चीन का हॉन्ग कॉन्ग सुरक्षा क़ानून: क्या है ये और क्यों है ये चिंता का सबब?

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चीन ने हॉन्ग कॉन्ग के लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून पास किया है. कइयों का मानना है कि ये इस छोटे से प्रदेश को मिली अनूठी आज़ादी को ख़त्म करने का बड़ा औज़ार साबित होगा.

ये क़ानून है क्या और इसमें वो क्या बात है जिससे लोग सबसे अधिक डर रहे हैं?

यह क़ानून क्या है?

आज से नहीं बल्कि काफी पहले से ही हॉन्ग कॉन्ग में एक सुरक्षा क़ानून बनना था लेकिन ये क़ानून इतना अलोकप्रिय था कि इसे कभी पास नहीं किया जा सका.

ऐसे में ये सुनिश्चित करने के लिए कि शहर के पास एक क़ानूनी तंत्र हो, चीन ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है. ऐसे तंत्र के न होने को चीन अपने अधिकार के लिए गंभीर चुनौतियों के रूप में देखता है.

इस क़ानून का पूरा मसौदा फिलहाल उपलब्ध नहीं है लेकिन हम ये जानते हैं कि इस क़ानून में इन सभी बातों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है -

  • संबंध तोड़ना यानी चीन से अलग होना
  • केंद्रीय सरकार के शासन को न मानना या उसकी ताकत को कमज़ोर करना
  • आतंकवाद, लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा करना या फिर उन्हें डराना धमकाना
  • विदेशी ताकतों से सांठगांठ करना
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ये क़ानून हॉन्ग कॉन्ग में क्या कर सकता है?

विवादों में रहने वाले हॉन्ग कॉन्ग के एक स्रोत के अनुसार केवल कुछ ही लोगों ने इस क़ानून का पूरा मसौदा देखा है.

सरकारी मीडिया में इससे जुड़े कई विवरण सामने आए हैं, जैसे -

चीन, हॉन्ग कॉन्ग में एक नया राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यालय बनाएगा, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करेगा और यहां होने वाले "अपराधों को देखेगा".

कुछ मामलों की सुनवाई चीन में कराने के लिए यह कार्यालय उन मामलों के वहां भेज सकेगा. हालांकि चीन ने कहा है कि उसके पास केवल "सीमित" मामलों की सुनवाई चीन में कराने की ताकत होगी.

इसके अलावा, चीन के नियुक्त किए गए सलाहकार के साथ क़ानून लागू करने के लिए हॉन्ग कॉन्ग को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग भी बनाना होगा.

हॉन्ग कॉन्ग के मुख्य कार्यकारी के पास राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों की सुनवाई के लिए जजों को नियुक्त करने की ताकत होगी, जिससे न्यायिक स्वायत्तता को लेकर चिंता बढ़ सकती है.

चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अपराधों के लिए अधिकतम सज़ा, आजीवन कारावास हो सकती है.

सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा जिस पर विवाद है, वो ये है कि इस क़ानून की व्याख्या कैसे करनी है इसका पूरा अधिकार चीन के पास होगा न कि हॉन्ग कॉन्ग के किसी न्यायिक संस्था या नीति संस्था के पास. यदि हॉन्ग क़ॉन्ग के किसी क़ानून के साथ उस क़ानून का संघर्ष होता है तो उस स्थिति में चीन के क़ानून को ही प्राथमिकता मिलेगी.

ये क़ानून 1 जुलाई को लागू हो रहा है. ब्रितानी शासकों के इस प्रदेश को चीन के हवाले करने की ये 23वीं सालगिरह होगी.

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क्यों डर रहे हैं हॉन् कॉन्ग के लोग?

चीन ने कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ साथ हॉन्ग कॉन्ग को नागरिकों के सम्मान, अधिकारों और स्वतंत्रता की भी रक्षा करनी चाहिए. लेकिन अभी भी कई लोगों का मानना है कि इस कानून के साथ हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्तता ख़त्म हो जाएगी.

इस क़ानून के पास होने से पहले यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉन्ग कॉन्ग में क़ानूनी मामलों के स्कॉलर प्रोफ़ेसर जोहानेस चान ने बीबीसी से कहा था, "ये स्पष्ट है कि इस क़ानून का गंभीर असर भले ही निजी सुरक्षा पर न पड़े लेकिन इसका असर अभिव्यक्ति के अधिकार पर पड़ेगा."

इस क़ानून के पास होने से पहले कई लोगों ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट डिलीट कर दिए हैं और कई लोग चिंता जता रहे हैं कि जिस किस ने राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून का विरोध किया है उसे चुनावों में लड़ने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.

कईयों को ये भी डर है कि इससे हॉन्ग कॉन्ग की न्यायिक स्वतंत्रता भी ख़त्म हो जाएगी और ये पूरी व्यवस्था ठीक वैसी हो जाएगी जैसी चीन में है. चीन का ये अकेला शहर है जहां कॉमन लॉ लागू है.

प्रोफ़ेसर चान कहते हैं, "प्रभावी तौर पर वो पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की आपराधिक प्रणाली को हॉन्ग कॉन्ग के कॉमन लॉ सिस्टम पर थोप रहे हैं. ऐसे में किन लोगों को इस सिस्टम में फंसाना है इसका पूरा मौक़ा उनके पास होगा."

जोशुआ वोंग जैसे कुछ लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता विदेशी सरकारों की पैरवी कर रहे हैं और हॉन्ग कॉन्ग के लिए मदद मांग रहे हैं. नए क़ानून के तहत भविष्य में इस तरह का अभियान अपराध माना जा सकता है. वोंग ने अब अपनी डेमोसिस्टो पार्टी छोड़ दी है.

ये भी चिंता है कि इस कानून को पुराने वक्त से यानी पुरानी तारीख से भी लागू किया जा सकता है

लोगों को यह भी चिंता है कि हॉन्ग कॉन्ग की स्वतंत्रता को ख़तरा हुआ तो यहां के व्यापार और आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ेगा.


चीन ऐसा क्यों कर रहा है?

एक अनूठे करार के तहत 1997 में ब्रिटेन ने हॉन्ग कॉन्ग को चीन को सौंप दिया था. ये एक तरह का छोटा संविधान था जिसे बेसिक लॉ कहा गया. इसे "एक देश, दो प्रणाली" सिद्धांत का नाम भी दिया जाता है.

इसके अनुसार चीन की ज़िम्मेदारी है कि वो हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्तता की रक्षा करे, वहां लोगों को एक साथ आने की और अभिव्यक्ति की आज़ादी दे. साथ ही वहां स्वतंत्र न्यायपालिका का गठन करे और गणतांत्रिक अधिकार सुनिश्चित करे. ऐसा चीन के अन्य शहरों के साथ नहीं हैं.

इसी करार के तहत हॉन्ग कॉन्ग को अपना खुद का राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लागू करना था. बेसिक लॉ के अनुच्छेद 23 में इसका ज़िक्र है लेकिन यहां ये इतना अलोकप्रिय रहा कि ये क़ानून कभी बन ही नहीं सका.

बीते साल हॉन्ग कॉन्ग में प्रत्यर्पण क़ानून को लेकर हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए जिन्होंने जल्द ही चीन विरोधी और गणतंत्र समर्थक विरोध प्रदर्शनों का रूप ले लिया.

चीन एक बार फिर इस स्थिति से दो चार नहीं होना चाहता.

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चीन ऐसा कैसे कर सकता है?

कई लोग सवाल करते हैं कि अगर एक करार के तहत इस शहर को अपनी स्वायत्तता मिली हुई थी और इसे आज़ादी की गारंटी दी गई थी तो चीन ऐसा कैसे कर सकता है.

बेसिक लॉ में कहा गया है कि चीन तब तक अपने क़ानून हॉन्ग कॉन्ग में लागू नहीं कर सकता जब तक इसका ज़िक्र एनेक्सचर-तीन में न हो. इस हिस्से में पहले ही कई क़ानून सूचीबद्ध हैं जो विवादित हैं और विदेश नीति के इर्दगिर्द बनाए गए हैं.

इन कानूनों को एक डिक्री या हुक्मनामे के साथ भी लागू किया जा सकता है जिसका मतलब है कि आसानी से शहर की संसद के बिना भी इन्हें लागू किया जा सकता है.

आलोचक मानते हैं कि इस तरह क़ानून लागू करना हॉन्ग कॉन्ग के "एक देश, दो प्रणाली" सिद्धांत का उल्लंघन होगा जो इस शहर के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. लेकिन तकनीकी स्तर पर ऐसा करना बिल्कुल संभव है.

बीबीसी संवाददाता ग्रेस त्सोई औऱ लैम चो वाई की रिपोर्ट

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