कोरोना क्या सर्दी में ज़्यादा क़हर बरपाएगा: दुनिया जहान

    • Author, संदीप सोनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

धरती के एक बड़े हिस्से में मौसम बदल रहा है, सर्दियां दस्तक दे रही हैं और यही वो समय होता है जब कोल्ड-फ्लू यानी सर्दी-ज़ुकाम आम बात हो जाती है.

लेकिन इस बार की सर्दी दुनिया के कई वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रही है.

डर इस बात का है कि ठंडी हवाओं के साथ बदलते मौसम की वजह से, कोरोना वायरस अपनी अधिक ताक़त के साथ तेज़ी से फैल सकता है.

कई वैज्ञानिकों को ये आशंका है कि सर्दी के मौसम में दुनिया को कोरोना वायरस की 'सेंकेंड वेव' का सामना करना पड़ सकता है, जो पहले से 'कहीं अधिक जानलेवा' होगी.

ये पूर्वानुमान भले ही जटिल और बेहद अनिश्चित लगे, लेकिन उत्तरी गोलार्ध के देशों के लिए चिंता का सबब कहा जा रहा है.

सवाल तो यही है कि सर्दी के मौसम में क्या कोरोना वायरस और कहर बरपाएगा, क्या पहले से कहीं अधिक लोग कोरोना वायरस का शिकार बनेंगे?

जंगल में लगी आग

''आशंका तो यही है कि कोरोना वायरस ने यदि अपने परिवार के अन्य वायरस की तरह व्यवहार किया तो सर्दियों में इसका संक्रमण बढ़ जाएगा.''

ये दावा है कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इनवॉयरमेंटल हेल्थ साइंसेज़ डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर मिकेला मार्टिनेज़ का जो बदलते मौसम के साथ किसी वायरस के स्वरूप में आने वाले बदलावों का वैज्ञानिक अध्ययन करती हैं.

मिकेला मार्टिनेज़ का मानना है कि संक्रामक रोगों के ग्राफ में सालभर उतार-चढ़ाव आता रहता है.

वो कहती हैं, "इंसानों में होने वाले हर संक्रामक रोग का एक ख़ास मौसम होता है. जैसे सर्दियों में फ्लू और कॉमन-कोल्ड होता है, उसी तरह गर्मियों में पोलिया और वसंत के मौसम में मीज़ल्स और चिकन-पॉक्स फैलता है. चूंकि सारे संक्रामक रोग मौसम के हिसाब से बढ़ते हैं, इसलिए ये माना जा रहा है कि कोरोना भी सर्दी में बढ़ेगा."

वैज्ञानिक इसकी दो मुख्य वजहें मानते हैं. कोरोना वायरस के संबंध में अभी तक जो प्रमाण मिले हैं, वो बताते हैं कि ह्यूमिडिटी जब बहुत अधिक होती है, कोरोना वायरस के लिए फैलना मुश्किल होता है.

मिकेला मार्टिनेज़ के मुताबिक, "फ्लू के मामले में ये होता है कि वायरस तापमान और हवा में मौजूद नमी के हिसाब से फैलता है. ये पक्के तौर पर एक समस्या है. वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से जाएगा या नहीं, ह्यूमिडिटी इसमें अहम रोल अदा करती है."

इसका मतलब ये हुआ कि सर्दियों में तापमान गिरने से जब ह्यूमिडिटी में कमी आएगी, तब ये वायरस हवा में अधिक से अधिक समय तक मौजूद रह सकता है.

मिकेला मार्टिनेज़ कहती हैं, "हम यह जानते हैं कि ये वायरस बंद जगहों में भी तेज़ी से फैलता है. सर्दियों में लोग बंद जगहों में अधिक रहते हैं. इन दो तथ्यों को जब हम इंसानों के व्यवहार के साथ मिलाकर देखते हैं तो यही लगता है कि सर्दियों में कोरोना वायरस तेज़ी से फैलेगा."

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में ऐसे कई अध्ययन किए हैं जो बदलते मौसम के साथ वायरस की ताकत में आए बदलाव को दर्शाते हैं.

लेकिन प्रयोगशाला में मिले नतीजों की अपनी सीमाएं होती हैं और ज़रूरी नहीं कि प्रयोगशाला के बाहर भी वही नतीजे निकलें. पर संक्रमण के दायरे में जब लाखों लोग आ जाते है, तो ये जंगल में लगी आग जैसा हो सकता है.

मिकेला मार्टिनेज़ कहती हैं, "आप इस तरह सोचिए कि संक्रामक रोग, जंगल में लगी आग की तरह होते हैं. थोड़ी बहुत बारिश से आग कुछ समय के लिए कम हो सकती है, लेकिन बुझती नहीं है. कोरोना मरीज जंगल की आग की तरह पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. इस साल तो ये आग नहीं बुझने वाली."

शायद यही वजह है कि ब्रिटेन में सरकार की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कोरोना वायरस की सेंकेंड वेब में पहले से कहीं अधिक लोगों की जान सकती है.

दवा के लिए तरसते मरीज़

न्यूयॉर्क टाइम्स में हेल्थ एंड साइंस जर्नलिस्ट कैथरीन वू सर्दी में कोरोना वायरस के मामले बढ़ने की आशंका पर चिंता जताते हुए, इलाज के मौजूदा तरीकों और उसमें इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ओर ध्यान देने की बात कहती हैं.

उनका मानना है, "शोधकर्ता कोरोना के ख़िलाफ़ कई तरीके आज़मा रहे हैं. पहला ये कि शुरुआती दिनों में ही मरीज़ को कोई ऐसी दवा दी जाए जिससे कोरोना वायरस शरीर के भीतर अपनी मौजूदगी बढ़ा ना सके और संक्रमण को बढ़ने से रोका जा सके. दूसरा ये कि मरीज़ का इम्यून सिस्टम कमज़ोर ना हो पाए. इसके लिए रेमडेसिवीर और डेक्सामेथासोन का इस्तेमाल किया जा रहा है."

ट्रायल्स में इन दोनों ही दवाओं के उत्साहवर्धक नतीजे मिले हैं. डेक्सामेथासोन की उपलब्धता को लेकर फिलहाल कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन रेमडेसिवीर का तीन महीने का पूरा स्टॉक अमरीका ने ख़रीद लिया है.

वो कहती हैं, "हमेशा से यही होता आया है. महामारी के समय कोई दवा कारगर साबित होती है तो सब उस दवा के पीछे भागते हैं और फिर वो दवा मिलना बंद हो जाती है. मुझे कई डॉक्टरों ने बताया है कि मरीज रेमडेसिवीर के लिए तरस रहे हैं."

कोरोना वायरस के इलाज के लिए जो तीसरा तरीका आज़माया जा रहा है वो है ब्लड प्लाज़्मा थैरेपी.

ब्लड प्लाज़्मा थैरेपी के बारे में कैथरीन वू का मानना है, "संक्रामक रोगों के इलाज के लिए ये तरीका 100 साल से ज्यादा समय से अपनाया जा रहा है. ये काम तो करता है, लेकिन दिक्कत ये है कि एक व्यक्ति का प्लाज़्मा दूसरे व्यक्ति पर असर करेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है. ब्लड प्लाज़्मा थैरेपी, गैम्बलिंग की तरह है."

कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित देशों में ऐसे लाखों लोग हैं जो संक्रमित होने के बाद सही समय पर मिले इलाज की वजह से ठीक हो गए.

लेकिन क्या सर्दी के मौसम में कोरोना वायरस इन लोगों को दोबारा निशाना नहीं बनाएगा?

इस सवाल पर कैथरीन वू का मानना है, "अभी तक ऐसे चिंताजनक मामले सामने नहीं आए हैं, जिनमें कोरोना संक्रमण से ठीक हुए व्यक्ति को, दोबारा कोरोना हो गया हो. दोबारा संक्रमित होना बहुत बड़ी समस्या बन सकता है. फिलहाल इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि एक बार कोरोना संक्रमण होने के बाद दोबारा संक्रमण नहीं होगा."

इम्यूनिटी की ढाल कोरोना वायरस से आख़िर कब तक बचाएगी, ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण है. इससे ना सिर्फ कोरोना को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी, बल्कि असरदार वैक्सीन बनाने का राज़ भी इसी सवाल में छिपा हुआ है.

फिलहाल वैक्सीन को लेकर जो अनिश्चितता बनी हुई है, उसकी वजह से सर्दियों में कोरोना के मामले बढ़ने की आशंका, चिंता की लकीरों को और गहरा कर देती है.

सही रणनीति

"ये बात बहुत स्पष्ट है कि जब अगला फ्लू सीज़न आएगा, हमें कोरोना इंफेक्शन की सेकेंड वेव का सामना करना पड़ेगा. सवाल ये है कि सेकेंड वेव से हम कैसे निपटेंगे, बीमारी को फैलने से कैसे रोकेंगे और संक्रमित हुए मरीज़ों का ठीक से इलाज कैसे करेंगे."

ये सवाल हैं जूडिथ वाल के जो बार्सिलोना यूनिवर्सिटी में 'हेल्थ एंड लेबर इकॉनोमिक्स' की प्रोफेसर हैं.

प्रोफेसर जूडिथ का मानना है कि साल 2020 के पहले आठ महीनों में जो अनुभव हुए हैं, उनसे सबक सीखना ज़रूरी है.

सर्दियों में कोरोना का ख़तरा बढ़ने की आशंकाओं पर वो कहती हैं, "सिस्टम में तालमेल बढ़ाना होगा. प्राइमरी हैल्थ सेंटर्स और बड़े अस्पतालों में तालमेल की ज़रूरत है. लोकल लेवल पर ज़्यादा से ज़्यादा टेस्ट करने होंगे और केवल गंभीर मरीज़ों को ही बड़े अस्पताल में भर्ती कराना होगा, सेकेंड वेव की नौबत आने पर सिस्टम तभी कारगर तरीके से काम कर पाएगा."

इतना ही नहीं, सर्दी में कोरोना इंफेक्शन के बढ़ते मामलों पर काबू पाने के लिए कॉन्टैक्ट ट्रैसिंग और बेहतर तरीके से करना होगा. प्रोफेसर जूडिथ का मानना है कि पहले आठ महीनों में कॉन्टैक्ट ट्रैसिंग ठीक से नहीं हुई, जिसका ख़ामियाज़ा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ा है.

फिर भी उनका मानना है, "अब आम लोग, हेल्थ केयर सिस्टम और राजनीतिक नेतृत्व पहले के मुकाबले ज्यादा तैयार हैं. इसलिए मैं इस मामले में आशावादी हूं कि हम सेकेंड वेव से निपट लेंगे. पहले के मुक़ाबले कम लोगों की जान जाएगी और पहले के मुक़ाबले कम पाबंदियां लगाई जाएंगी."

प्रोफेसर जूडिथ का ये विश्वास, हिम्मत तो बढ़ाता है, लेकिन अलग-अलग देशों के अलग-अलग हालातों की वजह से हर जगह लागू नहीं होता.

एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज़ की एक रिपोर्ट में अंदेशा जताया गया है कि सर्दी के मौसम में हालात बेकाबू होने पर सिर्फ ब्रिटेन में ही दो लाख, 51 हज़ार लोगों की मौत हो सकती है.

वैज्ञानिकों को अभी ये नहीं पता कि दुनियाभर में हाहाकार मचाने वाला कोरोना वायरस, जब सर्दियों में परेशान करने वाले बाकी वायरसों के संपर्क में आएगा, तब उनमें किस तरह की होड़ लगेगी.

लीडरशिप

जियो-पॉलिटिक्स ऑफ इमोशन के लेखक डोमिनिक मोइज़ी का मानना है कि दुनिया के ज्यादातर देशों का राजनीतिक नेतृत्व ऐसा नहीं है जो कोरोना वायरस की सेकेंड बेव से निपटने के लिए अपने देश में पूरी तरह से तैयार हो.

उनका मानना है, "आप भले ही ना डर रहे हों, लेकिन मैं ज़रूर भयभीत हूं. हम बहुत ही अजीब हालात से गुज़र रहे हैं, जिसके पीछे बहुत ही अजीब तरह के लोग हैं."

डोमिनिक मोइज़ी का पहला तर्क ये है कि पूरब और पश्चिम के लोगों में बड़ा फर्क है और एक की चिंता, दूसरे के लिए बेपरवाही का सबब है.

वो कहते हैं, "हम सब भले ही किसी एक चीज़ से डरते हो, लेकिन उस भय के प्रति हमारा रवैया अलग-अलग होता है. मसलन एशिया का सिविक सेंस अलग है. लोग वहां मास्क लगा रहे हैं. वो जानते हैं कि व्यक्तिगत जीवन के लिए सामूहिक जीवन का क्या महत्व है. लेकिन पश्चिमी जगत में हम देख रहे हैं कि सामूहिक उत्तरदायित्व को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए ख़तरा बताया जाता है."

डोमिनिक मोइज़ी यहां एक और दिलचस्प बात कहते हैं. उन्हें लगता है कि "मैं" और "हम" जैसे शब्द, कोरोना जैसी महामारी में बड़ा फर्क ला सकते हैं.

डोमिनिक मोइज़ी कहते हैं, "मुझे लगता है कि ये एक बड़ा ख़तरा है. हमें एक नए संतुलन की ज़रूरत है जहां पूरब में अधिक व्यक्तिगत आज़ादी और पश्चिम में अधिक सामूहिक ज़िम्मेदारी हो."

अलग-अलग देशों में भले ही अलग-अलग मिज़ाज की सरकारें हैं, लेकिन सर्दी में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ना तमाम सरकारों के लिए ख़तरे की दस्तक हो सकती है.

डोमिनिक मोइज़ी के मुताबिक, "कोरोना संकट के स्वास्थ्य संबंधी आयाम, लोकप्रिय नेताओं और उनकी सरकारों के लिए परेशानी की वजह बन सकते हैं. ब्राज़ील में बोलसोनारो और अमरीका में डोनल्ड ट्रंप इसके उदाहरण कहे जा सकते हैं. इसी तरह कोरोना संकट के आर्थिक आयाम उदारवादी लोकतांत्रिक देशों के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकते हैं."

आम लोगों की हेल्थ और देश की इकॉनमी में से किसे ज़्यादा तवज्जो दी जाए, इस बारे में दुनिया के नेताओं की राय और रुख़ अलग-अलग रहा है.

इस पहलू पर डोमिनिक मोइज़ी कहते हैं, "कोरोना इंफेक्शन के पहले दौर ने दुनियाभर की लोकप्रिय सरकारों की असलियत सामने ला दी. कोरोना इंफेक्शन के दूसरे दौर में बेहद ख़राब माली हालत की वजह से लोगों का गुस्सा उस हद तक बढ़ सकता है जो पहले कभी नज़र नहीं आया था."

कोरोना संकट ने अलग-अलग देशों के बीच मतभेदों की खाई और भी गहरी कर दी है. इसकी वजह से उन देशों के नेता कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं.

डोमिनिक मोइज़ी का मानना है, "अमरीका और चीन के बीच नया कोल्ड-वॉर कोरोना संकट की वजह से काफी बढ़ गया है. डोनल्ड ट्रंप को अमरीका के लिए एक बाहरी दुश्मन मिल गया. इसी तरह चीन को भी ख़ुशी हुई कि कोरोना की वजह से अमरीका की नींद उड़ गई."

इस तनाव का असर कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जारी मेडिकल रिसर्च पर भी पड़ा. क्या इस तनाव से ये भी तय होगा कि वैक्सीन पहले कौन बनाएगा और किसे वैक्सीन देर से मिलेगी?

इस बारे में डोमिनिक मोइज़ी का मानना है, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो देश सबसे पहले कोरोना की वैक्सीन बना लेगा, वो एक तरह से अपनी ताक़त का ही प्रदर्शन करेगा. लेकिन इस बात की भी संभावना है कि वैक्सीन बनाने में अलग-अलग देश, एक साथ कामयाब हो जाएं. तब वैक्सीन को ब्लैकमेल करने के लिए किसी हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा."

सर्दी के मौसम में क्या कोरोना वायरस और कहर बरपाएगा, क्या पहले से कहीं अधिक लोग कोरोना वायरस का शिकार बनेंगे? इस सवाल के जबाव अपने भीतर कई आयाम समेटे हुए हैं.

ज़्यादातर विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि ठंड के दिनों में कोरोना वायरस ज़्यादा परेशान करेगा. कोरोना वायरस के पहले दौर में दुनिया तैयार नहीं थी, किसी को कोई अनुभव नहीं था और लोगों ने भी जमकर लापरवाही भी की.

लेकिन अब दुनिया कोरोना वायरस के बारे में पहले से अधिक जानती है और उसके पास कोरोना वायरस से लड़ने का अनुभव भी है. इसलिए तमाम दिक्कतों के बावजूद, सर्दियों में भी कोरोना से निपटा जा सकता है, ज़रूरत है तो बस ग़लतियों से सबक सीखने की.

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