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पुराने तरीके नए चुनौतियां: मिलिए असली ईको वॉरियर्स से
- Author, एलिने जंग
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
स्वदेशी लोग दुनिया की आबादी का पांच फ़ीसदी से कम हिस्सा ही इस्तेमाल करते हैं लेकिन वो धरती की 80 फ़ीसदी जैव विविधता का समर्थन या उसकी रक्षा करते हैं.
जलवायु परिवर्तन के बारे में उनका ज्ञान भले की सीमित हो लेकिन हज़ारों सालों से भूमि प्रबंधन, स्थिरता, जलवायु अनुकूलन के आधार पर ज्ञान प्रणालियों का निर्माण करते रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय की डॉ. कोको वार्नर का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने में उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण है.
वो कहती हैं, ''मैं वाकई भविष्य में ऐसे परिदृश्य की उम्मीद कर रही हूं, जहां हमारे वैल्यू सिस्टम को एक साथ मिलाकर और बढ़ाकर, मनुष्य नई प्रथाओं का विकास करेगा जो प्रकृति में एक सकारात्मक शक्ति हो सकती है."
हम इतिहास में दबी क्लाइमेट पायनिर्स की पांच कहानियां आपके सामने ला रहे हैं-
सहेल: सूखी धरती पर हरियाली की मुहिम
अफ्रीका के सहेल में खेती के पुराने तौर तरीके अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में दोबारा ज़िंदगी लौटा रहे हैं.
1980 के दशक में बुर्किना फासो में ज़ाई की पारंपरिक प्रथा को पुनर्जीवित किया गया था.
बारिश का मौसम शुरू होने से पहले ज़मीन पर छोटे गड्ढे खोदकर उनमें कंपोस्ट, दूसरे खाद और बीज डाले जाते हैं.
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से यहां बारिश लगातार कम हो रही है इसलिए यह तरकीब पानी रोकती है और साथ ही मिट्टी की उत्पादन क्षमता को बढ़ाती है और खाने की असुरक्षा दूर करने में थोड़ी राहत देती है.
निगेर, माली, सेनेगल और चाड में यह पारंपरिक तरीका अपनाया जाता है.
चाड में रहने वाली म्बोरो ग्रामीण समुदाय की एक स्थानीय महिला हिंडौ ओमरौ इब्राहिम कहती हैं कि ज़ाई को स्थानीय रूप से कराल या बुरिए कहा जाता है.
ग्रामीणों ने खेती के लिए कुछ ऐतिहासिक तरीके विकसित किए हैं जिनमें इलाके का इतिहास, लोकेशन, स्थिति समेत सात कारण शामिल हैं.
मूंगफली, भिंडी, सेम, मक्का और हाल ही में तरबूज जैसी फसलों के रोपण के समय में खगोलीय और मौसम संबंधी जानकारियां एक बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.
इब्राहिम कहती हैं, "हमारे लोग सदियों से जीवित हैं. हम पहले से ही एक प्रमाण हैं कि यह तरकीब काम करती है."
ऑस्ट्रेलिया: आग से आग का मुकाबला
ऑस्ट्रेलिया में सैकड़ों सालों से आदिवासी लोग ज़मीन को स्वस्थ रखने, जैव विविधता में सुधार लाने, भोजन पैदा करने और वन्यजीवों के प्रसार को रोकने के लिए ज़मीन पर आग लगाते रहे हैं.
स्वदेशी फायर प्रैक्टिशनर विक्टर स्टीफ़ेंसन बीते दो दशकों से लोगों को 'कल्चरल बर्निंग' सिखा रहे हैं.
उन्होंने साल 2018 में ही इस बात का अनुमान लगा लिया था कि देश में जंगलों में भीषण आग लगेगी.
उन्होंने कहा, ''यह बड़ी जागरूकता की चेतावनी थी. जलवायु परिवर्तन की वजह से ज़मीन का सही ढंग से प्रबंधन नहीं हो रहा था. इस प्रबंधन में आग बड़ी भूमिका निभाती है.''
ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में बीते साल लगी आग में करीब 44 लोगों की मौत हुई, करीब एक अरब जानवर ख़त्म हो गए और कम से कम 3000 घर तबाह हुए.
आग जलाने के स्वदेशी तरीके ऑस्ट्रेलिया ईकोसिस्टम से अलग हैं. यह एक नाजुक और गिनती की गई प्रक्रिया है.
जब वातावरण, मौसम और मौसम के साथ स्थिति 'सही' हो, तो आग को वक़्त पर नियंत्रित किया जाता है.
आग जलाने के आकार और तीव्रता में कम रखा जाता है ताकि जानवरों को भागने और जंगली ठिकानों को बचाने के लिए समय मिल सके.
यह प्रक्रिया ज़मीनी सतह की कूड़े की परत और झाड़ियों को भी साफ करती है ताकि प्राकृतिक आग को रोकने में मदद मिल सके.
वो कहते हैं, "यह एक ऐसा विज्ञान है जो हजारों वर्षों में विकसित की गई जानकारी पर आधारित है."
ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के बाद से, स्वदेशी तकनीकों को शामिल करने के लिए पश्चिमी एजेंसियां दिलचस्पी ले रही हैं.
स्टीफ़ेंसन इस प्रतिक्रिया का स्वागत करते हैं लेकिन वो अधिक से अधिक सहयोग की बाद भी कहते हैं.
उन्होंने कहा, "यह एक निर्णायक प्रक्रिया होनी चाहिए जहां एजेंसियां स्वदेशी समुदायों का शोषण न करें."
एंडीज: दीवारों पर खेती
पेरू में माचू पिचू का पुरातात्विक स्थल, छत की खेती का एक बेहतरीन उदाहरण है. वहां, राजघराने के सदस्य (इंकास) ने पत्थरों की उन दीवारों के बीच फसलों को उगाया जो कि एंडीज पहाड़ों की ठंडी और ऊंची धरती पर थी.
पुरानी तकनीक के जरिए विपरीत परिस्थितियों में ढलान पर खाद्यान्न का उत्पादन किया गया.
इसमें उर्वरक के रूप में लामा और ऊंट के गोबर का इस्तेमाल कर फल, मेवे, सब्जियां और मसालों की किस्मों की पैदावार की गई.
पेरुवियन एंडीज़ में एक लाख हेक्टेयर में फैले हुए ऐसे कई क्षेत्र अब भी मौजूद हैं लेकिन उनकी स्थिति खराब है.
स्वदेशी क्वेशुआ समुदाय के 28 वर्षीय किसान विल्सन कासा कहते हैं, "हमने उनकी उपेक्षा की."
कासा, पाल्का के दक्षिणी ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं.
उन्होंने पिछले साल अपने इलाके में कुछ परित्यक्त इलाकों को बहाल करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किया.
जलवायु परिवर्तन की वजह से भू-स्खलन से ऐसी जमीन बढ़ी है और यहां पानी का इस्तेमाल कम हो जाता है और इसके जरिए मिट्टी के कटाव को भी रोका जा सकता है.
पत्थर की दीवारें दिन के दौरान सूरज की गर्मी को अवशोषित करती हैं और रात में जब तापमान गिरता है तो मिट्टी में छोड़ती हैं.
अमेज़न: बेहतरीन ग्रीन गार्डन
अमेज़न के गहरे वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक वर्षावन में समृद्ध पारिस्थितिकी (ईकोलॉजी) बड़े पैमाने पर स्वदेशी कृषि की सदियों से चली आ रही रीति की देन है.
यहां लगभग 400 जातीय समूहों के साथ-साथ स्वदेशी लोगों में विविधता-उतनी ही समृद्ध है, जितने वे खाद्य पदार्थ पैदा करते हैं.
यहां एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बगीचे अलग होते हैं. यहां सैकड़ों खाद्य प्रजातियां उगती हैं.
जब ये बागान परिपक्व होते हैं तो उन्हें फिर से जंगल के रूप में तब्दील होने के लिए छोड़ दिया जाता है.
ब्राजील के पूर्वी अमेज़न में कायापो समुदाय के एक नेता बेडजाई टक्सुकर्माए निश्चित रूप से हरियाली के दूत की तरह हैं.
वो कहते हैं, "अपना खुद का खाना उगाना शहर में इसे खरीदने से कहीं बेहतर है. यही कारण है कि मेरा स्वास्थ्य इतना अच्छा है और मैं बूढ़ा होने के बावजूद इतना मजबूत महसूस करता हूं."
उनका समुदाय 56 प्रकार के शकरकंद, 46 प्रकार के कसावा, 40 प्रकार के यम और 13 प्रकार के मक्का उगाता है.
फसलों की इतनी किस्में कई सदियों की मेहनत और खेती का परिणाम हैं. वे लोग अपने जीन बैंक में सुधार के लिए दूसरे गांवों के साथ बीजों की अदला-बदली करते हैं.
कयापो ने पर्यावरण को तबाही से बचाने के लिए आधुनिक वैज्ञानिकों के बीज बैंक बनाने के सुझाव से बहुत पहले इन प्रथाओं का विकास किया है.
बेडजाई टक्सुकर्माए का मानना है कि अगर उनके क्षेत्र में मौसम गर्म और सूखा होता है, जैसा कि वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है तब भी उनकी फसलों की कई किस्में जीवित रहेंगी और कुछ को वाकई काफ़ी लाभ होगा.
आर्कटिक जलवायु परिवर्तन के लिए बेहद कमज़ोर है क्योंकि धरती के अधिकांश हिस्सों की तुलना में यहां तापमान तेजी से बढ़ रहा है.
इस वजह से अमरीका, कनाडा, रूस, फिनलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और ग्रीनलैंड में रहने वाले 40 से अधिक स्वदेशी समूहों की संस्कृति और आजीविका प्रभावित हो रही है.
डॉ. टेरो मस्टोनन एक जलवायु वैज्ञानिक और नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन स्नोवेकेंज के निदेशक हैं, जो पश्चिमी तरीकों को स्वदेशी तरीकों के साथ मिलाकर जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं पर काम करते हैं.
स्नोकचेंज ने हाल ही में एक व्यापक बहाली परियोजना का समर्थन किया, जिसका नेतृत्व स्कॉल्ट सामी पॉलिना फोडोरॉफ ने नातामो वाटरशेड फ़िनलैंड में किया.
एक दशक से अधिक समय से उनके स्वदेशी समुदाय ने पानी में लगातार बढ़ रही गरमाहट को महसूस किया है जिसके कारण मछलियों की आबादी में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं.
और जलवायु परिवर्तन ने पानी की दिशा को भी बदल दिया था.
दो स्थानीय सामी बुज़ुर्गों को उनकी याद्दाश्त और तजुर्बे के आधार वायनोसयोकी नदी के असल फ़ैलाव और आकार को चिन्हित करने का काम दिया गया था.
उनकी जानकारी के आधार पर ही एक विस्तृत मानचित्र बनाया गया और पुरानी चट्टानों और पत्थरों को वापस उनकी जगह पर लाया गया.
पॉलिना फ़ोडोरॉफ़ बताती हैं कि "मछली पालने वाले दोबारा उन्हीं जगहों पर आ गए हैं जहाँ वो हुआ करते थे. पत्थरों को उनकी पुरानी जगहों पर लाने से यह फ़ायदा हुआ है कि इनकी पुरानी खोयी नर्सरियाँ फिर से चालू हो गई हैं."
इस समुदाय ने देखा है कि स्थितियाँ पहले जैसी होते ही ट्राउट और ग्रेलिंग जैसी ठंडे पानी में होने वाली मछलियाँ दोबारा इन जगहों पर लौटने लगी हैं.
डॉक्टर टेरो मुस्तोनेन कहते हैं कि 'ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से लड़ने और उसे कम करने के लिए हमें स्थानीय समुदायों की जानकारियों से सबक लेते रहने की ज़रूरत है. हम उन्हें अनसुना नहीं कर सकते.'
स्टीफ़ानिया गोज़्ज़र और जोआओ फेलेट की एडिशनल रिपोर्टिंग, इलेस्ट्रेशन एलिने जंग के साथ.
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