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क्या ट्रंप के इस दौरे में भारत-अमरीका की डील हो पाएगी?
- Author, निधि राय
- पदनाम, बीबीसी बिज़नेस संवाददाता, मुंबई
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप 24 फ़रवरी को अपने पहले भारत दौरे पर आने वाले हैं.
ज़ाहिर है, भारत 'दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति' के स्वागत करने के लिए बहुत उत्साहित है. इस उत्साह के पीछे राजनीतिक और कारोबर से जुड़ी वजहें हैं.
इस दौरे से जुड़ी एक बेहद महत्वपूर्ण बात है दोनों देशों के बीच 10 बिलियन डॉलर यानी 70 हज़ार करोड़ से भी ज़्यादा की प्रस्तावित डील.
हालांकि मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा था कि वो 'बड़े व्यापार समझौतों' को भविष्य के लिए बचा रहे हैं क्योंकि अमरीका अपने यहां होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले या बाद में डील होने की योजना बना रहा है.
अमरीका के व्यापार प्रतिनिध रॉबर्ट लाइटहाइज़र ने पिछले हफ़्ते ही अपना भारत दौरा रद्द कर दिया था क्योंकि दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई थी.
इस बारे में ट्रंप ने कहा था, "भारत हमारे साथ बहुत अच्छा सलूक नहीं करता है लेकिन मैं प्रधानमंत्री मोदी को बहुत पसंद करता हूं."
पिछले तीन वर्षों में भारत और अमरीका के रिश्ते उतार-चढ़ाव से भरे रहे हैं.
भारत और अमरीका के बीच व्यापार को लेकर क्या विवाद है?
चीन के बाद अमरीका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. साल 2018 में भारत और अमरीका का द्विपक्षीय कारोबार रिकॉर्ड 142.6 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था.
वहीं, साल 2019 में अमरीका और भारत का व्यापार घटकर 23.2 बिलियन डॉलर पर आ गया था.
पिछले तीन वर्षों में भारत और अमरीका के बीच व्यापारिक तनाव धीरे-धीरे बढ़ा है.
हालांकि अमरीका के साथ भारत का व्यापार घाटा अब धीरे-धीरे कम होने लगा है और अब यह भारत और चीन के व्यापार घाटे का 10वां हिस्सा भर है. इसके बावजूद भारत अमरीका का कोपभाजन बनने से बच नहीं सका है.
अमरीका और भारत के बीच 'ट्रेड वॉर' उस वक़्त शुरू हुआ जब ट्रंप प्रशासन ने भारत से आयातित स्टील उत्पादों पर 25 फ़ीसदी और एल्युमिनियम उत्पादों पर 10 फ़ीसदी शुल्क लगा दिया.
इस शुल्क के प्रभाव में आने से पहले भारत ने अमरीका से कई बार गुज़ारिश की कि वो अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करे. इतना ही नहीं, भारत ने कोई जवाबी कदम भी नहीं उठाया.
विश्व व्यापार संगठन में शिकायत
वहीं, अमरीकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से बताया कि भारत कैसे अमरीका से आयातित उत्पादों पर ज़्यादा टैक्स लगाता है. ट्रंप ने भारत को 'ट्रैफ़िक किंग ऑफ़ द वर्ल्ड' कहा.
इसके बाद भारत ने 16 जून, 2019 से अमरीका में बने या अमरीका से आयातित 28 उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाया. इसके लिए अमरीका ने भारत के ख़िलाफ़ विश्व व्यापार संगठन में शिकायत की थी.
व्यापार वार्ता रुकते ही अमरीका ने ई-कॉमर्स में असहमतियों का हवाला देकर भारतीयों के लिए एचवन-बी वीज़ा का कोटा 15 फ़ीसदी घटा दिया और भारत की तरफ़ से खड़ी की जा रही व्यापार बाधाओं की जांच करवाने की मांग उठाई. अमरीका के मुताबिक़ ये व्यापार बाधाएं शुल्क लगाकर खड़ी जा रही थीं या फिर बिना शुल्क लगाए ही.
13 नवंबर 2019 को भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और उनके समकक्ष रॉबर्ट लाइटज़र इस डील को शुरुआती रूप देने के लिए मिले.
नवंबर के आख़िर में अमरीका से एक समिति भारत आई और उन्होंने भारतीय समकक्ष टीम के साथ प्रस्तावित डील के बारे में विस्तार से चर्चा की.
विकासशील देशों की सूची
हालांकि अमरीका में शनिवार को हुई एक प्रेस वार्ता में बताया गया कि इस डील की अगुवाई कर रहे रॉबर्ट लाइटज़र ट्रंप के साथ भारत आने वाले प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा नहीं होंगे.
इस महीने की शुरुआत में भी लाइटज़र ने अपना भारत दौरा रद्द कर दिया जबकि उन्हें एक डील पैकेज के बारे में चर्चा करनी थी.
उस समय भारत ने इस दौरान अमरीका के डेयरी और पॉल्ट्री कारोबार को लेकर कुछ नए प्रस्ताव भी रखे थे. ज़ाहिर है, लाइटज़र पर इन प्रस्तावों का कोई असर नहीं पड़ा.
राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा से पहले अमरीका ने भारत को विकासशील देशों की उस सूची से निकाल दिया जिन्हें उस जांच से छूट मिलती है कि क्या वो 'अनुचित रूप से सस्ता निर्यात' करके अमरीकी उद्योगों को नुक़सान पहुंचा रहे हैं.
अमरीका के भारत को इस लिस्ट से इसलिए हटा दिया क्योंकि वो जी-20 देशों का सदस्य है और दुनिया के व्यापार में इसका 0.5 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा हिस्सा है.
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जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ़ प्रीफ़रेंसेज़
अमरीका के इस कदम को भारत की जीएस (जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ़ प्रीफ़रेंसेज़) कैटेगरी में वापस जाने की कोशिश को धक्का लगा है. इस कैटेगरी में शामिल देशों को प्राथमिकता और अन्य फ़ायदे मिलते हैं और इसमें आम तौर पर विकासशील देश ही होते हैं.
जीएसपी भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके ज़रिए भारतीय सामान बिना किसी शुल्क के अमरीकी बाज़ार में जा सकते हैं. लेकिन भारत का ये दर्जा 5 जून, 2019 को छीन लिया गया क्योंकि अमरीका की डेयरी और मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री का कहना है था कि भारत के लगाए टैक्स की वजह से उनका निर्यात प्रभावित हो रहा है.
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के पूर्व सचिव अजय दुआ मानते हैं कि अमरीका के ऐसा करने की वजह से दोनों देशों में कड़वाहट आई गई थी.
यूएस-इंडिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फ़ोरम (USISPF) के प्रमुख डॉक्टर मुकेश अघी ने बीबीसी से कहा, "ट्रंप के द्वारा शुल्क बढ़ाए जाने से भारत के मैकेनिकल, इलेक्ट्रिल, केमिकल, स्टील और ऑटो मेकिंग पुर्जे के व्यापार को नुक़सान पहुंचा है और इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अमरीकी बाज़ार से स्पर्धा करना मुश्किल हुआ है. वहीं, भारत की कार्रवाई से अमरीका से आयातित फल और ड्राई फ़्रूट्स के कारोबार पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा है. इसका सबसे ज़्यादा असर कैलिफ़ोर्निया के बादाम और अखरोट और वाशिंगटन के सेबों के व्यापार पर पड़ा."
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भारत क्या चाहता है?
भारत चाहेगा कि उसे जीएसपी का दर्जा फिर से मिल जाएगा और एचवनबी वीज़ा के नियम आसान किए जाए.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार अमरीका चाहेगा कि भारत के डेयरी बाज़ार में उसे ज़्यादा पहुंच मिले. अमरीका मेडिकल डिवाइस और हार्ली डेविडसन बाइक से भी शुल्क घटवाना चाहेगा.
डॉक्टर मुकेश अघी कहते हैं, "भारत और अमरीका के बीच भविष्य में अच्छे व्यापार समझौतों के लिए अगर अभी एक आंशिक डील से शुरुआत की जाए तो यह बहुत अच्छा होगा. इससे नीति निर्माताओं को अर्थव्यवस्था सुधारने का एक मंच मिलेगा. अगर इंडस्ट्री के नज़रिए से देखें तो यह डील दोनों देशों के रिश्तों को गति देगी."
अघी मानते हैं कि किसी भी पक्ष के 'प्रोटेक्शनिज़्म' से ऩुकसान होगा और दोनों देशों ने मिलकर अब तक जो असल प्रगति की है, वो ठहर जाएगी.
ये मुश्किल क्यों है?
अमरीका और भारत कई मुद्दों पर एकमत नहीं हैं. फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइज़ेशन्स (FIEO) के महानिदेश अजय सहाय कहते हैं, "अमरीका हार्ली डेविडसन बाइक, इलेक्ट्रॉनिक और सूचना तकनीक उत्पादों पर बढ़े शुल्क, मेडिकल उपकरणों की कीमत पर नियंत्रण, डेयरी मार्केट में कम पहुंच और डेटा लोकलाइज़ेशन से चिंतित है."
अमरीका के डेयरी कारोबारी भारत में अपने उत्पाद बेचना चाहते हैं लेकिन दिक्कत ये है कि वो अपने पशुओं को ब्लड मील (ख़ून से बना पशुओं का खाना) खिलाते हैं और ये भारतीय ग्राहकों की धार्मिक भावनाओं के ख़िलाफ़ है.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इन उत्पादों के आयात से पहले भारत अमरीका से एक सर्टिफ़िकेट चाहती थी जिससे ये साबित हो सके ये उत्पाद 'शुद्ध' हैं.
दोनों देशों के बीच विवाद
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की रिसर्च फ़ेलो कशिश परपियानी बताते हैं कि इस मुद्दे पर भारत और अमरीका किसी समझौते पर पहुंच पाए थे.
राष्ट्रीय किसान महासंघ ने हाल ही में कहा था, "एक तरफ़ केंद्र सरकार साल 2022 तक किसानों का आमदनी दोगुनी करने का दावा कर रही है और दूसरी तरफ़ एक ऐसा व्यापार समझौता करने पर तुली हुई है जिसका खामियाजा कोई और नहीं बल्कि हम किसान भुगतेंगे. इस डील की वजह से हर साल 42,000 करोड़ की कीमत के कृषि, डेयरी और पोल्ट्री उत्पाद अमरीका से आयात किए जाएंगे."
राष्ट्रीय किसान महासंघ ने 17 फ़रवरी को अमरीका और भारत के व्यापारिक समझौते के ख़िलाफ़ सरकार को चेतावनी देने के लिए देशव्यापी प्रदर्शन आयोजित किया था.
दो फ़रवरी को पेश किए अपने बजट में केंद्र सरकार ने अमरीका से आयातित मेडिकल डिवाइसों पर शुल्क लगा दिया जो कि पहले से ही दोनों देशों के बीच विवाद का कारण था.
एंडवांस्ड मेडिकल टेक्नॉलजी असोसिएशन की वाइस प्रेसिडेंट ऐबी प्रैट ने अपने एक बयान में मेडिकल उपकरणों पर लगे टैक्स पर चिंता जताई थी.
'बड़े ट्रेड डील'
यानी, इस बार के बजट में हुए ऐलानों को लेकर नया विवाद छिड़ सकता है.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीकी सरकार घुटने और हृदय प्रत्यारोपण में लगने वाले उपकरणों से 'प्राइस कंट्रोल' भी हटवाना चाहती है.
विशेषज्ञ ये मानते हैं कि अगर ट्रंप 'बड़े ट्रेड डील' पर आगे बढ़ने का फ़ैसला करते हैं तो इसका असर आने वाले दिनों में ही देखने को मिलेगा.
10 बिलियन डॉलर व्यापार पैकेज से भारत-पाकिस्तान के सभी द्विपक्षीय मुद्दे नहीं सुलझेंगे.
हालांकि ये अनुमान भी जताया जा रहा है कि अगले दो-तीन वर्षों में दोनों देशों के बीच पैदा हुए तनाव कम होंगे जिससे दोनों देशों का फ़ायदा होगा.
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के कशिश परपियानी कहते हैं, "अगर लंबित ट्रेड डील हो गई तो इससे कुछ क्षेत्रों में कुछ फ़ायदा हो सकता है. जैसे, भारत को जीएसपी दर्जे के वापसी के बदले में अमरीका के कृषि और आईसीटी उत्पादों को भारतीय बाज़ारों में पहुंच."
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