कोरोना वायरस से कितना डरा हुआ है सुपर पावर अमरीका?

    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन

अपने अपार्टमेंट में बंद हो कर मैं अमरीका में कोरोना वायरस को लेकर बढ़ रहे पैनिक को महसूस कर रहा हूं.

कोरोना वायरस का संक्रमण जितनी तेजी से फैला है उसको लेकर अमरीकी लोग भी डरे हुए हैं. दुनिया के सबसे ताकतवर देश के पास इस वायरस का कोई इलाज नहीं है.

इस वायरस के सामने अमरीका भी संघर्ष कर रहा है जिसको थोड़े समय पहले ही अमरीकी राष्ट्रपति ने 'राजनीतिक छल' कह कर खारिज कर दिया था. अमरीका को दुनिया के दूसरे हिस्सों में परफेक्ट मुल्क के तौर पर देखा जाता है, जहां हर कोई किसी भी कीमत पर आकर बस जाना चाहता है. लेकिन ये कुछ दिनों पहले की बात लग रही है. इन दिनों अमरीका की दूसरी ही तस्वीर उभरी है, कोरोना वायरस से अब तक 230 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

और 18,500 से ज़्यादा लोग इसके संक्रमण में हैं. इस आंकड़े के बढ़ने की आशंका बनी हुई है.

ताकत का प्रदर्शन

किसी को अंदाजा नहीं है कि कितनी खराब स्थिति होगी और कितने लंबे समय तक यह संकट बना रहेगा.

कई लोग इस बात पर अचरज में हैं कि दुनिया का सुपर पावर किस तरह से लाचार दिख रहा है.

अमरीका दुनिया का एक ऐसा देश है जो दुनिया के किसी भी कोने में, हर मुद्दे पर अपनी बात रखता है, फैसले लेता है.

इस देश के नेता भी अपने देश के सीमाओं से बाहर अपनी ताकत का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते.

लेकिन कोरोना वायरस के सामने अमरीका आंतरिक तौर पर कमज़ोर साबित हुआ है.

अमरीका से भाग रहे हैं लोग

अमरीका में आम लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा की सबसे अहम एजेंसी सेंटर्स फॉर डिजिज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन (सीडीसी) के पूर्व निदेशक टॉम फ्रीडेन ने सबसे भयावह स्थिति के बारे में आकलन करते हुए बताया है, "यह अंसभव नहीं है. अमरीका का आधी आबादी कोविड-19 से संक्रमित हो सकती है और दस लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो सकती है." ऐसी स्थिति आ गई है कि लोग अमरीका छोड़कर अपने-अपने देशों की तरफ भाग रहे हैं.

न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, "चीनी नागरिक अपने बच्चों को गर्व से पढ़ने के लिए न्यूयार्क और लंदन भेज रहे थे, अब वे मास्क और सेनिटाइजर भेज रहे हैं और घर के लिए फ्लाइट पकड़ने को कह रहे हैं जिसके टिकट की कीमत 25 हजार डॉलर के आसपास है." इस रिपोर्ट के मुताबिक इस महीने अपने रूम मेट के साथ पूर्वी चीन अपने घर लौटने वाले 24 साल के एक ग्रैजुएट छात्र ने बताया है कि वे घर इसलिए लौट रहे हैं कि क्योंकि उन्हें न्यूयार्क की तुलना में चीन सुरक्षित दिख रहा है.

कोरोना टेस्ट में गड़बड़ी?

जबकि कुछ ही महीने पहले चीन कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में था और वहां काफी लोगों की मौत हो रही थी. इसी वजह से ट्रंप प्रशासन की आलोचना हो रही है कि वह इस वायरस की जांच को तेज नहीं कर रही है और ना ही इससे निपटने की योजनाएं बना रही है.

हालांकि जनवरी के अंत में डावोस में हुई वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम की बैठक के दौरान सीएनबीसी से बात करते हुए डोनल्ड ट्रंप ने कहा था, "हमारे यहां स्थिति नियंत्रण में हैं."

उन्होंने तब यह भी कहा था कि चीन से आ रही सूचनाओं पर वे भरोसा कर रहे हैं. लेकिन इसके बाद स्थिति में तेजी से बदलाव देखने को मिला है.

सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं के लेकर अमरीका में सरकार की भूमिका राजनीतिक फुटबॉल की तरह दिखने लगी.

कोरोना वायरस का टेस्ट

कई दिनों तक कोरोना वायरस की जांच के लिए बहस चली और उसके बाद टेस्ट कराने को लेकर संघर्ष, यह सब देखना चौंकाने वाला है. सबसे अहम हेल्थ केयर एजेंसी सीडीसी ने कोरोना वायरस का अपना टेस्ट विकसित किया है लेकिन इसके शुरुआती परीक्षणों में निर्माण दोष पाया गया जिसके चलते नतीजे निर्णायक नहीं थे. आधिकारियों का दावा है कि इस मामले को हल कर लिया गया है. लेकिन रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि कॉटन, ग्लोब्स, उपकरण और अन्य चीज़ों की कमी की चलते कोरोना का टेस्ट उस तेजी से नहीं हो पा रहा है जितनी तेजी से होना चाहिए था. जब लोगों ने सरकार के कदमों पर सवाल उठाने शुरू किए तब राष्ट्रपति ट्रंप, शीर्ष उद्योगपतियों के साथ टीवी पर नजर आए, इन उद्योगपतियों ने सहायता मुहैया कराने की प्रतिज्ञा ली.

खर्च नहीं उठा पा रहे अमरीकी?

अमरीकी पत्रकार डेविड वेलेस वेल्स ने ट्रंप और उनकी व्यवस्था की आलोचना करते हुए 'अमरीका इज़ ब्रोकन' नाम से आकलन लिखा है.

इसमें उन्होंने कहा है, "हम किस भयावह और अजीब दुनिया में रह रहे हैं जहां महामारी के समय में जरूरी चिकित्सीय सहायता के लिए हमें निजी कंपनियों और परोपकारियों पर भरोसा करना पड़ रहा है." उन्होंने आगे लिखा है, "हमारे मौजदा तंत्र में इससे अजीब स्थिति क्या होगी कि बड़े सर्विस प्रदाता और इंश्यूरेंस कंपनियां शुल्क माफ करने और टेस्ट का खर्चा उठाने का ढकोसला कर रही है." अगर टेस्ट उपलब्ध भी है तो सच्चाई यही है कि ज्यादातर अमरीकी उसका खर्च नहीं उठा सकते हैं. अमरीका में अगर आपके पास इंश्यूरेंस नहीं है तो आप मुश्किलों के साथ जी रहे हैं.

बीमा का मुद्दा

स्वतंत्र पत्रकार कार्ल गिब्सन के पास इंश्यूरेंस नहीं है और उन्होंने लिखा है कि वे कोरोना से डर वाले समय में जी रहे हैं.

उन्होंने लिखा है, "अमरीका में स्वास्थ्य सुविधाओं के खर्च के चलते मैं 2013 के बाद से डॉक्टर के पास नहीं गया हूं. तब मुझे आपात स्थिति में जाना पड़ा था क्योंकि सड़क पर बाइक चलाते हुए दुर्घटनाग्रस्त हो गया था." उन्होंने आगे लिखा है, "चार घंटे के इंतज़ार के बाद, डॉक्टर ने मेरी बांह को एक पट्टी में बांधा और दर्द निवारक दवाईयां देकर मुझे घर भेज दिया. इस इलाज में चार हजार डॉलर से ज्यादा खर्च हुए थे. यह खर्च मुझे आज भी याद आता है क्योंकि इससे अपार्टमेंट का किराया देना या कार खरीदना कुछ भी मुश्किल हो सकता है."

व्हाइट हाउस के दावों में कितना दम?

2018 के आंकड़ों के मुताबिक अमरीका की करीब 2.75 करोड़ की आबादी में 8.5 प्रतिशत लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है. दबाव के चलते प्रशासन ने वह नियम लागू किया है जिसके तहत कोरोना वायरस की मुफ्त जांच को इंश्यूरेंस पैकेज में शामिल किया गया है, लेकिन इस फैसले के विरोध में आवाजें नहीं हों, ऐसा भी नहीं है.करीब पांच लाख अमरीकियों के पास घर नहीं है, वे कैंपों में, शेल्टरों में और गलियों में रहते हैं और इस वायरस से संक्रमित होने का सबसे ज़्यादा ख़तरा भी उन्हें ही है.हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप व्हाइट हाउस से लगातार दावा कर रहे हैं कि लाखों मास्क बनाए जा रहे हैं लेकिन जमीन पर स्थिति दूसरी है.

सिएटल से ऐसी रिपोर्टें भी देखने को मिली हैं जहां डॉक्टर खुद ही प्लास्टिक शीट से फेस मास्क बना रहे हैं.इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अमरीका में स्वास्थ्य और अस्पतालों के एसोसिएशन कंस्ट्रक्शन कंपनी, डेंटिस्ट, पशु चिकित्सकों और अन्य समूहों से मास्क या मास्क के लिए डोनेशन मांग रहे हैं.

दुनिया के सबसे विकसित देश का हाल बेहाल

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक इमरजेंसी रूम में डॉक्टरों को एक्सपायर्ड मास्क दिए गए थे, जिसे लगाने के दौरान उसके इलास्टिक बैंड टूट गए.रिपोर्ट के मुताबिक देश के कई डॉक्टरों ने बताया है कि उन्हें केवल एक-एक मास्क दिए गए हैं, अनिश्चितकाल तक इस्तेमाल करने के लिए जिसे साफ करने के लिए वे स्प्रे इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन यह साफ नहीं है कि इसके बाद वह मास्क संक्रमण से उन्हें सुरक्षित रखेगा या नहीं.

शिकागो के एक मेडिकल सेंटर में, अस्पताल कर्मियों ने चेहरा ढंकने वाले मास्क के अभाव में आंखों की सुरक्षा के लए वाशेबल लैब वाले चश्मों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है.ब्रूकलीन में, डॉक्टरों ने बताया है कि आपूर्ति में कमी के चलते वे मास्क का इस्तेमाल एक सप्ताह तक कर रहे हैं, शिफ्टों के बीच में उस पर सेनिटाइजर छिड़क ले रहे हैं.

दुनिया के सबसे विकसित देश से ये हैरान कर देनी वाली ख़बरें सामने आ रही हैं.

इन ख़बरों के चलते ही सबसे प्रमुख स्वास्थ्य एजेंसी सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन (सीडीसी) ने मास्क की कमी से निपटने के लिए जरूरत पड़ने पर रूमाल और स्कॉर्फ बांधने की अनुशंसा की है.

परिवारों के लिए जोखिम

सीडीसी ने कहा है, "फेस मास्क के उपलब्ध नहीं होने पर स्वास्थ्यकर्मी कोविड-19 के मरीज की देखभाल के लिए घर में बने मास्क यानी रूमाल, स्कॉर्फ का इस्तेमाल कर सकते हैं."इससे कई पेशेवर स्वास्थ्यकर्मियों में नाराजगी है, उनका मानना है कि सीडीसी के इस कदम के चलते वे और उनके परिवारों के लिए जोखिम बढ़ गया है.जब मरीज को सांस लेने में मुश्किल होती है तो कृत्रिम श्वसन देने के लिए वेंटिलेटर सबसे अहम होता है.

अमरीका के पास अनुमानित एक लाख साठ हजार वेंटिलेटर मौजूद है, जबकि आठ हजार नौ सौ स्टॉक में हैं. इसके अतिरिक्त हजारों वेंटिलेटर की जरूरत पड़ेगी. लेकिन इसी अमरीका में तैयारियों को लेकर एक दूसरा चरम छोर भी नजर आता है.

अमरीका में किसी भी चुनौती के लिए तैयारियों की चर्चा खूब होती है, उदहारण के लिए कोरोना वायरस से बचाव के लिए बंकरों की बिक्री होने लगी है.

महामारी की तर्ज पर कोरोना वायरस का संक्रमण

एक आकलन के मुताबिक, अगर 1968 में फैली इंफ्लूंजा ए (एच3एन2) महामारी की तरह इस बार भी कोरोना वायरस फैला तो दस लाख लोगों को अस्पताल में दाखिल कराने की जरूरत होगी, 3.8 करोड़ लोगों को चिकित्सीय देखभाल की जरूरत होगी जबकि दो लाख लोगों को आईसीयू में दाखिल कराना पड़ सकता है.अगर यह 1918 में फैले एच1एन1 वायरस से फैले फ्लू महामारी की तर्ज पर कोरोना वायरस का संक्रमण होता है तो 96 लाख लोगों को अस्पताल में दाखिल करना होगा और करीब 29 लाख लोगों को आईसीयू की जरूरत होगी.1968 की महामारी में दुनिया भर में दस लाख लोगों की मौत हुई थी, जबकि अमरीका में एक लाख लोगों की मौत हुई थी.1918 के फ्लू से दुनिया की तब की आबादी का एक तिहाई हिस्सा यानी 50 करोड़ लोग संक्रमित हुए थे और करीब पांच करोड़ लोगों की मौत हुई थी, इसमें 6.75 लाख लोग अमरीकी थे.

ट्रंप प्रशासन

अमरीकी हॉस्पिटल एसोसिएशन के मुताबिक अमरीकी अस्पतालों में 9,24,107 बेड हैं. इसके अलावा इंटेंसिव केयर वाले 46,825 बेड की सुविधाएं हैं. करीब 50 हजार बेड ऐसे हैं जिसे कार्डियोलॉजी, पेडिएट्रिक्स, नवजात शिशुओं और जलने वाले मरीजों के लिए इस्तेमाल हो सकता है.ऐसे में साफ है कि मौजूदा समय में जो सुविधाएं उपलब्ध हैं और जितनी जरूरत हो सकती है, उनमें बड़ा अंतर मौजूद है. उपलब्धता को बढ़ाने के लिए प्रयास शुरू हो चुके हैं.अमरीका में प्रति हजार लोगों पर अस्पताल के 2.8 बेड उपलब्ध हैं. दक्षिण कोरिया में प्रति हजार लोगों पर अस्पताल के 12 बेड उपलब्ध हैं जबकि चीन में प्रति हजार लोगों पर यह 4.3 है. हालांकि ट्रंप प्रशासन ने कई प्रावधान और योजनाओं को शुरू करते हुए एक ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा खर्च करने की घोषणा की है ताकि अर्थव्यवस्था पटरी पर रहे और लोगों का भरोसा बहाल हो, बावजूद इसके ऐसी तुलनाएं बंद नहीं होंगी.

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