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न्यूयॉर्कः यहां मरने के बाद भी मुश्किलें कम नहीं
- Author, सलीम रिज़वी
- पदनाम, न्यू यॉर्क से, बीबीसी हिंदी के लिए
अमरीका में न्यूयॉर्क में कोरोना वायरस के सबसे ज़्यादा मरीज़ हैं जिनकी कुल संख्या क़रीब एक लाख नब्बे हज़ार है. इनमें से पिछले एक दिन में क़रीब आठ हज़ार तीन सौ नए मामले पॉज़िटिव पाए गए हैं.
लेकिन अधिकारियों के मुताबिक़ पिछले कुछ दिनों में नए मरीज़ों की दर में कमी आई है. इसी तरह अस्पताल में भर्ती होने वाले नए मरीज़ों की दर में भी कमी देखी जा रही है. आम लोगों द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग अपनाए जाने को इसका श्रेय दिया जा रहा है.
लेकिन पिछले कई हफ़्तों की तरह अब भी न्यूयॉर्क में रोज़ाना कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या 700-800 के बीच है. अस्पतालों में लाशों के ढेर लगे हुए हैं. बर्फ़वाली ट्रकों में लाशें रखी जा रही हैं.
कुछ दिन इंतज़ार किया जा रहा है कि परिजन आकर लाशे ले जाएं. अगर परिजन नहीं आते हैं तो क़रीब छह सात दिन बाद हार्ट आइलैंड टापू पर अस्थायी तौर पर क़ब्रों में लाशों को दफ़ना दिया जाता है. प्रशासन ने यहां लाशों को अस्थायी क़ब्रों में दफ़नाने का इंतज़ाम किया है.
शहर प्रशासन ने लाश रखने वाली ढाई सौ ख़ास ट्रकों को शहर में अलग-अलग जगह अस्पतालों के बाहर खड़ा किया है. जो लोग लाशों के क़रीब जाते हैं उन्हें पूरी तरह गाउन और मास्क पहनने के लिए कहा जाता है.
क़ब्रिस्तानों और अंतिम संस्कार स्थलों में लोगों को कई दिन के इंतज़ार के बाद अपनों की अंत्योष्टि करने का मौक़ा मिल पा रहा है. क़ब्रिस्तानों में एक परिवार के कुछ ही लोगों को एक समय में अंत्योष्टि में शामिल होने की इजाज़त दी जा रही है.
कुछ क़ब्रिस्तानों में एक साथ ही दर्जनों लाशों को अंत्योष्टि के लिए लाया जा रहा है. न्यूयॉर्क शहर प्रशासन ने अंतिम संस्कार स्थलों को तीस जून तक चौबीस घंटे खुले रहने के लिए कहा है.
शहर के बड़े अंतिम संस्कार स्थलों में जितनी लाशें पूरे महीने में आती थीं उतनी लाशें अब कोरोना वायरस की वजह से दो-तीन दिनों में ही आ जाती हैं. पिछले कुछ हफ़्तों से ऐसा हो रहा है.
मुसलमानों की ओर से संचालित कई इस्लामिक सेंटरों में लाशों को अंतिम स्नान कराने में भी दिक़्क़तें आ रही हैं.
भारतीय मूल के लोग भी बड़ी संख्या में न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी में रहते हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ अब तक सत्तर से अधिक भारतीय की कोरोना वायरस की वजह से मौत हो चुकी है. इनमें कई बुज़ुर्ग भी हैं.
कुछ भारतीय मूल के लोग क्वारंटीन में भी हैं और कुछ क्वारंटीन का समय बिताने के बाद बेहतर महसूस कर रहे हैं. जो लोग पैसा ख़र्च कर सकते हैं वो अकेले रहने के लिए होटलों में चले गए हैं क्योंकि घर में क्वारंटीन करना उनके लिए मुश्किल हो गया है. कई लोगों के लिए घरों में परिजनों के साथ रहना और क्वारंटीन में रहना मुश्किल हो जाता है.
आम लोगों से प्रशासन ने कहा है कि घर से बाहर मास्क लगाकर या मुंह ढककर ही निकलें. लोगों से एक दूसरे से हर समय छह फुट की दूरी बनाए रखने के लिए भी कहा गया है. सिर्फ़ ज़रूरी सेवाओं से जुड़े लोगों को ही काम पर जाने के लिए कहा है. ग्रॉसरी और खाने की दुकानें खुली हैं.
इसके अलावा स्वास्थ्य सेवाएं और फ्रामेसी भी खुली हैं. अधिकतर परिवारों के लोग ग्रॉसरी की शॉपिंग करने कम ही निकल रहे हैं. जो लोग ख़रीददारी करके ला रहे हैं वो सामान को घर के बाहर ही एक-दो दिन छोड़ दे रहे हैं ताकि वायरस अगर हो तो मर जाए.
बच्चों की ऑनलाइन क्लॉस चल रही हैं. यूनिवर्सिटी के स्तर पर भी क्लास ऑनलाइन चलाई जा रही हैं. लेकिन अभी सब लोगों को इंतज़ार इस बात का है कि क्या मई के महीनें में हालात दफ़्तर व्यापार और स्कूल आदी खोलने लायक़ हो सकेंगे.
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