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अमरीका के तालिबान को बनाने और निपटाने के खेल में क्या फ़ायदे में रहा पाकिस्तान
- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरीका और अफ़ग़ानिस्तान के कट्टर इस्लामी संगठन तालिबान के बीच एक अहम शांति समझौता हुआ जिसके बाद अब ये माना जा रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में दशकों से जारी तनाव ख़त्म हो सकेगा.
इसके बाद अब अगर अफ़ग़ान तालिबान समझौतों की शर्तों का पालन करता है तो अमरीका अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद अपने पाँच हज़ार सैनिकों को अभी और बाक़ी के 13 हज़ार सैनिकों को अगले साल के अप्रैल तक वापिस बुला लेगा.
समझौते की शर्तों के अनुसार तालिबान अपने क़ब्ज़े वाले इलाक़े में किसी और चरमपंथी गुट को पनपने नहीं देगा. अफ़गान सरकार से बातचीत भी आगे बढ़ाएगा.
अफ़ग़ानिस्तान दशकों से लगातार हिंसाग्रस्त रहा है. क़रीब चार दशक पहले यहां जब सोवियत हमला हुआ उस वक्त उससे लड़ने के लिए सामने आए लोगों को अफ़ग़ान मुजाहिदीन कहा जाने लगा. इन्हें अमरीका और पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त था.
सोवियत सेना के वापस लौटने के कुछ वर्षों बाद जो स्थितियां पैदा हुईं उसी अस्थिरता के बीच 90 के मध्य में वहां तालिबान एक शक्तिशाली संगठन बन कर उभरा.
अमरीका में हुए 9/11 के हमलों के बाद अमरीका ने साल 2001 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के ख़िलाफ़ हमले किए. इसमें फिर से उसका साथ दिया पाकिस्तान ने. ऐसा करने के बाद पाकिस्तान ख़ुद कई सालों तक तालिबानी हमलों के निशाने पर रहा.
2001 में अमरीका की अगुवाई में हुए हमलों के कारण तालिबान को सत्ता से दूर होना पड़ा. लेकिन एक बार फिर हाल में इस संगठन ने वापसी की.
दो दशक तक लगातार तालिबान के साथ युद्ध में लगे रहने के बाद, अफ़ग़ानिस्तान में शांति बहाल करने के लिए अब अमरीका ने तालिबान के साथ हाथ मिला लिए हैं. और इस समझौते के होने में अहम भूमिका निभाई है पाकिस्तान ने.
तालिबान के बनने से लेकर बिगड़ने तक और फिर मज़बूत वापसी करने तक पाकिस्तान, अमरीका के साथ अहम भूमिका में रहा.
अब शांति समझौता होने के बाद पाकिस्तान को क्या हासिल होगा?
पाकिस्तान में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई बताते हैं कि पाकिस्तान को इसका फ़ायदा तो होगा लेकिन वो तुरंत नहीं होगी बल्कि देर में होगा.
वो कहते हैं, "पाकिस्तान की छवि कुछ इस प्रकार की हो गई थी कि वो नहीं चाहता कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति आए. उस पर तालिबान का समर्थन करने के भी आरोप लगे. लेकिन अब तालिबान और अमरीका के बीच हुए शांति समझौते के बाद कई लोग मान रहे हैं कि पाकिस्तान ने संजीदगी से बड़ी अहम भूमिका निभाई है."
"लेकिन पाकिस्तान का ये मानना है कि पाकिस्तानी तालिबान, बलोच अलगाववादी और दाएश (इस्लामिक स्टेट) अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में हैं और पाकिस्तान पर हमले करने के लिए उसकी सरज़मीन का इस्तेमाल कर रहे हैं."
पाकिस्तान में मौजूद बीबीसी उर्दू संवाददाता आसिफ़ फ़ारूक़ी बताते हैं कि पाकिस्तान के लिए ये बात बेहद अहम है कि उसके पड़ोस में शांति बहाल हो.
वो कहते हैं, "अगर अफ़ग़ानिस्तान में अमन होगा तो पाकिस्तान अपनी दक्षिणी सीमा को लेकर सुरक्षित महसूस करेगा."
वो कहते हैं, "ये बात किसी से ढकी-छुपी नहीं है कि तालिबान के सत्ता में होने से पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान के साथ नज़दीकी बढ़ जाती है. साथ ही इसका असर पाकिस्तान में सक्रीय चरमपंथी गुटों पर भी होगा और उनके सामने अफ़ग़ानिस्तान का उदाहरण पेश किया जा सकता है."
क्या ये भारत के लिए एक झटका है?
आसिफ़ फ़ारूक़ी कहते हैं कि पाकिस्तान को लगने लगा था कि अफ़ग़ानिस्तान से उसकी दूरी बढ़ती जा रही है जबकि भारत उसके अधिक क़रीब होता जा रहा है. कई बार पाकिस्तान ने इस तरह की शिकायतें भी की अफ़ग़ानिस्तान में भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियां सक्रीय हैं.
रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई कहते हैं कि पाकिस्तान को ये चिंता है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान के अधिक क़रीब है और वो ये पसंद नहीं करता.
वो कहते हैं, "भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं और इस कारण अफ़ग़ानिस्तान के मसले पर दोनों एक दूसरे के विरोध में रहे हैं. जब पाकिस्तान ने अफ़ग़ान मुजाहिद्दीन का साथ दिया उस वक्त भारत ने वहां की कम्युनिस्ट सरकार का साथ दिया और जब पाकिस्तान ने अफ़ग़ान तालिबान का साथ दिया तो भारत ने विदेशी सेनाओं का साथ दिया."
"दोनों के रुख़ का बड़ा कारण दोनों के बीच के ख़राब ताल्लुक़ात हैं. मुझे लगता है कि भारत को इस बात की परेशानी तो होगी कि अमरीका और तालिबान के बीच पाकिस्तान की मदद से शांति समझौता हो गया है. हो सकता है कि इसके बाद सरकार में राजनीतिक रूप से तालिबान की वापसी हो जाए. भारत को फ़िक्र हो सकती है क्योंकि उसे लगेगा कि जो भी नई सरकार बनेगी वो पाकिस्तान के अधिक क़रीब होगी."
लेकिन क्या वाकई पाकिस्तान फायदे की स्थिति में है?
आसिफ़ फ़ारूक़ी कहते हैं कि पाकिस्तान से जो सामान अफ़ग़ानिस्तान होते हुए आगे भेजा जाता था उसकी सुरक्षा के लिए तालिबान बना था.
वो कहते हैं, "ये बात अब रिकॉर्ड पर है कि पाकिस्तान ने इसमें निवेश भी किया था. लेकिन बाद में चीज़ें बिगड़ीं और दोनों देशों के रिश्ते बिगड़े. रणनीतिक तौर पर पाकिस्तान का अफ़ग़ानिस्तान का पड़ोसी होना उसके लिए फ़ायदेमंद भी रहा और इस कारण उसे नुक़सान भी हुआ."
"जहां अमरीका ने तालिबान के उभरने में और फिर उसे नष्ट करने में पाकिस्तान की मदद ली और पाकिस्तान में अपनी स्थिति का फ़ायदा भी उठाया वहीं पाकिस्तान में इस कारण हज़ारों मौतें भी हुई और वो भी तनाव से जूझता रहा."
रहीमुल्लाह कहते हैं कि "अफ़ग़ान तालिबान के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की मदद अमरीका ने की क्योंकि वो सोवियत संघ का विस्तार रोकना चाहता था और पाकिस्तान ने इसका साथ दिया. बाद में दबाव में आकर तालिबान के साथ उसे अपने रिश्ते तोड़ने पड़े. इस पूरी प्रक्रिया में आर्थिक लाभ पाकिस्तान को मिला लेकिन इसकी तुलना में उसकी हानि अधिक हुई. जानोमाल का नुक़सान तो हुआ ही साथ ही वो ख़ुद चरमपंथ का शिकार हुआ."
रहीमुल्लाह कहते हैं कि ऐसा कहना भी सही नहीं होगा कि पाकिस्तान के लिए भी अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति बहुत बेहतर है, क्योंकि वहां पर काफ़ी लोग पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हैं.
हालांकि वो मानते हैं कि, "अभी अफ़ग़ान सरकार और तालिबान के बीच के बातचीत होनी है. और शांति समझौता बस एक शुरुआत भर है."
"लेकिन ये अपने आप में एक बड़ी कामयाबी है कि 18 महीनों की कोशिशों के बाद अफ़ग़ानिस्तान शांति प्रक्रिया में बड़ा क़दम उठा लिया गया है. आप कहते सकते हैं कि इब्तदा हो गई है अभी अंजाम के बारे में अभी कोई कुछ कह नहीं सकता."
अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास पर एक नज़र
1979 - सोवियत संघ की सेना का हमला जिसके बाद यहां कम्युनिस्ट सरकार बनी. इसके बाद यहां जो हिंसा शुरु हुई उसमें 10 लाख से अधिक लोगों की जान गई.
1989 -सोवियत संघ के सैनिकों की आख़िरी टुकड़ी ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ा. इसके बाद अमरीका और पाकिस्तान के समर्थन वाले लड़ाकों ने सोवियत संघ के समर्थन से बनी अफ़ग़ान सरकार यानी राष्ट्रपति नजीबुल्लाह का तख्तापलट किया. नजीबुल्लाह को क़ाबुल में मौजूद संयुक्त राष्ट्र के परिसर से घसीट कर ले जाया गया और उन्हें मार कर लटका दिया गया. इसके बाद देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गई.
1994 - इसी गृहयुद्ध के बीच तालिबान नाम के कट्टरपंथी संगठन का जन्म हुआ जिसने पहले उत्तर पाकिस्तान और दक्षिण पश्चिम अफ़ग़ानिस्तान के इलाक़ों में अपने पैर फैलाए.
1996 - तालिबान ने क़ाबुल पर क़ब्ज़ा किया और इसके बाद वहां कट्टर इस्लामी क़ानून लागू किया. इसके अधिकतर को वोग शामिल थे जो सोवियत अफ़ग़ान युद्ध का हिस्सा रह चुके थे.
2001 - अमरीका पर हुए 9/11 के चरमपंथी हमलों के लिए उसने अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया. इसके बाद अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप किया और क़ाबुल को तालिबान के कब्ज़े से छुड़ा लिया. यहां अस्थाई सरकार कर हामिद करज़ई को राष्ट्रपति बनाया गया.
2002 - अफ़ग़ानिस्तान में शांति स्थापित करने की ज़िम्मेदारी नैटो ने ली. नैटो सेनाओं के साथ-साथ अमरीका सेना ने भी यहां अपने ठिकाने बनाए.
2004 - क़बिलाई नेताओं की बैठक यानी लोया जिरगा ने नए संविधान पर मुहर लगाते हुए मज़बूत सरकार का रास्ता साफ़ कर दिया और हामिद करज़ई को राष्ट्रपति के तौर पर चुना गया.
2011 - लोया जिरगा की कई बैठकें हुईं जिसका तालिबान ने विरोध किया. तालिबान ने लोया जिरगा में भाग लेने वाले पर हमला करने की धमकी दी.
2013 - लोया जिरगा ने अमरीका के साथ होने वाले सुरक्षा समझौते को समर्थन दिया ताकि वहां मौजूद अमरीकी सेना अफ़ग़ानिस्तान छोड़ सके.
2014 - अशरफ़ ग़नी देश के नए राष्ट्रपति चुने गए. नैटो ने आधिकारिक तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में अपना सैन्य अभियान ख़त्म किया और देश की सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान सेना को सौंप दी.
2018 - अफ़ग़ान सरकार और अमरीकी सेना के ख़िलाफ़ लड़ने वाले तालिबान ने और अमरीका के साथ अफ़ग़ानिस्तान शांति वार्ता प्रक्रिया की शुरु करने की बात की. एक खुला ख़त लिख कर तालिबान ने शांति वार्ता की इच्छा ज़ाहिर की.
2019 - अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सलाहकारों से कहा कि वो नवंबर 2020 में होने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों से पहले अपन सभी सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान से वापस बुलाना चाहते हैं.
2020 - अमरीका ने कहा कि वो अगले 14 महीने में अपने और सहयोगी देशों के सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से वापस बुला लेगा. अमरीका और तालिबान के बीच 'एक विस्तृत शांति समझौते' पर हस्ताक्षर हुए. इसके बाद अफ़ग़ान सरकार और तालिबान में बातचीत का रास्ता खुल गया है.
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