You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
अफ़ग़ानिस्तान: हमले में अनाथ हुए बच्चों को दूध पिलाने वाली महिला
- Author, इनायतुलहक़ यासिनी
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल के एक मैटरनिटी वॉर्ड में मंगलवार को हुए बम धमाके और गोलीबारी में 24 लोग मारे गए हैं. मरने वालों में नवजात बच्चे हैं, माएं हैं और नर्सें हैं.
फ़िरूज़ा उमर कहती हैं, "मैं अपने बच्चे को ब्रेस्टफीड करा रही थी तभी मैं दूसरे बच्चों के बारे में सोचकर भावुक हो गई. मैं दूसरे बच्चों की तक़लीफ़ देखकर परेशान थी."
बीते मंगलवार अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल के एक मैटरनिटी हॉस्पिटल पर चरमपंथियों ने हमला किया था. इस हमले में नवजात बच्चे, मांएं और नर्सों समेत 24 लोगों की जान चली गई.
27 साल की फ़िरूज़ा ने टीवी पर इस हमले के बारे में सुना. अपने दोस्तों के ज़रिए और सोशल मीडिया पर आ रही विचलित करने वाली तस्वीरों के ज़रिए उन्हें हालात की गंभीरता का अंदाज़ा हुआ.
वह ख़ुद भी एक चार महीने के बेटे की मां हैं.
जब वह बच्चे को अपना दूध पिला रही थीं, तब उनका मन उन बच्चों की फ़िक्र से भर गया जो जन्म के तुरंत बाद ही अनाथ हो गए थे.
सहानुभूति और साहस
उन्होंने ऐसे बच्चों की मदद करने का फ़ैसला कर लिया. इसके बाद उन्होंने जो किया वह सहानुभूति और निश्चित तौर पर बड़े साहस की बात है.
वह बताती हैं, "जब दिन का रोज़ा तोड़ने का वक़्त नज़दीक आया तो मैंने ऐसे अनाथ हुए बच्चों की मदद करने की मंशा अपने पति से ज़ाहिर की. यह हमला इस्लाम में पवित्र माने जाने वाले रमज़ान के दौरान हुआ था. मेरे पति ने अनाथ बच्चों की मदद करने की मेरी ख्वाहिश पर तुरंत ही अपनी रजामंदी दे दी."
उनके पति ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह घर पर बच्चे की देखभाल कर लेंगे.
तब तक अफ़ग़ान स्पेशल फोर्सेज ने दश्त-ए-बारची हॉस्पिटल से 100 से ज्यादा महिलाओं और बच्चों को बचाकर निकाल लिया था. इनमें से कई नवजात बच्चों को अतातुर्क चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल भेज दिया गया. यह अस्पताल फ़िरूज़ा के घर से क़रीब दो किमी दूर है.
रोते हुए बच्चे
फ़िरूज़ा के लिए कार से तय की जाने वाली दूरी भले ही कम है, लेकिन यह जोख़िमभरा है. ख़ासतौर पर एक ऐसे शहर में ट्रैवल करना जो इस भयंकर हमले के बाद बुरी तरह से हिल गया था और डरा हुआ था.
फ़िरूज़ा बताती हैं, "जब मैं अस्पताल पहुंची तो मैंने क़रीब 20 बच्चे देखे. इनमें से कुछ घायल थे. मैंने नर्सों से बात की. उन्होंने मुझे ऐसे बच्चों को दूध पिलाने के लिए कहा जो बहुत बुरी तरह से रो रहे थे."
इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक चार बच्चों को अपना दूध पिलाया.
फ़िरूज़ा के आने के पहले नर्सें मिल्क पाउडर से बनाया हुआ दूध इन बच्चों को पिलाने की कोशिश कर रही थीं.
फ़िरूज़ा बताती हैं, "हाल के पैदा हुए कुछ बच्चे बिलकुल भी वह दूध नहीं पीना चाहते थे."
शांति का अहसास
उन्होंने उन बच्चों को एक तरह से नई जिंदगी दी थी.
फ़िरूज़ा बताती हैं, "जब मैंने उन बच्चों को अपना दूध पिलाया तो इससे मुझे बेहद शांति मिली. मैं खुश थी कि मैं उनकी मदद कर पाई."
घर लौटने के बाद अब दूध पीने की बारी उनके बच्चे की थी.
फ़िरूज़ा बताती हैं, "करीब दो घंटे बाद मैंने अपने बच्चे को ब्रेस्टफीड कराया था."
उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना यह अनुभव साझा किया है. साथ ही उन्होंने दूसरी माओं से भी अनुरोध किया है कि वे भी हॉस्पिटल जाकर इन रोते हुए बच्चों की मदद करें.
वह कहती हैं कि कुछ महिलाएं आगे आई हैं और इन बच्चों को ब्रेस्टफीड करा रही हैं.
हमले वाली रात के बाद फ़िरूज़ा अगले दो दिन बुधवार और गुरुवार को अस्पताल गईं. वह कहती हैं कि ऐसा इस वजह से मुमकिन हो पाया क्योंकि उन्हें उनके पति ने पूरा सपोर्ट दिया और ऐसा करने के लिए उत्साहित किया.
"युद्ध अपराध है यह हमला"
मंगलवार को मैटरनिटी हॉस्पिटल पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी किसी ने भी नहीं ली है. ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस हमले को "युद्ध अपराध" करार दिया है.
काबुल सरकार ने सेना को इस हमले के गुनाहगारों को ढूंढ निकालने के आदेश दिए हैं.
पिछले चार दशकों से चले आ रहे युद्ध और संघर्ष के चलते काबुल ने काफी हिंसा देखी है.
इसके बावजूद इस हफ्ते मैटरनिटी हॉस्पिटल पर हमला कर महिलाओं और नवजात बच्चों की हत्या की यह घटना हाल के इतिहास के सबसे बुरे हमलों में गिनी जाएगी.
फ़िरूज़ा कहती हैं कि ऐसा लगता है कि उनके शहर में हिंसा का यह दौर कभी खत्म नहीं होगा. वह कहती हैं कि वह इससे बेहद परेशान हैं.
वह बताती हैं, "जब इन बच्चों को अपनी मांओं की गोद में होना चाहिए था, तब वे अस्पताल में हैं और अजनबी उन्हें दूध पिला रहे हैं."
एक प्रशिक्षित मनोचिकित्सक के तौर पर फ़िरूज़ा समाज के लिए एक सक्रिय भूमिका निभाना चाहती हैं. वह युद्ध और संघर्ष के ज़ख्म झेलने वाले तमाम अफ़ग़ान परिवारों के गहरे जख्मों और दर्द को कम करना चाहती हैं.
एक बच्चे को पालना खुशी की बात
उनके कई दोस्त उनसे फंड जुटाने के लिए बोल चुके हैं ताकि नैपीज और मिल्क पाउडर ख़रीदा जा सके. उनका कहना है कि यह ऐसे बच्चों के काम आएगा जिन्हें ब्रेस्टफीड नहीं कराया जा सकता.
वह कहती हैं कि घायल बच्चों के अलावा बाकी बच्चों को अतातुर्क चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया है.
लेकिन, वह ऐसे बच्चों को लेकर चिंतित हैं जिनके पास कोई परिवार नहीं है.
वह कहती हैं, "मेरी प्राथमिकता अनाथ बच्चों को लेकर है."
फ़िरूज़ा कहती हैं, "मैं अपने बेटे के साथ ही एक और बच्चे की जिम्मेदारी उठाना अपनी खुशकिस्मती समझूंगी."
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना महामारीः क्या है रोगियों में दिख रहे रैशेज़ का रहस्य
- कोरोना वायरसः वो शहर जिसने दुनिया को क्वारंटीन का रास्ता दिखाया
- कोरोना वायरस से संक्रमण की जांच इतनी मुश्किल क्यों है?
- कोरोना वायरस वैक्सीन: दुनिया भर की नज़र आख़िर भारत पर क्यों?
- कोरोना संकट: गूगल, फ़ेसबुक, ऐपल और एमेज़ॉन का धंधा कैसे चमका
- कोरोना वायरसः वो छह वैक्सीन जो दुनिया को कोविड-19 से बचा सकती हैं
- कोरोना वैक्सीन: दुनिया के टॉप नेताओं की अनोखी और मज़बूत पहल
- कोरोना वायरस महिलाओं और पुरुषों में भेद क्यों करता है
- कोरोना वायरस: संक्रमण से बचने के लिए इन बातों को गाँठ बांध लीजिए
- कोरोना वायरस: सरकार का आरोग्य सेतु ऐप कितना सुरक्षित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)