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क्या कोरोना से मिल रही है दुनिया भर के तानाशाहों को शह?
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले कुछ दिनों में क़रीब दुनिया के एक तिहाई लोगों को कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन में रख दिया गया है.
जहाँ कई देशों के सैनिक शहरों के बीचों-बीच सैनिक वाहनों की आवाजाही नियंत्रित कर रहे हैं, वहीं पुलिस के वाहन भी मेगाफ़ोन से भीड़ भरे इलाक़ों से लोगों को तितर-बितर होने की अपील जारी कर रहे हैं.
कई देशों में सार्वजनिक ऐलान करने के लिए ड्रोन तक का सहारा लिया जा रहा है. बढ़ती हुई मृत्यु दर और तेज़ी से फैलती हुई बीमारी ने दुनिया की बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं को भी हैरान कर दिया है.
कई देशों में नाटकीय घोषणाएं कर इस बीमारी को काबू में करने की कोशिश की जा रही है.
लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि हो सकता है कि इससे इस बीमारी के नियंत्रण में कुछ मदद मिले, लेकिन ये भी तय है कि जब इस वायरस पर नियंत्रण हो जाएगा तो कुछ देश उतने प्रजाताँत्रिक नहीं रहेंगे जो वो मार्च 2020 से पहले हुआ करते थे.
आशंका व्यक्त की जा रही है कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए उठाए गए अस्थायी क़दम कहीं स्थायी न बन जाएं.
ख़तरे को कम आँकने की कोशिश
शुरू में दुनिया के कुछ नेता इस महामारी के लिए तैयार नहीं थे.
ऑस्ट्रिया के ग्राज़ विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर फ़्लोरियन बाइबेर का मानना है विज्ञान और दक्षता के प्रति तिरस्कार ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, मैक्सिको के राष्ट्रपति आँद्रे ओबराडोर और ब्राज़ील के राष्ट्रपति जाएर बोलसानारो की सरकारों को असंवेदनशील सरकारों की श्रेणी में रख दिया है.
इससे पहले कि इस बीमारी से उपजे संकट की अनदेखी करना मुश्किल हो गया, इन देशों की प्रोपागंडा मशीनों और सरकार समर्थक मीडिया ने कोरोना वायरस से पैदा होने वाले ख़तरों को अपनी तरफ़ से 'डाउनप्ले' करने की कोशिश की.
उदाहरण के लिए अमरीका में फॉक्स न्यूज़ ने इस ख़तरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए डेमोक्रेट्स को आड़े हाथों लिया.
सर्बिया और तुर्की में सरकार समर्थक मीडिया ने पंडितों और तथाकथित विशेषज्ञों की उन आवाज़ों को बहुत जगह दी जिसमें दावा किया गया था कि हमारे देश में रहने वाले लोग आनुवांशिक रूप से इस तरह के संक्रमण का सामना करने के लिए सक्षम हैं.
इस तरह की महामारियों से तानाशाह नेताओं की ताक़त कमज़ोर होती है, क्योंकि इसके लिए उनकी किसी को बलि का बकरा बनाने की प्रवृत्ति लोगों के गले नहीं उतरती.
लेकिन अगर इन नेताओं के कदमों की वैधता को चुनौती दी जाती है तो वो कड़े क़दमों को दोगुना कर देते हैं और आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल अपनी ताक़त को और मज़बूत करने में लगाते हैं.
मानवाधिकारों पर पाबंदी
कोरोना वायरस के आने से कहीं पहले दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र की जड़ें कम हो रही थीं. प्रजाताँत्रिक मूल्यों के लिए काम करने वाली संस्था फ़्रीडम हाउस की बात मानी जाए तो पिछले साल 64 देशों में लोकताँत्रिक मूल्य पहले की तुलना में कम हुए हैं.
जब दुनिया के बहुत से देश इस महामारी से निपटने के लिए असाधारण क़दम उठा रहे हैं, तानाशाह और प्रजाताँत्रिक दोनों तरह के देशों में मानवाधिकारों को बड़े स्तर पर संकुचित किया जा रहा है.
कई यूरोपीय देशों ने जिसमें सर्बिया के राष्ट्रपति एलेकज़ादर वूसिच भी शामिल हैं, ने चीन के वायरस से निपटने के दमनकारी क़दमों की तारीफ़ की है.
अमरीका और ईरान
एक स्थान पर जमा होने की आज़ादी पर दुनिया के क़रीब क़रीब हर देश में प्रतिबंध लगाए गए हैं. लेकिन यही एक अकेला अधिकार नहीं है जिस पर रोक लग रही है.
कई देशों में चुनावों को टाला जा रहा है.
अमरीका में कम से कम 12 राज्यों में डेमोक्रेटिक प्राइमरीज़ के चुनावों को टाल दिया गया है.
यही नहीं अमरीका सीमा नियंत्रण को और मज़बूत करने की मुहिम में जुट गया है जो उसकी कार्यसूची में बहुत पहले से था.
शिकागो की मेयर लोरी लाइटफ़ुट ने लिखा है कि शहर के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर लोगों के आठ घंटे तक लंबे इंतज़ार को किसी भी हालत में सही नहीं ठहराया जा सकता. बिना किसी योजना के लागू किए गए यात्रा प्रतिबंध ने लोगों के स्वास्थ्य को और अधिक जोखिम में डाल दिया है.
उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप और कस्टम एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन सर्विस की आलोचना करते हुए कहा है कि किसी के पास आपकी अक्षमता के लिए समय नहीं है. ईरान की सरकार ने जो पहले से ही अपने नागरिकों के जीवन को नियंत्रित करने पर तुली हुई थी, इस बीमारी का बहाना लेकर देश के हर हिस्से में अपने सुरक्षा बल भेज दिए हैं.
सरकार विरोधी प्रदर्शन रोके गए
कोरोना के चलते सर्बिया और उत्तरी मेसीडोनिया में अप्रैल में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव टाल दिए गए हैं.
इराक़, अल्जीरिया और लेबनान में कई महीनों से चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन स्थगित कर दिए गए हैं.
ब्रिटेन में भी मई में होने वाले स्थानीय निकाय के चुनाव को स्थगित कर दिया गया है. आज के वातावरण में वैसे भी चुनाव कराना न सिर्फ़ कठिन है बल्कि ख़तरनाक भी है. इस बात के काफ़ी पुख़्ता संकेत हैं कि फ़्राँस में 15 मार्च को हुए शहरी निकायों के चुनाव ने कोरोना वायरस के फैलने में बड़ी भूमिका निभाई है.
राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि कई महीनों तक चुनाव को टालने से न सिर्फ़ सरकारों की वैधता पर सवाल उठाए जाने लगेंगे, बल्कि कई तानाशाह इसका इस्तेमाल अपनी ताक़त को बढ़ाने में करेंगे और उस समय चुनाव कराएंगे जब इससे उनको फ़ायदा हो.
इसका एक दूसरा पक्ष भी है. हालांकि अधिकतर पोलैंड वासी चाहते हैं कि मई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव टाल दिए जाएं लेकिन वहाँ की सरकार चाहती है कि चुनाव तय समय पर ही हों क्योंकि इससे वर्तमान राष्ट्रपति आँद्रज़ेज डूडा की सत्ताधारी लॉ एंड जस्टिस पार्टी को राजनीतिक फ़ायदा हो सकता है.
अक्सर देखा गया है कि आपात स्थिति में सत्ताधारी पार्टी को चुनाव प्रचार में फ़ायदा होता है और विपक्षी पार्टी की मुश्किलें बढ़ जाती हैं.
विपक्ष को नीचा दिखाने की कोशिश
फ़्राँस के राष्ट्रपति इमानुएल मेक्रों के इस ऐलान से कि हमने इस वायरस के ख़िलाफ लड़ाई छेड़ दी है, बेशक आम नागरिक कई तरह के त्याग करने के लिए प्रेरित हुए हैं, लेकिन दीर्घकाल में इस तरह की अपील ख़तरनाक भी साबित हो सकती है.
वायरस कोई सेना नहीं है और इसके ख़िलाफ़ युद्ध का आह्वान स्वास्थ्य संकट को रक्षा संकट में बदल सकता है जिसमें लोगों को दबाए जाने वाले क़दम सही ठहराए जा सकते हैं.
व्यापार को बंद करना, सामाजिक दूरी को लागू करने पर ज़ोर देना, लोगों को सड़क से दूर रखने और उनके जमा होने पर रोक और कर्फ़्यू लगाने जैसे क़दम इस बीमारी को रोकने के लिए बेशक ज़रूरी कदम हैं लेकिन इस बात के भी गंभीर ख़तरें हैं कि इससे तानाशाही की नई लहर को भी बढ़ावा मिल सकता है.
अज़रबैजान में राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने देश के नाम संदेश में विपक्ष को 'ख़तरनाक देश द्रोही' की संज्ञा दी है और कहा है कि इस बीमारी के दौरान देश में नए तरह के क़ानून लागू किए जाएंगे. ये भी हो सकता है कि किसी समय पर आपातकाल की घोषणा भी कर दी जाए. ऐसे समय में देश के 'ग़द्दारों' को अलग-थलग करना एक ऐतिहासिक ज़रूरत बन जाएगी.
आपातकाल या आपात कानूनों की घोषणा
दुनिया के कई देशों में या तो आपातकाल घोषित कर दिया गया है या सरकारों ने इस बीमारी से निपटने के लिए कुछ आपात क़दमों की घोषणा की है.
हंगरी में विक्टर ओरबोन की सरकार ने कोरोना वायरस से बचने के लिए एक क़ानून बनाया है जिसमें सरकार को सभी वर्तमान क़ानूनों को स्थगित रखने का अधिकार दिया गया है.
इसके अलावा इस दौरान संसद के अधिकार भी समाप्त कर दिए गए हैं और सिर्फ़ प्रधानमंत्री को इन प्रतिबंधों को हटाने के समय पर फ़ैसला करने का अधिकार दिया गया है.
इस दौरान एक नया क़ानून घोषित किया गया है जिसमें फ़ेक न्यूज़ फैलाने और 'क्वारन्टीन' और कर्फ़्यू तोड़ने के लिए पाँच साल तक की सज़ा का प्रावधान है.
इन क़दमों पर यूरोप के प्रमुख मानवाधिकार संगठन 'काउंसिल ऑफ़ यूरोप' ने अपना विरोध प्रकट किया है.
इसराइल में प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतनयाहू ने इस मुश्किल समय का इस्तेमाल अपने ख़िलाफ़ चल रहे भ्रष्टाचार के मुक़दमों को टालने के लिए किया है.
उन्होंने संसद की बैठकों पर रोक लगा दी है और आंतरिक ख़ुफ़िया एजेंसी को लोगों पर निगरानी रखने का अधिकार दे दिया है.
कोरोना के चलते रोमानिया के प्रधानमंत्री लोदोविच ओरबान की राजनीतिक समस्याएं भी कम से कम कुछ समय के लिए काफ़ूर हो गई हैं.
प्रेस पर पाबंदियाँ
मिस्र की सरकार ने कोरोना आपदा का सहारा ले कर 'गार्डियन' अख़बार के काहिरा संवाददाता की मान्यता रद्द कर दी है, क्योंकि उसने देश में कोरोना से पीड़ित लोगों के बारे में सरकार द्वारा दिए गए आँकड़ों पर सवाल उठाए थे.
जॉर्डन की सरकार ने कोरोना का बहाना लेते हुए सभी अख़बारों के प्रकाशन पर रोक लगा दी है और हर शहर के प्रवेश द्वार पर सैनिक तैनात कर दिए हैं.
कई देशों में राजनीतिक कारणों से जेलों में रह रहे क़ैदियों से परिवारों के मिलने पर रोक लगा दी गई है.
फिलीपींस में विपक्षी सांसदों ने ये शंका जताई है कि वहाँ के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते लोगों की आवाजाही और जमा होने पर लगाए गए प्रतिबंधों को जल्दी हटाएंगे.
उन्होंने अपने देश में छह महीनों के लिए आपात स्थिति की घोषणा की है जो दुनिया के किसी देश द्वारा की गई इस तरह की घोषणा से कहीं अधिक है.
बहुचर्चित किताब 'अथॉरिटेरियेनिज़्म : वॉट एवरी बडी नीड्स टू नो' की लेखिका एरिका फ़्रैंक कहती हैं कि 'इस तरह का संकट लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है. इससे कई सरकारों को अपने नागरिकों पर ज़ुल्म ढाने का मौक़ा मिल जाता है.'
नागरिक अधिकारों पर नियंत्रण की पूर्वघोषित समय सीमा
दुनिया के बड़े प्रजातांत्रिक देशों जैसे जर्मनी, इटली और ऑस्ट्रिया की सरकारों ने भी लोगों की आवाजाही पर नियंत्रण करने के लिए उनके सेल फ़ोन विवरण तक पर नज़र रखनी शुरू कर दी है.
मोंटेनीग्रो में सरकार ने उन नागरिकों के नाम और पते प्रकाशित कर दिए हैं जिन्हें क्वारन्टीन में रहना चाहिए.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस आपदा से निपटने के लिए नागरिक अधिकारों का अतिक्रमण एक अस्थायी और आनुपातिक तरीक़ा होना चाहिए और इनकी पहले से घोषित एक निश्चित समय सीमा होनी चाहिए.
इसके अलावा वैधानिक निकायों को हर हालत में सक्रिय रहना चाहिए.
उदाहरण के लिए ऑस्ट्रिया की संसद ने कोरोना से निपटने के लिए कई क़ानून पास किए हैं और यूरोपीय संसद ने भी सांसदों की बैठक बुलाए बगैर 'रिमोट वोटिंग' की मदद से इस आपदा से झूझ रहे देशों की मदद के लिए एक विशेष ईयू फ़ंड के गठन का ऐलान किया है.
फ़ेक न्यूज़ के बारे में भी विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मुक़ाबला सज़ा दे कर कर नहीं बल्कि पारदर्शिता से मुक़ाबला किया जा सकता है. नकली ख़बर फैलाने के लिए हंगरी, सर्बिया और तुर्की जैसे देशों में बड़ी सज़ाएं हैं जहाँ सरकार समर्थित मीडिया इस बीमारी के ख़तरों के बारे में भ्रमित कर देने वाली झूठी सूचनाएं देने में कोई संकोच नहीं कर रहा है.
दूसरी तरफ़ ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों में कोरोना वायरस से सफलतापूर्व लड़ने की वजह वहाँ की सरकारों की स्पष्ट और पारदर्शी संवाद नीति है.
संकेत स्पष्ट हैं कि इस आपदा से पूरी दुनिया में लोकतंत्र की जड़ों पर तेज़ी से प्रहार हो सकते हैं.
कनाडा और दक्षिण कोरिया की सरकारों ने दिखाया भी है कि किस तरह इस मुद्दे पर स्वस्थ और खुली बहस सुनिश्चित करते हुए भी इस बीमारी का सामना किया जा सकता है.
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