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कोरोना वायरस की वैक्सीन पर अमरीका का यह दांव भारत के लिए कैसा?
अमरीका ने कोरोना वायरस के लिए वैक्सीन बना रही ब्रितानी कंपनी एस्ट्राजेनेका में 1.2 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की है. इस निवेश के साथ ही अब ये साफ़ हो गया है कि अमरीका एक अरब वैक्सीन का एक तिहाई हिस्सा ख़रीदेगा.
कोरोना वायरस के कारण रुकी अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिए कई देशों के नेता वैक्सीन का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन अब तक कोरोना के लिए वैक्सीन बन नहीं पाई है, इस पर फ़िलहाल कई जगहों पर कोशिशें जारी है.
वैक्सीन की ज़रूरत पर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार ज़ोर देने के बाद अमरीकी स्वास्थ्य विभाग, (डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ ऐंड ह्यूमन सर्विसेज) एस्ट्राजेनेका से वैक्सीन के 30 करोड़ डोज़ खरीदने के लिए सहमत हो गई है.
अमरीकी स्वास्थ्य मंत्री ऐलेक्स अज़ार का कहना है, "एस्ट्राजेनेका के साथ हुए अहम समझौते से ये तय हो गया है कि साल 2021 तक व्यापक रूप से कोरोना के लिए प्रभावी वैक्सीन बन सकेगी."
स्वास्थ्य विभाग से जारी एक बयान के अनुसार इस साल के अक्टूबर तक ये वैक्सीन अमरीका को मिल सकती है.
क्या है ये वैक्सीन?
ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी जिस वैक्सीन पर काम कर रही है उसका लाइसेंस ब्रितानी कंपनी एस्ट्राजेनेका के पास है. पहले इस वैक्सीन का नाम था - ChAdOx1 nCoV-19, अब इसका नाम AZD1222 रखा गया है.
कोरोना वायरस के लिए अब तक कोई वैक्सीन नहीं बन सकी है. ऐसे में ये वैक्सीन कितनी कारगर साबित होने वाली है इस विषय में फ़िलहाल कोई जानकारी नहीं है. अमरीका के साथ हुए इस समझौते के बाद 30,000 अमरीकियों पर इस वैक्सीन के तीसरे चरण का क्लिनिकल ट्रायल किया जा सकेगा.
एस्ट्राजेनेका का कहना है कि वैक्सीन के 40 करोड़ डोज़ बनाने के लिए कंपनी ने अहम समझौते किए हैं. कंपनी की क्षमता वैक्सीन के एक अरब डोज़ बनाने की है और वो इस साल सितंबर में वैक्सीन की डिलीवरी शुरू करेगी.
कंपनी का ये भी कहना है कि कोरोना महामारी के दौर में बिना किसी लाभ कमाए वो पूरी दुनिया तक ये वैक्सीन पहुंचाना चाहती है. इससे पहले एस्ट्राजेनेका ने कहा था कि वो वैक्सीन के 10 करोड़ डोज़ ब्रितानी नागरिकों के लिए सप्लाई करेगी. इसमें से क़रीबी 3 करोड़ डोज़ वो इसी साल सितंबर में डिलीवर करेगी.
अमरीका के साथ हुए समझौते के बाद एस्ट्राजेनेका अब लंदन स्टॉक एक्सचेंज की सबसे बड़ी 100 ब्लूचिप कंपनियों की सूची में भी शामिल हो गई है. कंपनी के चीफ़ एग्ज़ेक्युटिव पास्कल सोरियोट ने कहा है कि, "वैक्सीन बनाने के काम को आगे बढ़ाने के लिए समर्थन देने के लिए अमरीका और ब्रिटेन की सरकारों का शुक्रिया."
वैक्सीन का ट्रायल
कोरोना वायरस के कारण अब तक दुनिया भर में 332,900 लोगों की जान जा चुकी है. यूरोप समेत दुनिया के कुल 188 देश इस वायरस से जूझ रहे हैं और माना जा रहा है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था को इतना बड़ा झटका लगा है.
चूंकि इस वायरस का अब तक कोई इलाज नहीं निकल पाया है और दुनिया भर से नेताओं की उम्मीद वैक्सीन पर है.
AZD1222 कोरोना वैक्सीन के पहले और दूसरे चरण का क्लिनिकल ट्रायल बीते महीने शुरू हुआ है. 18 से 55 साल की उम्र के एक हज़ार हेल्थी वॉलन्टियर पर चल रहा ये ट्रायल वैक्सीन की सुरक्षा और इम्यूनोजेनेसिटी के लिए किया जा रहा है. माना जा रहा है कि इस ट्रायल के नतीजे जल्द ही सामने आएंगे.
हालांकि अब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस कोविड 19 के इलाज के लिए किसी भी वैक्सीन के अप्रूव नहीं किया है. संगठन के अनुसार चीन, जर्मनी और जापान समेत कई देशों में कोरोना वायरस की वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं. हालांकि जानकार मानते हैं कि इसके वैक्सीन को बनने में 12 से 18 महीनों का वक़्त लग सकता है.
अब तक केवल कुछ ही वैक्सीन का शोध इंसानों पर ट्रायल के स्तर तक पहुंच सका है. एस्ट्राजेनेका का कहना है कि उसे "इस बात का अंदाज़ा है कि हो सकता है कि ये वैक्सीन कामयाब न हो, लेकिन इसका क्लिनिकल ट्रायल करने और इसके उत्पादन का जोखिम उठाने के लिए वो प्रतिबद्ध है."
एस्ट्राजेनेका के अलावा जॉनसन एंड जॉनसन, फाइज़र, मॉडर्ना और सनोफी भी वैक्सीन बानाने के काम में जुटी हैं. अमरीका स्थित इनोवियो फार्मासुटिकल्स ने बुधवार को कहा है कि उन्होंने चूहों और गिनी पिग पर कोरोना वैक्सीन का सफल परीक्षण किया है. कंपनी का कहना है कि उनके परीक्षण में चूहे और गिनी पिग के शरीर कोरोना से लड़ने के लिए ज़रूरी एंटीबॉडी बनाने में कामयाब रहे हैं.
इसी सप्ताह मॉडर्ना ने भी कोरोना वैक्सीन परीक्षण से जुड़ा डेटा जारी किया. कंपनी के अनुसार वॉलन्टियर के एक सीमित समूह में इस वैक्सीन का परीक्षण किया गया था जिसके नतीजे सकारात्मक रहे हैं.
वैक्सीन पाने के लिए होड़
एस्ट्राजेनेका के अलावा अमरीकी सरकार ने कोरोना वैक्सीन बनाने के काम में लगे जॉनसन एंड जॉनसन, मॉडर्ना और सनोफी के साथ भी क़रार किए हैं.
ऐसे में इस पर बहस छिड़ गई है कि क्या अमीर मुल्क अपने नागरिकों को पहले कोरोना से बचा सकेंगे जबकि ग़रीब मुल्कों को इसके लिए इंतज़ार करना पड़ेगा.
इससे पहले इसी साल मार्च में फ्रांसीसी कंपनी सनोफी के प्रमुख ने कहा था कि वैक्सीन के शोध में अमरीका आर्थिक तौर पर मदद कर रहा है इस कारण वैक्सीन सबसे पहले अमरीकी मरीज़ों को ही मिलनी चाहिए. इस बयान पर फ्रांसीसी सरकार की नाराज़गी झेलने के बाद कंपनी को ने कहा कि वो सुनिश्चित करेगी कि दुनिया के सभी देशों के पास वैक्सीन एक वक़्त पर पहुंचे.
एस्ट्राजेनेका के साथ हुए करार के बारे में व्हाइट हाउस में जानकारी देते हुए अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि "वैक्सीन बनाने को लेकर काफी कुछ हो रहा है. हो सकता है कि आने वाले एक दो सप्ताह में आपको इस बारे में कई और घोषणाएं सुनने को मिलेंगी."
गुरुवार को फोर्ड मोटर कंपनी के दौरे के दौरान ट्रंप ने ज़िक्र किया कि "वैक्सीन के 15 करोड़ से 20 रोड़ डोज़ जल्द से जल्द लोगों तक पहुंचाने के लिए अमरीकी सेना तैयार है."
भारत को भी मिलेगा वैक्सीन
एस्ट्राजेनेका ने कहा है कि वो वैक्सीन के लिए दुनिया के कई देशों की सरकारों और पार्टनरों के साथ बात कर रही है. भारत में वैक्सीन पहुंचाने के लिए वो सेरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के साथ चर्चा कर रही है.
दुनिया में सबसे अधिक संख्या में वैक्सीन बना सकने में सक्षम सेरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया, केवल ऑक्सफर्ड में बन रही वैक्सीन का उत्पादन बड़ी संख्या में करने के लिए एक फैक्ट्री पर काम कर रहा. यहां एक साल में 40 करोड़ तक वैक्सीन बनाई जा सकेगी.
कंपनी के चीफ़ एग्जेक्युटिव अदार पूनावाला ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा है कि "हम एस्ट्राजेनेका के साथ चर्चा कर रहे हैं और एक महीने में 40 लाख तक वैक्सीन बनाने की क्षमता पर काम कर रहे हैं."
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