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अफ़ग़ानिस्तान के सीने पर 40 साल पुराना ज़ख़्म
- Author, ख़ुदा ए नूर
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी उर्दू सेवा
27 दिसंबर 1979 को सोवियत संघ की फ़ौज ने अफ़ग़ानिस्तान पर ज़मीनी और हवाई रास्तों से हमला किया और इसी दिन काबुल में क़ैसर ताज बैग में मौजूद अफ़ग़ानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हफ़ीज़ुल्लाह अमीन को ज़हर देने के बाद क़त्ल कर दिया गया.
कुछ इतिहासकरों के अनुसार सोवियत फ़ौज 24 दिसंबर की रात को अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल हो चुकी थी, लेकिन उन्होंने ताज बैग पर हमला 27 दिसम्बर की शाम को किया.
ये वो समय था जब अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति महमूद दाऊद ख़ान की सरकार का तख़्ता उलटे एक साल से ज़्यादा समय बीत चुका था.
इंक़िलाब-ए-सोर (या अप्रैल रिवॉल्यूशन) के बाद बनने वाली पीपल्ज़ डेमोक्रेटिक पार्टी के 'ख़ल्क़' धड़े की सरकार थी, जिसके पहले अध्यक्ष नूर मोहम्मद तरक्की को उन्हीं की पार्टी के हफ़ीज़ुल्लाह अमीन ने मारा और फिर ख़ुद सत्ता पर क़ाबिज़ हुए थे.
उस समय अफ़ग़ानिस्तान के गृह मंत्री फ़क़ीर मोहम्मद फ़क़ीर थे.
वो आज भी समझते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हफ़ीज़ुल्लाह अमीन की मौत ज़हर से नहीं हुई, रूसी फ़ौज उन्हें अपने दूतावास या फिर रूस ले गई और बाद में उनको मारा गया.
कुछ इतिहासकारों के अनुसार हफ़ीज़ुल्लाह अमीन को उनके परिवार के सामने रूसी फ़ौज ने गोली मारकर उनकी हत्या की थी.
फ़क़ीर मोहम्मद फ़क़ीर कहते हैं, "हफ़ीज़ुल्लाह अमीन सूप बड़े शौक़ से पीते थे और उन्हें ज़हर भी सूप में मिलाकर दिया गया था."
"उस दिन तीसरे पहर में तीन बजे उन्होंने अफ़ग़ान राष्ट्रपति की कुछ क़बायली नवाबों के साथ मुलाक़ात तय की थी, लेकिन जब वो क़ैसर ताज बैग गए तो उन्हें बताया गया कि ये मुलाक़ात नहीं हो सकती क्योंकि राष्ट्रपति बीमार हैं."
बीबीसी से बात करते हुए फ़क़ीर मोहम्मद बताते हैं, "मैं जैसे ही तीसरी मंज़िल में राष्ट्रपति के बेडरूम में गया तो मैंने देखा कि राष्ट्रपति के नाक में पाइप लगे हुए हैं और दो रूसी डॉक्टर वहां राष्ट्रपति के पेट की सफ़ाई में व्यस्त हैं. जब उनके पेट को साफ़ किया गया तो वो उन्हें वाशरूम लेकर गए, जहाँ दस से 20 मिनट तक उन्हें ठंडे पानी से नहलाया गया. तब उन्हें होश आया."
फ़क़ीर मोहम्मद बताते हैं कि अफ़ग़ान राष्ट्रपति हफ़ीज़ुल्लाह अमीन ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा कि हो सकता है कि ज़हर की वजह से उनके दिमाग़ पर कोई असर हुआ हो, इसीलिए उनकी जगह वो सेक्रेटेरियट में बैठ जाएं.
"मैं जब नीचे ऑफिस में पहुंचा तो चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ याक़ूब खान ने मुझे रक्षा मंत्रालय में खाने के लिए बुलाया. मैं रक्षा मंत्रालय की दूसरी मंज़िल पर उनसे मिलने गया तो वहां छह या सात रूसी भी मौजूद थे. मेरा परिचय कराया गया और मैंने उनसे हाथ मिलाया. उसी समय फ़ायरिंग शुरू हुई."
पूर्व अफ़ग़ान गृह मंत्री के अनुसार फ़ायरिंग इतनी ज़्यादा थी कि वो कुछ नहीं सुन सकते थे.
कुछ इतिहासकारों के अनुसार ताज बैग महल पर रूसी फ़ौजों का ऑपरेशन शाम सात बजकर पंद्रह मिनट पर शुरू हुआ और अगले दिन की सुबह तक ख़त्म हुआ, जिसमें अफ़ग़ान राष्ट्रपति हफ़ीज़ुल्लाह अमीन मारे गए और मुख्य सरकारी इमारतों पर रूसी फ़ौज ने क़ब्ज़ा कर लिया.
फ़क़ीर मोहम्मद फ़क़ीर के अनुसार उन्होंने राष्ट्रपति हफ़ीज़ुल्लाह अमीन से कभी भी सोवियत संघ के ख़िलाफ़ कोई भी बात नहीं सुनी थी और ना उनकी सरकार सोवियत संघ के ख़िलाफ़ थी.
वो कहते हैं, "रूसी फ़ौज ने हमें बताया कि आपके लिए असलाह ला रहे हैं और इसी बहाने उनकी फ़ौजें ज़मीनी और हवाई रास्तों से अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल हुईं. रूसियों पर हमारा इतना यक़ीन था कि अगर वो मुझे मारते भी तो भी मैं ये स्वीकार नहीं करता कि ये रूसी मुझे मार रहे हैं."
अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के बाद सोवियत संघ की फ़ौज लगभग नौ साल अफ़ग़ानिस्तान में रही, जहाँ मुजाहिदीन उनके ख़िलाफ़ ग़ैर-आधिकारिक तौर पर जंग लड़ते रहे.
राष्ट्रपति हफ़ीज़ुल्लाह अमीन की मौत के बाद सोवियत संघ की मदद से उस समय के पीपल्ज़ डेमोक्रेटिक पार्टी के 'परचम' धड़े के बबरक कारमल को सत्ता सौंपी गई और फिर अफ़ग़ान सरकार और सोवियत संघ एक तरफ़ हो गई जबकि मुजाहिदीन उनके ख़िलाफ़ अनाधिकारिक जंग लड़ते रहे.
अमरीका, सऊदी अरब, पकिस्तान और कई दूसरे पश्चिमी देश आख़िरी दम तक अफ़ग़ान मुजाहिदीनों का पीछे से समर्थन करते रहे.
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