कोरोना संकटः कैसा होगा आने वाले दिनों में हवाई सफ़र

कोविड-19 महामारी के चलते, इस समय दुनिया के तमाम देशों में यात्राओं पर प्रतिबंध है. इसका सबसे बुरा असर हवाई सफर पर पड़ा है.

अमरीका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक, हज़ारों विमान खड़े कर दिए गए हैं. 2001 में अमरीका पर 9/11 के आतंकी हमले के बाद, विमानन उद्योग इतने बड़े संकट से दो-चार है.

इस समय दुनिया के ज़्यादातर यात्री विमान खड़े हैं और उड़ान भरने की इजाज़त मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.

अब तमाम देश लॉकडाउन खोल रहे हैं. यात्राओं की इजाज़त दे रहे हैं. तो, धीरे-धीरे विमानन उद्योग भी गतिमान हो रहा है. अलग अलग देश, इसके लिए अलग नुस्खे अपना रहे हैं.

हाल ही में दक्षिण अफ्रीका ने अपने पर्यटन उद्योग को घरेलू पर्यटकों के लिए खोल दिया है. यानी अभी विदेशी यात्री, दक्षिण अफ्रीका नहीं आ सकेंगे.

इसके अलावा कई देश 'ट्रैवल बबल्स' बना रहे हैं. मतलब ये कि दो देश आपसी सहमति से एक दूसरे के यहां आने जाने के लिए हवाई सेवाएं शुरू कर रहे हैं.

जैसे कि 10 जुलाई से ब्रिटेन ने पचास देशों के साथ विमान सेवाएं शुरू कर दिया है. इन देशों से ब्रिटेन आने वाले मुसाफ़िरों को बिना क्वारंटीन के ही घुसने की इजाज़त होगी.

ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि, 'सभी यात्रियों को क्वारंटीन करने के बजाय हम केवल उन्हीं देशों के यात्रियों को क्वारंटीन करेंगे, जहां पर वायरस पर अभी क़ाबू नहीं पाया जा सका है.'

हवाई सफ़र शुरू करने के लिए जो एक और नुस्ख़ा आज़माया जा रहा है, वो है टेस्टिंग की व्यापक व्यवस्था. इसकी मदद से एयरपोर्ट पर पहुंचने वाले विदेशी यात्रियों का फ़ौरन कोरोना टेस्ट होगा इसके बाद ही उन्हें देश में प्रवेश की इजाज़त दी जाएगी.

मगर, वायरस टेस्टिंग के साथ सबसे बड़ी दिक़्क़त आती है, इनके नतीजों के सटीक होने की. अक्सर कई टेस्ट में वायरस का संक्रमण पकड़ में नहीं आता.

अगर एक भी यात्री का ग़लत टेस्ट होता है, तो आगे जाकर वो अनगिनत लोगों को कोरोना वायरस का शिकार बना सकता है.

न्यूयॉर्क के रोचेस्टर इंस्टीट्यूट की मौरीन फेरन इसे फाल्स नेगेटिव कहती हैं.

मौरीन के मुताबिक़, 'ऐसा तब होता है जब नाक से लिए गए सैंपल सही तरीक़े से नहीं निकाले जाते. कई बार नाक में वायरस की मौजूदगी देर से होती है. संक्रमण के शुरुआती दौर में वायरस वहां नहीं होते. यानी अगर उस दौरान नाक से सैंपल लिए गए, तो वो व्यक्ति कोरोना नेगेटिव पाया जाएगा. जबकि उसके अंदर कोरोना वायरस मौजूद होगा.'

कोरोना वायरस की वैक्सीन आ जाने से भी हवाई सफ़र को राहत मिलेगी. क्योंकि वैक्सीन से शरीर को रोगाणुओं से लड़ने की ताक़त मिलती है.

कई टीकों का ट्रायल चल रहा है. फिर भी अभी कोरोना वायरस के टीके के हर इंसान तक पहुंचने में वक़्त लगेगा. इसमें कई महीने या बरस भी लग सकते हैं.

याद रखिए कि खसरे का टीका ईजाद करने में दस साल लग गए थे और वो पचास साल बाद बाज़ार में उतारा जा सका था. हालांकि, कोरोना वायरस की वैक्सीन आने में इतना भी समय नहीं लगेगा.

कोविड-19 से पहले हवाई सफर करने वालों को काफ़ी सुविधाएं दी जाती थीं. हेडफ़ोन, ख़ास पसंदीदा खाना. लेकिन, कोविड-19 के बाद इनमें से कई सुविधाओं में कटौती होनी तय है.

सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए विमान की कुछ सीटें खाली रखनी पड़ेंगी. इसलिए एयरलाइंस को अपना मुनाफ़ा बनाने के लिए सुविधाओं में कटौती करनी ही पड़ेगी. हां, यात्रियों को मास्क और फेस शील्ड जैसी ज़रूरी चीज़ें देने का चलन भी शुरू हो गया है.

मांग कम होने के कारण अक्सर किराया भी बढ़ जाता है. तो आने वाले समय में हमें, हवाई सफ़र के लिए बढ़ा हुआ किराया देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

क्योंकि एयरलाइन चलाना बहुत महंगा काम है. एक बोइंग 737 विमान दस करोड़ डॉलर से भी महंगा होता है. फिर, इसमें ईंधन और टैक्स भी जोड़ें.

साथ साथ पायलट और केबिन क्रू का ख़र्च शामिल कर लें, तो एक ही विमान उड़ाने में सैकड़ों करोड़ रुपए की लागत आती है.

इतनी भारी लागत वसूलने के लिए कई बजट एयरलाइंस अपने विमानों में अधिक यात्री बैठाती हैं.

जैसे कि आयरलैंड की रायनएयर या भारत कि इंडिगो एयरलाइंस. ये अपने केबिन में दस प्रतिशत ज़्यादा यात्री बैठाती हैं. ताकि लागत वसूल सकें.

अब सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में बजट एयरलाइंस ये नुस्खा नहीं आज़मा सकतीं. मांग उठ रही है कि विमानों में दो तिहाई से ज़्यादा सीटें न भरी जाएं. इस वजह से भी हवाई सफ़र का किराया बढ़ने की आशंका है.

यूरोपीय कंपनी एयरबस के चीफ एग्ज़ेक्यूटिव गुइलोमे फॉरी कहते हैं कि, 'कोविड-19 विमान उद्योग के लिए अब तक का सबसे बड़ा संकट है.' इसी तरह 300 एयरलाइंस का संगठन IATA कहता है कि, 'विमानन उद्योग का रिकवरी का सफर अभी तो शुरू ही हुआ है. ये बहुत लंबा और तकलीफ़देह सफर होगा.'

लब्बोलुबाब ये है कि हवाई यात्रा का कारोबार कोविड-19 के सदमे से उबर तो जाएगा ही. लेकिन, ये कब तक होगा और इसकी लागत कितनी आएगी, कह पाना मुश्किल है.

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