावा मिलता है क्योंकि यहाँ समुद्री सीमाओं के परिसीमन पर लड़ाइयां चल रही है. इस बात पर विवाद है कि कौन सा इलाक़ा किसका है.

दरअसल, अधिकारों को मान्यता देने को लेकर हुए समझौतों ने तनाव को बढ़ावा दिया है.

पिछले साल तुर्की ने लीबिया की नेशनल अकॉर्ड सरकार (जीएनए) के साथ एक समुद्री समझौते पर हस्ताक्षर किया था. ये उन क्षेत्रों में नए गैस खोजी अभियानों के बारे में था जिन्हें ग्रीस अपना मानता है.

इसके बाद तनाव बढ़ गया. इस महीने की शुरुआत में ग्रीस और मिस्र ने एक समुद्री सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए.

इस घटना ने तुर्की को नाराज़ कर दिया और उसने नये सिरे से नौसेना की तैनाती करते हुए खोजी अभियान शुरू कर दिये.

ऊर्जा की खोज इस क्षेत्र में तनाव को बढ़ा देती है. लंबे समय में यह क्षेत्र वायु और नौसैनिक हथियारों की स्पर्धा का कारण भी बन सकता है.

लेकिन अगर इस गैस से आर्थिक फ़ायदे लेने हैं तो ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है.

पाइपलाइन और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण ज़रूरी है जो कि ज़मीन तक पहुँचने के लिए कई देशों से गुज़रेगा.

भू-मध्य सागरीय बेसिन के संभावित ऊर्जा उत्पादकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बुनियादी ढाँचा स्थापित किए जाने से तनाव कम करने में मदद मिल सकती है.

मुमकिन है कि लंबे समय से चली आ रही साइप्रस समस्या के समाधान के लिए भी एक रास्ता पेश किया जाये.

साइप्रस

यह तब से ग्रीस और तुर्की के बीच विवाद में रहा है जब 1974 में एक ग्रीक समर्थित सैन्य तख्तापलट के जवाब में तुर्की के लड़ाकों ने इस द्वीप पर हमला किया था और बाद में टर्किश रिपब्लिक ऑफ़ नॉर्दन साइपरस की एकतरफा घोषणा कर दी गई थी.

आधुनिक तुर्की राज्य की स्थापना से पहले यूनानियों और तुर्कों के बीच दुश्मनी का एक लंबा इतिहास रहा है.

ऐसी उम्मीदें थीं कि तुर्की जब यूरोपीय संघ की सदस्यता के क़रीब आयेगा तब साइप्रस मुद्दा हल करना आसान हो सकता है.

लेकिन अब तुर्की के यूरोपीय संघ में शामिल होने की कोई संभावना नहीं है और ऊर्जा पर तनाव ने एक बहुत पुराने विवाद में एक नया तत्व जोड़ दिया है.

'नए ओटोमन'

तुर्की द्वारा अपनाई जाने वाली बहुत अधिक मुखर विदेश नीति पुराने ओटोमन साम्राज्य जैसी है. राष्ट्रपति अर्दोआन के भौगोलिक इलाकों का निश्चित रूप से विस्तार हुआ है.

तुर्की का रणनीतिक रुख शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से कट्टर धर्मनिरपेक्ष राज्य के पतन का था जो कि अब एक अधिक इस्लामी स्वर में बदल गया है.

सत्तारूढ़ एकेपी पार्टी ने तुर्की की बढ़ती अर्थव्यवस्था का इस्तेमाल कर क्षेत्रिय वर्चस्व को बढ़ाने की कोशिश की.

हालांकि हाल के दिनों में तुर्की की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई गई है, लेकिन राष्ट्रपति अर्दोआन ने पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया है.

सरकार का ब्लू होमलैंड सिद्धांत स्पष्ट रूप से तुर्की के लिए एक बहुत बड़ी समुद्री भूमिका की परिकल्पना करता है.

तुर्की ने रूस और ईरान जैसे देशों के साथ जहाँ तक आवश्यक हो, अपने मुताबिक़ चीज़ें चलाने की कोशिश की है.

वो अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करता रहा है और लीबिया के शीत युद्ध में जीएनए सरकार के साथ अपने क्षेत्रीय विस्तार की माँग करता रहा है.

सीरिया की तरह इस क्षेत्र में इतनी सारी लड़ाइयों हैं कि यह कुछ हद तक ये छद्म युद्ध बन गए हैं, जिसमें बाहरी खिलाड़ी एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं.

लीबिया में तुर्की के ख़िलाफ़ मिस्र और यूएई जैसे शक्तिशाली देश हैं.

संयुक्त राष्ट्र समर्थित लीबिया सरकार को तुर्की ने भारी समर्थन दिया है जबकि संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र जनरल खलीफ़ा हफ़्तार के पक्ष में हैं.

तुर्की और यूएई ने लीबिया के आसमान में एक प्रकार का छद्म ड्रोन युद्ध शुरु कर दिया है जिसमें यूएई अपने चीन से लाए ड्रोन का इस्तेमाल करता है और तुर्की अपने देश में बने सशस्त्र ड्रोन का.

तुर्की की यह वायु शक्ति GNA को बचाने में निर्णायक साबित हुई है.

लीबिया संघर्ष ने तुर्की और मिस्र के बीच की दुश्मनी को गहरा कर दिया है.

लीबिया पर मतभेदों ने तुर्की और फ्रांस के बीच संबंधों में भी खटास ला दी है. कुछ समय पहले एक नौसैनिक स्टैंड-ऑफ़ हुआ था जहाँ तुर्की के युद्धपोतों ने फ्रांसीसी नौसेना को एक मालवाहक जहाज को रोकने पर हस्तक्षेप किया था.

माना जा रहा था कि वो लीबिया के तट से हथियार ले जा रहा था.

बढ़ते ग्रीक-तुर्की तनावों के बीच, फ्रांस ने ग्रीस के साथ एकजुटता दिखाने के किए दो युद्धपोतों और दो समुद्री दो जहाज़ों को भेजा है.

भूमध्य सागर में तनाव का तात्कालिक कारण ऊर्जा से संबंधित हो सकता है लेकिन यह कहानी का केवल एक हिस्सा है.

यदि किसी क्षेत्र को संकट से निकालने की ज़रूरत है तो वो पूर्वी-भूमध्य सागर है, लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? और सवाल है कि क्या इससे जुड़े देश इसके लिए तैयार हैं?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)