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भारत-नेपाल सीमा विवाद के बीच कैसी होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा?
- Author, सुरेंद्र फुयाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, काठमांडू से
बहुत से लोगों के लिए ये सपनों और कल्पनाओं की जगह है. विस्तृत पठार और ऊबड़-खाबड़ मैदानों से तीर्थयात्रियों और प्रकृति प्रेमियों की नज़र जहाँ तक जाती है, उन्हें विशाल पर्वत शृंखला ही नज़र आती हैं.
इसके बीच का हिस्सा पथरीला और ग्रेनाइट जैसे गहरे भूरे रंग का और पर्वतों की चोटी मोटे सफ़ेद बर्फ़ से ढँकी हुई.
इसकी पिघलती हुई बर्फ़ ज़मीन पर एक विशाल झील में गिरती हुई. ये ख़ूबसूरती कोई बयां नहीं कर सकता.
साधु, संत, सम्मानित लामा, बौद्ध, हिंदू या जैनी...कोई भी नहीं. ये सभी लोग इसके अद्वितीय सांस्कृतिक और प्राकृतिक महत्व की वजह से सदियों से यहाँ जुटते आए हैं.
कैलाश मानसरोवर में आपका स्वागत है!
भारत, नेपाल, भूटान, चीन और तिब्बत में न जाने कितने श्रद्धालुओं के लिए ये शिव-पार्वती समेत कई देवी-देवताओं का घर है.
यही वजहें हैं कि कैलाश मानसरोवर यात्रा को ज़िंदगी में एक बार मिलने वाली तीर्थयात्रा माना जाता है. लेकिन यहां पहुंचने के लिए दोत-तीन हफ़्ते (निर्भर करता है कि आप कहां रहते हैं) का समय लगता है.
ये यात्रा हवाई जहाज़, जीप और पैदल चलकर पूरी होती है. इतने मुश्किल सफ़र के बाद लोग दुनिया के सबसे मुश्किल भौगोलिग क्षेत्र यानी हिमालय क्षेत्र में पहुंचते हैं.
अनिश्चितताएं और अड़चनें
उत्तराखंड-लिपुलेख रोड लिंक से इय यात्रा को ‘काफ़ी हद तक कम अवधि’ वाला बनाना नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकता थी. इस साल आठ मई को भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए इसके रोड-लिंक का उद्घाटन किया. लेकिन इस रास्ते में भी कई अनिश्चितताएं और अड़चनें हैं.
पहली बात तो ये कि इस साल कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. वजह है, दुनिया भर में कोविड-19 संक्रमण का प्रसार.
वायरस का शुरुआती केंद्र माने जाने वाले देश चीन के अधिकारियों ने यहाँ पहुंचने वाले हर अंतरराष्ट्रीय यात्री के लिए 14 दिनों तक मेडिकल क्वारंटीन में रहना अनिवार्य कर दिया है.
तिब्बत में भी ऐसे कुछ नियम लागू हैं. नेपाल, तिब्बत और चीन के ट्रैवेल एजेंटों और अधिकारियों का कहना है कि इन सबका असर जून, जुलाई और अगस्त महीने में कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर आने वाले लोगों पर पड़ेगा.
तिब्बती सरकार की निगरानी वाली वेबसाइट Tibet.cn के अनुसार चीन धीरे-धीरे सामान्य ज़िंदगी की ओर लौट रहा है. इस बीच सैलानियों को सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य वाली जगहों पर जाने के लिए कहा जा रहा है.
लेकिन इसके बावजूद दुनिया भर में कोविड-19 के बिगड़ते हालात को लेकर कई चिंताएं भी हैं.
मसलन, अरुणाचल प्रदेश के उत्तर में बसे पूर्वी तिब्बत के मशहूर न्यिंगची शहर में लोगों को पर्यटन स्थलों पर जाने से मना किया गया है. ल्हासा और न्गारी में ऐसे ही नियम लागू हैं. ये वही जगहें हैं जहां कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील है.
जुलाई-अगस्त तक क्या होगा, पता नहीं
Tibet.cn के अनुसार भले ही पठार पर संक्रमण काबू में होता प्रतीत हो रहा है, “तिब्बत ने चीन में कोविड-19 संक्रमण फैलेने के बाद से ही इमरजेंसी रेस्पॉन्स लागू किया है. तिब्बत ने ये चेतावनी भी दी है कि इलाक़े में ऑक्सीजन की कमी और सीमित मेडिकल संसाधनों की वजह से बीमारी ज़्यादा ख़तरनाक हो सकती है.”
ल्हासा में ‘एक्स्पोर तिब्बत’ नाम की ट्रैवेल एजेंसी चलाने वाले ट्रैवेल ऑपरेटर समदुप ने एक ईमेल में बताया कि अगस्त से पहले केरुंग पर नेपाल-चीन और तिब्बत सीमा और लिपुलेख के अन्य इलाक़ों के खुलने से काफ़ी उम्मीद है, लेकिन दूसरी तरफ़ पूरे तिब्बत में अनिश्चितता का माहौल भी लगातार बना हुआ है.
उन्होंने ईमेल में लिखा, “झांगमू (काठमांडू के उत्तर में कोदारी के पास) साल 2015 के भूकंप के बाद से अब तक बंद है. अगर आप ज़मीन के रास्ते से आना चाहते हैं तो कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए केरुंग से प्रवेश करना ही आपका एकमात्र विकल्प है. हालांकि महामारी की वजह से जुलाई के आख़िर तक किसी भी पर्यटक को तिब्बत में प्रवेश की अनुमति नहीं है.”
समदुप को उम्मीद है अगस्त तक स्थिति सामान्य हो जाएगी. अगर ऐसा हुआ तो दक्षिण एशिया के सैलानी कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर सकेंगे.
नेपाल में तिब्बत टूर के एक प्रमुख ऑपरेटर सनी ट्रैवेल्स के तेनज़िंग नोर्बू लामा कहते हैं कि तिब्बत चीन के घरेलू सैलानियों के लिए धीरे-धीरे खुला है और चीन को तिब्बत, नेपाल या भारत के रास्ते आने वाले दक्षिण एशियाइयों का स्वागत करने में अभी थोड़ा वक़्त लगेगा.
उन्होंने कहा, “हमारे तिब्बती साथी बता रहे हैं कि कैलाश मानसरोवर संभवत: अगस्त या सितंबर में खुलेगा. ये कोरोना वायरस संक्रमण की स्थिति पर निर्भर करेगा.”
इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए तीर्थयात्रियों और सैलानियों को चीन के टूरिस्ट वीज़ा के अलावा तिब्बत सरकार से एक ख़ास परमिट भी लेना होता है.
दिल्ली से उत्तर पूर्व में 750 किलोमीटर दूर स्थित लिपुलेख इस यात्रा के छह दिन कम करके इसे सबसे छोटा बना सकता है.
मुश्किलें और भी हैं...
लेकिन तेनज़िंग नोर्बू बताते हैं कि लिपुलेख पास को लेकर भी कई मुद्दे हैं. जैसे कि एक बार में यहाँ से गुज़रने वाले भारतीय यात्रियों की संख्या 1,000 से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए.
लिपुलेख के अलावा कुछ अन्य विकल्प हैं: नेपाल के सिमिकोट, कोरोला, केरुंग या कोदारी सीमा से लगे इलाक़े.
नेपाली ट्रैवेल एजेंटों के अनुसार यहां से गुज़रने वाले सैलानियों के लिए कोई तय सीमा निर्धारित नहीं की गई है.
पूर्वोत्तर या पूर्वी भारत से आने वाले लोगों के लिए तीसरा विकल्प सिक्किम के गंगटोक और नाथुला दर्रे से होकर आने का है.
तनेज़िंग नोर्बू कहते हैं कि नेपाल से होकर जाने पर भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए मानसरोवर यात्रा का ख़र्च डेढ़ लाख (जीप) से दो लाख (हेलिकॉप्टर) के बीच आता है.
तिब्बत के न्गारी प्रांत में बुरुंग शहर में, उत्तराखंड के उत्तर में और नेपाल के सुदूर पश्चिम प्रांत में स्थित कैलाश मानसरोवर क्षेत्र जून के सागा दावा त्योहार (हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले बौद्धों का त्योहार) और जुलाई के आख़िर में गुरु पूर्णिमा में खचाखच भरा रहता है.
अगर राजनाथ सिंह और भारतीय अधिकारियों को कामयाबी मिली तो लिपुलेख रोड लिंक अगले कुछ महीनों में दिल्ली से जीप यात्रा के लिए तैयार हो जाएगा.
दिल्ली से लिपुलेख की दूरी लगभग 800 किलोमीटर है. इसके बाद यात्रियों को पांच किलोमीटर तक पैदल चलकर तिब्बत पहुंचना होगा.
इच्छाशक्ति की परीक्षा लेती है ये यात्रा
लेकिन इसके लिए यात्रियों का स्वस्थ और फुर्तीला होना ज़रूरी है. उन्हें समुद्र तल से सिर्फ़ 200 किलोमीटर की ऊंचाई (दिल्ली) के बाद सीधे 1200 मीटर (काठमांडू) तक आने के लिए और ऊबड़-खाबड़ रास्ते से समुद्र तल से 5,200 मीटर की ऊंचाई तक (लिपुलेख) जाने वाली जीप में बैठने के लिए तैयार होना चाहिए.
इतने मुश्किल सफ़र के बाद उन्हें पैदल चलने के लिए भी तैयार होना चाहिए.
वहाँ हवा मैदानों जैसी नहीं होगी. कमज़ोर लोगों को ऑक्सीज़न सपोर्ट की ज़रूरत पड़ती ही है. कोविड-19 संक्रमण के दौर में और भी ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है क्योंकि तिब्बत के सुदूर इलाक़ों में पर्याप्त अस्पताल और मेडिकल सुविधाएं नहीं हैं.
लिपुलेख या नेपाल के सिमिकोट से होकर तिब्बत में प्रवेश के बाद यात्रियों को 150 किलोमीटर लंबी यात्रा और करनी होती है. इसके बाद जाकर ही श्रद्धालु कैलाश पर्वत (6638 मीटर ऊंचे) की परिक्रमा (43 किलोमीटर) शुरू कर सकते हैं.
कैलाश पर्वत के दक्षिण में मानसरोवर और दूसरी झीलें हैं जो एशिया की प्रमुख नदियों जैसे सिंधु, सतलज, घाघरा और ब्रह्मपुत्र का उदगम हैं.
मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के बावजूद कैलाश मानसरोवर की यात्रा अब भी एक सपने जैसी लगती है. ट्रैवल एजेंटों के मुताबिक़ इसके लिए और ज़्यादा ज़मानी कामों और सुधारों की ज़रूरत है.
इसके अलावा, लिपुलेख तक पहुंचना भी आसान नहीं होगा. यहाँ हिमालय की बड़ी चढ़ाई है, जो समुद्र तल से लगभग 5200 मीटर की ऊंचाई पर है.
भारत-नेपाल सीमा विवाद
दूसरी बाधा यात्रियों की व्यक्तिगत समस्या नहीं है लेकिन ये सरकारों की समस्या है.
लिपुलेख भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद का कारण रहा है. भारत सरकार के लिपुलेख प्रोजेक्ट का नेपाल ने कड़ा विरोध किया है.
नेपाल के लोग, नेता और आलोचक मोदी सरकार के गुंजी कालापानी इलाक़े से लिपुलेख रोड लिंक के हालिया और ‘एकपक्षीय’ उद्घाटन से नाख़ुश हैं.
पिछले 200 वर्षों से लिपुलेख से लेकर लिंपियाधुरा को अपना क्षेत्र मानता रहा है. इस हफ़्ते नेपाल की कैबिनेट ने एक नया राजनीतिक नक्शा भी जारी किया जिसमें लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को नेपाल की महाकाली नदी की पश्चिमी सीमा में दिखाया गया है.
नेपाल की केपी ओली सरकार ने ये क़दम भारतीय रक्षामंत्री के लिपुलेख रोड लिंक उद्घाटन के 10 दिनों बाद उठाया है.
इससे छह महीने पहले भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 निरस्त करने के बाद अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था. भारत ये दावा करता रहा है कि नेपाल से उसकी सीमा लिपुलेख के बाद शुरू होती है.
जहाँ तक मानसरोवर यात्रा का सवाल है, महाकाली नदी के दोनों ओर ट्रेकिंग का रास्ता है. दोनो रास्ते काफ़ी पुराने हैं और हिमालय के सबसे कठिन इलाकों से होकर जाते हैं.
तिब्बत से होकर मानसरोवर पहुंचने तक ये रास्ते यात्रियों की शारीरिक ताकत और मानसिक इच्छाशक्ति की परीक्षा लेते हैं.
भारत की इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस 1960 के भारत-चीन युद्ध से पहले से ही यहां कालापानी क्षेत्र में मौजूद है और इस इलाके की रक्षा में लगी है.
नेपाल भी यहां पास के गाँवों में कुछ पुलिस बलों की तैनाती कर चुका है. मई के मध्य में इसने छंगरू गांव में अपने सशस्त्र पुलिसबलों को अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए तैनात किया था.
दोनों देशों के सुरक्षाबल यात्रियों के साथ हमेशा विनम्रता और गर्मजोशी से पेश आए हैं.
लिपुलेख क्षेत्र का एक और महत्व है. यह विवाद पर्वत अपी नंपा संरक्षण क्षेत्र में है जो पश्चिमी नेपाल में स्थित आपी पर्वत, नंपा पर्वत और व्यास के चारों ओर के इकोसिस्टम की सुरक्षा करता है.
ये सभी पर्वत चोटियां इस इलाक़े का सौंदर्य और बढ़ा देती हैं.
ये रास्ते तीर्थयात्रियों को धारचुला से आगे लिपुलेख दर्रे और उस जगह तक ले जाते हैं जहां देवी-देवाताओं का निवास माना जाता है: कैलास मानसरोवर.
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