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कमला हैरिस से जो बाइडन को ताक़त मिलेगी या नुक़सान होगा
- Author, एंथनी जर्चर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडन ने मार्च में ही यह ऐलान कर दिया था कि वे उपराष्ट्रपति पद के लिए किसी महिला को चुनेंगे. इसके बाद से ही रनिंग मेट (यानी उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार) के तौर पर कमला हैरिस दौड़ में काफ़ी आगे बनी हुई थीं.
वे एक सुरक्षित और प्रैक्टिकल चुनाव थीं. अब वे डेमोक्रेटिक पार्टी की उत्तराधिकारी बनने की हैसियत में हैं. भले ही ऐसा चार साल बाद हो. अगर बाइडन नवंबर में चुनाव हार जाएँ या अगली बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव न लड़ें या आठ साल बाद जब बाइडन अपने दो टर्म पूरे कर लें.
शायद इसी वजह से दूसरे वैकल्पिक उम्मीदवार उतारने की पिछले एक महीने के दौरान काफ़ी कोशिशें हुई हैं.
दरअसल, अगले राष्ट्रपति के नामांकन की प्रतिस्पर्धा की यह पहली लड़ाई है. और हैरिस, जिनकी महत्वाकांक्षाएँ साफ़ हैं, अब इस प्रतिस्पर्धा में एक क़दम आगे खड़ी दिखाई देती हैं.
लेकिन, भविष्य के डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को तय करना बाद की लड़ाई है. फ़िलहाल पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि हैरिस किस तरह से बाइडन को व्हाइट हाउस तक पहुँचने में उनकी मदद कर सकती हैं.
यहाँ उनकी कुछ ख़ासियतों और डेमोक्रेट्स के मन में उन्हें लेकर चिंताओं का ज़िक्र किया जा रहा है.
ख़ासियतें
विविधता
खुलकर कहा जाए तो मौजूदा डेमोक्रेटिक पार्टी जो बाइडन जैसी दिखती नहीं है. यह युवा है और इसमें विभिन्न जाति और नस्ल के प्रतिनिधि हैं.
ऐसे में बड़े तौर पर यह स्वाभाविक था कि ऐसे उम्मीदवार की तलाश की जाए, जो उन्हें वोट देने वालों का प्रतिनिधित्व करे.
हैरिस के पिता जमैका से थे और माँ भारत की थीं. वे इस ख़ास ज़रूरत को पूरा करती हैं. वे पहली काली महिला और पहली एशियाई दोनों हैं, जो एक बड़ी पार्टी के लिए उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बन रही हैं.
हालाँकि, 55 साल की उम्र में वे युवा नहीं मानी जाएँगी, लेकिन 77 साल के जो बाइडन के मुक़ाबले वे काफ़ी फ़ुर्तीली हैं.
बाइडन की पसंद के तौर पर उनके नाम का ऐलान होने से पहले हैरिस ने पार्टी के नेतृत्व में विविधता की ज़रूरत को लेकर ट्वीट किया था.
उन्होंने लिखा था, "काली महिलाएँ और हाशिए पर मौजूद महिलाएँ लंबे समय से विधायिका में कम प्रतिनिधित्व रखती हैं. नवंबर में हमारे पास इसे बदलने का मौक़ा होगा."
अब हैरिस इन बदलावों में से कुछ के लिए ख़ुद सीधे तौर पर ज़िम्मेदार हो सकती हैं.
आक्रमण की ज़िम्मेदारी
उपराष्ट्रपति पद के लिए लड़ने वाले रनिंग मेट की पारंपरिक रूप से एक ज़िम्मेदारी यह भी होती है कि वह विपक्ष पर जमकर हमला करे और इसमें किसी भी स्तर तक जाए.
2008 में जॉन मैकेन की रनिंग मेट सारा पैलिन ने मिसाल के तौर पर अपने निकनेम से कहीं ज़्यादा ख़ुद को साबित किया था.
अगर हैरिस पर यह ज़िम्मेदारी आती है, तो अतीत को अगर देखें तो वे इस काम को आराम से पूरा कर लेंगी.
बाइडन को निश्चित रूप से याद होगा कि किस तरह से हैरिस जोश के साथ जुलाई 2019 में पहली डेमोक्रेटिक प्राइमरी डिबेट में उनके साथ लगी थीं. वे पूरी ताक़त से उनके विरोधियों की आलोचना कर रही थीं.
यूएस सीनेट में अपने दौर में वे बेहद दृढ़ और आक्रामक सवाल करने वाली भी साबित हुई हैं. डोनाल्ड ट्रंप इसे अच्छी तरह से जानते होंगे.
ट्रंप को भले ही यह अच्छा न लगे, लेकिन बाइडन ऐसे ही कठोर शख़्स की तलाश में थे.
लगातार लगे रहना
हालाँकि, हैरिस की 2020 की राष्ट्रपति पद के लिए कोशिश क़ामयाब नहीं हुई, लेकिन वे यह जानती हैं कि इस तरह की मुश्किल लड़ाई लड़ना कैसा होता है.
जनवरी 2019 में जब उन्होंने हज़ारों समर्थकों के सामने अपने कैंपेन की शुरुआत की थी, उस वक़्त उन्हें उच्च दर्जे का राष्ट्रपति पद का दावेदार माना गया था.
हैरिस इस कैंपेन की जटिलता और मुश्किलों को जानती हैं. चूँकि वे राष्ट्रपति पद के लिए ज़ोर लगा चुकी हैं, ऐसे में बहुत सारे अमरीकी उन्हें भविष्य के राष्ट्रपति के तौर पर देखते भी होंगे.
कैलिफोर्निया की सीनेटर हैरिस भले ही 2019 के चुनावी कैंपेन में सबसे डायनेमिक उम्मीदवार न रही हैं और निश्चित तौर पर वे सबसे सफल कैंडिडेट भी नहीं हैं, लेकिन वे आज के वक्त में एक परिचित चेहरा हैं.
बाइडन को एक ऐसे ही चेहरे की ज़रूरत अपने कैंपेन के लिए थी.
नुक़सान
हैरिस एक पुलिसवाली हैं
उपराष्ट्रपति पद के किसी भी दूसरे उम्मीदवार के मुक़ाबले हैरिस का क़ानून का पालन कराने वाले की पृष्ठभूमि है.
पुलिस की क्रूरता के ख़िलाफ़ हालिया विरोध-प्रदर्शनों और लॉ एनफोर्समेंट में नस्लवाद के आरोपों के दौर में हैरिस का रिज्यूमे डेमोक्रेटिक पार्टी में मौजूद कुछ प्रगतिशील लोगों में चिंता पैदा कर सकता है.
हैरिस के राष्ट्रपति चुनाव के कैंपेन के दौरान भी ऐसा ही हुआ था. उस समय 'हैरिस इज अ कॉप' के आरोप उन पर एक से ज़्यादा बार लगे थे.
सैन फ्रांसिस्को के डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी और कैलिफ़ोर्निया के अटॉर्नी जनरल के तौर पर हैरिस ने अभियुक्तों की बजाय पुलिस का पक्ष ही लिया. हालाँकि, वे मौत की सज़ा को लेकर निजी विरोध ज़ाहिर कर चुकी हैं, लेकिन जब वे दफ़्तर में थीं, तब उन्होंने इसका समर्थन किया था.
जुर्म से लड़ाई लड़ने वाला शख़्स होना भले ही स्वतंत्र और कंजर्वेटिव रुझान वाले वोटरों के लिए एक आकर्षक चीज़ है, लेकिन अगर यह समर्थन बाइडन-हैरिस के लिए लेफ़्ट के उत्साह की क़ीमत पर मिलता है, तो यह शायद उतना फ़ायदेमंद न हो.
जॉर्ज फ़्लायड की मौत के बाद से ही हैरिस लॉ-एनफोर्समेंट रिफ़ॉर्म की वकालत कर रही हैं. इस तरह से उन्हें कुछ प्रगतिवादियों का समर्थन भी हासिल हुआ है. लेकिन, अभी भी इस तबके को उन्हें लेकर कुछ आशंकाएँ हैं.
मान्यताएँ बदलना
हैरिस का राष्ट्रपति पद के लिए लड़ना उनके पक्ष में गया है. लेकिन, इसका एक दूसरा पहलू भी है. भले ही उनका कैंपेन ज़ोरदार और शानदार तरीक़े से शुरू हुआ, लेकिन इसमें कुछ ख़ामियाँ भी थीं. इनमें से कुछ ख़ामियाँ ख़ुद उम्मीदवार से संबंधित थीं.
हालांकि, बतौर सीनेटर और अटॉर्नी जनरल हैरिस का ठीक-ठाक रिकॉर्ड रहा है, लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के कैंपेन के दौरान लेफ़्ट की ओर रुझान दिखाया है.
वे निशुल्क स्कूली शिक्षा, ग्रीन न्यू डील एनवायरनमेंटल प्रोग्राम और यूनिवर्सल हेल्थकेयर के पक्ष में रही हैं, लेकिन वे कभी भी इसे लेकर ठोस रूप से दृढ़ नहीं दिखाई दी हैं.
निजी बीमा कंपनियों पर बैन लगना चाहिए या नहीं, जैसे सवालों पर वे ख़ास तौर पर अटकती दिखाई दी हैं. एक इंटरव्यू में वे इसके जवाब में, "लेट्स मूव ऑन" बोलती हैं.
इस समय और उम्र में किसी राजनीतिज्ञ का वोटरों की मांग के हिसाब से अपनी वैल्यूज़ और मान्यताओं को बदलना काफ़ी ख़तरनाक साबित हो सकता है.
हैरिस का एक उदारवादी से लेफ़्ट की ओर जाना और फिर से वापस आना ताकि बाइडन का साथ दिया जा सके, कुछ वोटर्स को शंका में डालता है.
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