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पाकिस्तान FATF की ब्लैक लिस्ट से नहीं बचा तब क्या होगा?
- Author, टीम बीबीसी
- पदनाम, नई दिल्ली
18 अगस्त को पाकिस्तान ने स्वीकार किया कि दाऊद इब्राहिम का कराची में घर है और उसने दाऊद पर आर्थिक प्रतिबंध लागू किए हुए हैं. इसके साथ अधिसूचना जारी की थी जिसमें 88 चरमपंथी संगठनों और लोगों पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध की जानकारी थी. इसमें जमात उद दावा प्रमुख हाफ़िज़ सईद, जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर के नाम भी शामिल थे.
इस अधिसूचना के जारी होने के साथ ही भारत में कई मीडिया संस्थानों में इस तरह की खबरें आईं कि पाकिस्तान ने दाऊद की मौजूदगी को स्वीकार किया.
इसके बाद स्थानीय संवाददाताओं से पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ज़ाहिद चौधरी ने कहा, "18 अगस्त 2020 को पाकिस्तान ने जो एसआरओ (वैधानिक अधिसूचना) जारी किया है वो पुख़्ता है और जो पहले एसआरओ जारी हुए थे वो भी एक प्रक्रिया के तहत थे. इसलिए प्रतिबंधित सूची या प्रतिबंध उपायों में कोई बदलाव नहीं है. दो संयुक्त एसआरओ को 18 अगस्त 2020 को जारी किया, जो तालिबान, आईएस और अलक़ायदा को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में जगह देने वाली वर्तमान स्थिति को दिखाने के लिए था. यह एसआरओ समय-समय पर निकाले जाते रहे हैं. ऐसे ही एसआरओ क़ानूनी आवश्यकताओं और अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों के साथ विदेश मंत्रालय प्रकाशित करता रहा है. पिछले एसआरओ 2019 में प्रकाशित किए गए थे."
प्रवक्ता ने कहा है, "इस एसआरओ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित लोगों और संगठनों की जानकारी है. मीडिया के कुछ तबकों में ऐसी रिपोर्ट चल रही हैं कि पाकिस्तान ने इन रिपोर्ट के ज़रिए कोई नए प्रतिबंध लगाए हैं जो सही नहीं हैं. इसी तरह के दावे भारतीय मीडिया के कुछ तबकों में एसआरओ के आधार पर किए गए हैं कि पाकिस्तान ने स्वीकार किया है कि कुछ लोग उसके यहां पर रह रहे हैं जो आधारहीन और भ्रामक है."
इतना ही नहीं पाकिस्तान की इस अधिसूचना को एफ़एटीएफ़ के साथ जोड़ कर भी देखा जा रहा है. भारत में ऐसा कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने दबाव में ये अधिसूचना जारी की है ताकि एफ़एटीएफ़ की ब्लैक लिस्ट से बचा जा सके.
ये पहली बार नहीं है कि पाकिस्तान द्वारा चरमपंथी संगठनों पर कार्रवाई को एफएटीएफ के फैसले से जोड़ कर देखा जा रहा है. इससे पहले इसी साल फरवरी में पाकिस्तान में मुंबई हमलों के प्रमुख साज़िशकर्ता बताए जाने वाले जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद को प्रतिबंधित संगठन से जुड़ाव और 'आतंकवाद' के लिए ग़ैर-क़ानूनी फ़ंडिंग के दो अलग-अलग मामलों में साढ़े पाँच साल जेल की अलग-अलग सज़ा सुनाई गई है. तब भी यही कहा गया कि पाकिस्तान को एफ़एटीएफ़ की ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने के लिए ऐसा करना ही था.
आख़िर क्या है एफ़एटीएफ़
एफ़एटीएफ़ एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसकी स्थापना G7 देशों की पहल पर 1989 में की गई थी. संस्था का मुख्यालय पेरिस में है, जो दुनिया भर में हो रही मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए नीतियां बनाता है.
साल 2001 में इसने अपनी नीतियों में चरमपंथ के वित्तपोषण को भी शामिल किया था. संस्था अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली को सही रखने के लिए नीतियां बनाता है और उसे लागू करवाने की दिशा में काम करता है.इसके कुल 38 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत, अमरीका, रूस, ब्रिटेन, चीन भी शामिल हैं.
जून 2018 से पाकिस्तान दुनिया भर के मनी लॉन्ड्रिंग पर नज़र रखने वाले संस्थाओं के रडार पर है.
पाकिस्तान इन संस्थाओं के निशाने पर तब आया जब उसे चरमपंथियों को फंड करने और मनी लॉन्ड्रिंग के ख़तरे को देखते हुए 'ग्रे लिस्ट' में डाल दिया गया था. ग्रे लिस्ट में सर्बिया, श्रीलंका, सीरिया, त्रिनिदाद, ट्यूनीशिया और यमन भी हैं.
38 सदस्यीय देशों वाले एफ़एटीएफ़ के नियमों के अनुसार ब्लैकलिस्ट से बचने के लिए किसी भी देश को तीन सदस्यों के समर्थन की ज़रूरत होती है.
एफएटीएफ़ की ग्रे लिस्ट क्या है?
पिछले साल अक्टूबर में फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) ने ठोस कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान को चार महीने का वक़्त दिया है और उसे ग्रे लिस्ट की सूची में डाले रखा था.
इस सूची में वे देश शामिल हैं जिन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथी गुटों को मिलने वाली आर्थिक मदद पर अंकुश लगाने में कोताही बरती.
इससे पहले पाकिस्तान साल 2011 में भी ऐसी ही स्थिति का सामना कर चुका है. उस वक़्त भी इसे ग्रे लिस्ट में डाल दिया गया था. इसके बाद साल 2015 में पाकिस्तान ग्रे लिस्ट से तभी बाहर आ पाया जब इसने सफलतापूर्वक ऐक्शन प्लान लागू किया.
इस वक़्त पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिए 36 वोटों में से कम से कम 15 वोटों की ज़रूरत है. इस लिस्ट में आने से पाकिस्तान को हर साल लगभग 10 बिलियन डॉलर का नुक़सान हो रहा है.
एफएटीएफ़ की ब्लैक लिस्ट क्या है?
एफएटीएफ़ द्वारा किसी देश को ग्रे लिस्ट में डालने का मतलब है कि उस देश को चेतावनी दी जा रही है. समय रहते उन कदमों पर अमल कर दे ताकि मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथी गुटों को मिलने वाली आर्थिक मदद पर अंकुश लगाया जा सके.
लेकिन इस चेतावनी के बाद भी अगर कोई देश वो कदम नहीं उठाता तो उसे एफएटीएफ द्वारा ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाता है.
आज तक ईरान और उत्तर कोरिया को इस इस ब्लैक लिस्ट में डाला गया है.
अगर एफएटीएफ़ पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट करता है तो पहले से ही लचर चल रही अर्थव्यवस्था पर ख़तरा और बढ़ जाएगा, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मदद नहीं मिल पाएगी.
ब्लैक लिस्ट के क्या नुक़सान हैं?
पाकिस्तान में चरमपंथी संगठनों पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रहीमुल्ला यूसुफ़जई के मुताबिक़ अगर पाकिस्तान को एफएटीएफ़ की ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा तो आयात निर्यात पर कई तरह की पाबंदियों के साथ साथ दूसरे संगठनों से आर्थिक मदद लेने में दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है. इसके अलावा दूसरे देशों में काम करने वालों द्वारा भेजी गई रक़म (रेमिटेन्स) पर प्रभाव पर सकता है.
और अगर ऐसा होता है तो क्रेडिट रेटिंग एजेंसी जैसे मूडीज़ और दूसरी संस्थाओं द्वारा इनकी रेटिंग पर असर पड़ सकता है.
साल 2018 के अंत में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को तीन अरब डॉलर का क़र्ज़ और 3.2 अरब डॉलर की तेल ख़रीद के लिए क़र्ज़ गारंटी दी थी.
लेकिन अब खबरें आ रही है कि पाकिस्तान के सऊदी अरब पर कश्मीर के मुद्दे पर दख़ल देने का दबाव डालने के बाद सऊदी अरब ने पाकिस्तान से एक अरब डॉलर जल्दी वसूल लिए हैं और अन्य एक अरब डॉलर का क़र्ज़ जल्द चुकाने के लिए कहा है. कोरोना महामारी की वजह से दुनिया के अच्छी सी अच्छी अर्थव्यवस्था वाले देशों की हालत ख़राब है.
ऐसे में पहले से गिरती अर्थव्यवस्था के संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को और दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.
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