हॉन्ग कॉन्ग के नए सुरक्षा क़ानून को चीन की संसद ने दी मंज़ूरी

चीन की संसद में हॉन्ग कॉन्ग के उस नए सुरक्षा क़ानून को मंज़ूरी दे दी है जिसके तहत केंद्रीय सरकार की सत्ता को कमज़ोर करना अपराध माना जाएगा. अब इस विधेयक को चीन के वरिष्ठ नेतृत्व के पास भेजा जाएगा.

इस क़ानून को लेकर वे लोग चिंता जाहिर कर रहे हैं जिनका कहना है कि इससे हॉन्ग कॉन्ग का विशेष दर्जा ख़त्म हो जाएगा. नए सुरक्षा क़ानून के तहत चीन को हॉन्ग कॉन्ग के भीतर अपनी सुरक्षा एजेंसियों के गठन का अधिकार होगा. हॉन्ग कॉन्ग के लिए ये एकदम से नई बात है.

इस क़ानून के ख़िलाफ़ हॉन्ग कॉन्ग में पहले से ही विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी था. इससे पहले बुधवार को हॉन्ग कॉन्ग में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी हुई थीं. उस दिन हॉन्ग कॉन्ग की संसद में एक दूसरे प्रस्तावित क़ानून पर बहस हो रही थी जिसके तहत चीन के राष्ट्रगान का अनादर अपराध माना जाएगा.

बुधवार को हॉन्ग कॉन्ग में सैंकड़ों लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. हॉन्ग कॉन्ग की संसद में गुरुवार को भी प्रस्तावित क़ानून पर बहस जारी है और सुरक्षा बल एलर्ट पर हैं.

24 मई के विरोध प्रदर्शन

रविवार को भी हॉन्ग कॉन्ग में प्रस्तावित नए सुरक्षा क़ानून के विरोध में सैकड़ों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था.

पुलिस ने लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया. चीन की योजना हॉन्ग कॉन्ग में नया सुरक्षा क़ानून लागू करने की है जिसका लोग वहां विरोध कर रहे हैं. प्रदर्शन को देखते हुए हॉन्ग कॉन्ग में प्रशासनिक कार्यालय के बाहर पुलिस का भारी बंदोबस्त किया गया था.

रविवार को नए सुरक्षा क़ानून का विरोध कर रहे सैकड़ों प्रदर्शनकारी हाथ में बैनर-पोस्टर लिए हुए हॉन्ग कॉन्ग की सड़कों पर देखे गए.

चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाते हुए कहा है, 'बुनियादी क़ानून' के तहत जो आज़ादी और वैध हक़ दिए गए हैं, हॉन्ग कॉन्ग के ज़्यादातर लोगों के इन अधिकारों पर असर नहीं पड़ेगा. इससे न ही शहर के कारोबारी माहौल पर प्रभाव पड़ेगा. ये क़ानून 'एक देश, दो सिस्टम' वाली व्यवस्था को बरकरार रखने में मदद करेगा."

हॉन्ग कॉन्ग की स्वायतत्ता

इससे पहले दुनिया भर के दो सौ राजनेताओं ने नए सुरक्षा क़ानून के मसौदे की आलोचना करते हुए एक साझा बयान जारी किया था.

उन्होंने अपने-अपने देश की सरकारों से ये साफ़ करने की अपील की है कि हॉन्ग कॉन्ग की स्वायतत्ता के साथ किसी किस्म की छेड़खानी स्वीकार नहीं की जाएगी. साझा बयान पर दस्तखत करने वाले लोगों में हॉन्ग कॉन्ग के पूर्व ब्रिटिश गवर्नर क्रिस पैटन भी शामिल हैं.

दो दशक पहले हॉन्ग कॉन्ग की स्वायतत्ता को लेकर चीन-ब्रिटेन ने एक जॉइंट डिक्लेरेशन जारी किया था. इस साझा बयान में चीन की योजना को ऐतिहासिक जॉइंट डिक्लेरेशन का खुला उल्लंघन बताया गया है.

चीन के विदेश मंत्री ने इस पर कहा, "हॉन्ग कॉन्ग की घटनाएं चीन का आंतरिक मामला है. वैश्विक संबंधों के तहत दूसरों के घरेलू मामलों में दखलंदाज़ी नहीं की जाती है. चीन ये बात स्पष्ट कर देना चाहता है."

चीन ने हॉन्ग कॉन्ग को लेकर उस समय एक तरह से राजनीतिक धमाका कर दिया जब उसने कहा कि वो इस शहर में एक नया सुरक्षा क़ानून लागू करने जा रहा है. कई लोगों की ये आशंका है कि इससे हॉन्ग कॉन्ग के लोगों को मिलने वाली आज़ादी ख़त्म हो जाएगी जो आम चीनी लोगों को भी मयस्सर नहीं है.

ये क़ानून क्या कहता है?

सबसे पहले तो चीन ने अपनी रबर स्टांप पार्लियामेंट में इस प्रस्तावित क़ानून का मसौदा पेश किया, जिस पर 28 मई को संसद में वोटिंग हुई और ये पारित कर दिया गया. इसके बाद ही ये प्रस्ताव क़ानून की शक्ल ले पाएगा.

हालांकि अभी तक इस प्रस्तावित क़ानून के बारे में पूरी जानकारी सामने नहीं आई है पर लोगों की कई चिंताएं हैं. जो बातें अभी तक हमें मालूम हैं, उसके अनुसार...

देश से रिश्ता तोड़ना, केंद्रीय सरकार की सत्ता या अधिकार को कमज़ोर करना अपराध माना जाएगा. लोगों को डराना धमकाना या उनके ख़िलाफ़ हिंसा का इस्तेमाल चरमपंथ के अपराध के तहत आएगा. हॉन्ग कॉन्ग के मामलों में दखलंदाज़ी करने वाली विदेशी ताक़तों की गतिविधियां भी अपराध की श्रेणी में आएंगी.

प्रस्तावित क़ानून के जिस प्रावधान को लेकर लोग ज़्यादा चिंतित हैं, वो ये है कि चीन हॉन्ग कॉन्ग में ऐसी एजेंसियों की गठन कर सकता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार होंगी. इसका मतलब ये हुआ कि हॉन्ग कॉन्ग में चीन की अपनी क़ानून लागू करने वाली एजेंसी होंगी जबकि शहर में पहले से ही ऐसी एजेंसियां मौजूद हैं.

चीन ऐसा क्यों कर रहा है?

साल 1997 में हॉन्ग कॉन्ग ब्रितानियों के नियंत्रण से निकलकर चीन के पास आया था. लेकिन इसके लिए दोनों देशों के बीच एक अनूठा समझौता हुआ था. हॉन्ग कॉन्ग के लिए एक छोटे से संविधान की नींव रखी गई थी जिसे 'बेसिक लॉ' यानी बुनियादी क़ानून भी कहते हैं.

इसके साथ ही चीन में 'एक देश, दो सिस्टम' की कथित अवधारणा का जन्म हुआ. माना गया कि इस बुनियादी क़ानून की वजह से हॉन्ग कॉन्ग के लोगों को कुछ ख़ास मुद्दों पर आज़ादी हासिल रहेगी. वे जनसभा कर सकेंगे, उन्हें अपनी बात कहने और रखने का हक़ होगा और वहां एक स्वतंत्र न्यायपालिका होगी.

साथ ही कुछ ऐसे लोकतांत्रिक अधिकार भी होंगे जो आम चीनी लोगों को मयस्सर नहीं हैं. इसी समझौते के तहत हॉन्ग कॉन्ग को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लागू करने का हक़ भी हासिल है. 'बेसिक लॉ' के अनुच्छेद 23 में इसके लिए प्रावधान किया गया है.

लेकिन ये प्रावधान इतना अलोकप्रिय था कि इसका कभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया. सरकार ने एक बार पहले भी साल 2003 में कोशिश की थी. लेकिन तब पांच लाख लोग सड़कों पर उतर आए थे और सरकार को अपना क़दम वापस खींचना पड़ा था.

पिछले साल एक प्रत्यर्पण क़ानून को लेकर भी महीनों विरोध प्रदर्शन हुए और हिंसा भड़क गई. आगे चलकर इस विरोध प्रदर्शन ने भी चीन विरोधी और लोकतंत्र समर्थक स्वरूप ले लिया था. इसलिए चीन नहीं चाहता कि वहां दोबारा ऐसा हो.

हॉन्ग कॉन्ग के लोग डरे हुए क्यों हैं?

हालांकि अभी तक इस प्रस्तावित क़ानून को अमलीजामा नहीं पहनाया गया है, इसलिए इसके प्रावधानों को लेकर फ़िलहाल पक्के तौर पर कुछ कहना मुश्किल है. लेकिन फिर भी हॉन्ग कॉन्ग के लोगों को डर है प्रस्तावित क़ानून की वजह से उनके नागरिक अधिकार छिन सकते हैं.

चीन मामलों के जानकार विली लैम चिंता जताते हैं कि इस क़ानून के तहत लोगों को चीन की आलोचना के अपराध में सज़ा दी जा सकती है. चीन के मुख्य भूभाग में ऐसा होता है.

लोगों को डर है कि इससे उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शन के अधिकार का हनन होगा. आज के हॉन्ग कॉन्ग में ये क़ानूनी हक़ है. चीन में इस तरह की गतिविधियां केंद्रीय सरकार की सत्ता या अधिकार को कमज़ोर करने के दायरे में आती हैं.

जोशुआ वॉन्ग के जैसे अहम एक्टिविस्ट विदेशी सरकारों के सामने हॉन्ग कॉन्ग में लोकतंत्र समर्थक मुहिम की मदद करने का मुद्दा उठाते रहे हैं. सालों की पैरवी और कोशिश के बाद अमरीका ने हॉन्ग कॉन्ग ह्यूमन राइट्स एंड डेमोक्रेसी एक्ट पास किया था. कुछ लोगों को डर है कि आने वाले समय में ऐसे आंदोलन अपराध की श्रेणी में आ जाएंगे.

डर की और वजहें भी हैं. कई लोगों की आशंका है कि हॉन्ग कॉन्ग की न्याय व्यवस्था भी चीन जैसी हो जाएगी.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉन्ग कॉन्ग में लॉ के प्रोफ़ेसर जोहानेस चान कहते हैं, "राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े लगभग सभी मामलों में बंद दरवाज़ों के पीछे सुनवाई होती है. ये कभी नहीं बताया जाता है कि क्या इलज़ाम हैं और क्या सबूत हैं. और राष्ट्रीय सुरक्षा की संकल्पना भी इतनी अस्पष्ट है कि आप किसी भी गतिविधि को इसके दायरे में ला सकते हैं."

लोगों के डर की एक और वजह भी है. बहुत से लोगों को ये लगता है कि हॉन्ग कॉन्ग में जिस किस्म की आज़ादी आज की तारीख में हासिल हैं, अगर उसमें कटौती की जाती है तो एक आर्थिक और व्यापारिक केंद्र के रूप में हॉन्ग कॉन्ग का आकर्षण कमज़ोर पड़ जाएगा.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि हॉन्ग कॉन्ग में न केवल राजनीतिक भविष्य बल्कि आर्थिक भविष्य भी दांव पर लगा हुआ है.

चीन के पास क्या रास्ता है?

'बेसिक लॉ' के अनुसार चीन में लागू क़ानून जब तक कि तीसरी अनुसूची में दर्ज न हो जाएं, हॉन्ग क़ान्ग में नहीं लागू हो सकते हैं. वहां पहले से कुछ क़ानून दर्ज हैं लेकिन उनमें ज़्यादातर प्रावधान ग़ैर-विवादास्पद थे और विदेशी नीति के विषयों से जुड़े हुए हैं.

हालांकि चीन के पास और भी रास्ते हैं. चीन के मुख्य भूभाग में लागू क़ानून हॉन्ग कॉन्ग में 'डिक्री' यानी क़ानून का दर्जा रखने वाले आधिकारिक आदेश के ज़रिए लागू किए जा सकते हैं. इसका मतलब हुआ कि ऐसा करने की सूरत में हॉन्ग कॉन्ग की संसद के अधिकार को नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा.

हॉन्ग कॉन्ग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैरी लैम ने पहले ही कह रखा है कि वो इस क़ानून को जल्द से जल्द पारित कराने के लिए चीन की सरकार का सहयोग करेंगी. आलोचकों का कहना है कि ये 'एक देश, दो सिस्टम' की अवधारणा का सरासर उल्लंघन है जो हॉन्ग कॉन्ग के लिए काफी अहमियत रखता है.

प्रोफ़ेसर चान का कहना है कि प्रस्तावित क़ानून हॉन्ग कॉन्ग के 'बेसिक लॉ' के अनुच्छेद 23 का भी उल्लंघन करता है. वो कहते हैं, "ऐसा लगता है कि चीन 'बेसिक लॉ' को अपनी मर्जी से पारिभाषित कर सकता है और ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं."

चीन जिस क़ानून को हॉन्ग कॉन्ग में लागू करना चाह रहा है, उसके मसौदे से ये संकेत मिलते हैं कि हॉन्ग कॉन्ग की सरकार को अनुच्छेद 23 के तहत अभी भी अलग से एक राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लाने की ज़रूरत है.

प्रोफ़ेसर चान कहते हैं कि अगर किसी राष्ट्रीय क़ानून में किसी बात पर कोई रोक लगाई जाती है तो उसे पहले तीसरी अनुसूची में जोड़ा जाना चाहिए और ये रास्ता हॉन्ग कॉन्ग की संसद से होकर जाता है क्योंकि दोनों की न्याय व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं.

वे कहते हैं, "दोनों जगहों पर जो क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम लागू हैं, वो अलग मूल्यों पर आधारित हैं. इसलिए किसी बात को अपराध करार देने का फ़ैसला केवल हॉन्ग कॉन्ग को करना चाहिए न कि चीन की केंद्रीय सरकार को."

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