You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कश्मीर: 370 हटाने के पीछे डोनल्ड ट्रंप का मध्यस्थता प्रस्ताव था?
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
क्या भारत सरकार के जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के कश्मीर मामले में 'मध्यस्थता के प्रस्ताव' का आपस में कुछ सम्बन्ध है?
अमरीका के कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) की एक रिपोर्ट तो कुछ ऐसा ही कहती है.
इस रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार के 5 अगस्त, 2019 के फ़ैसले के पीछे ट्रंप की मध्यस्थता प्रस्ताव की भूमिका हो सकती है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने एक से ज़्यादा मौकों पर कहा है कि अगर भारत और पाकिस्तान राज़ी हों तो वो कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करने के इच्छुक हैं.
पाकिस्तान ने जहां ट्रंप के प्रस्ताव का स्वागत किया था, वहीं भारत ने कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा बताया था.
सीआरएस की वेबसाइट पर इसे 'लाइब्रेरी ऑफ़' कांग्रेस के तहत एक विधायी एजेंसी बताया गया है.
वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक़ सीआरएस अमरीकी संसद के दोनों सदनों (हाउस ऑफ़ रिप्रजेंटेटिव्स और सीनेट) के सदस्यों यानी अमरीकी सांसदों (चाहे वो किसी भी पार्टी के हों) और समितियों के लिए नीतिगत और क़ानूनी सामग्री उपलब्ध कराती है.
ट्र्ंप ने कई बार रखा है मध्यस्थता का प्रस्ताव
जुलाई, 2019 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बगल में बैठे ट्रंप ने एक चौंकाने वाला दावा किया था. ट्रंप ने कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जून में उनसे कहा था कि अमरीका को कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए.
ट्रंप ने कहा था, "मुझे मध्यस्थ बनकर बहुत ख़ुशी होगी."
भारत में ट्रंप के इस दावे पर इतना हंगामा हुआ कि भारतीय विदेश मंत्रालय को इस पर सफ़ाई देनी पड़ी. मंत्रालय ने कहा कि भारत की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया है.
इसके कुछ हफ़्तों बाद ने ट्रंप ने एक बार फिर अपना प्रस्ताव दुहराया. उन्होंने कहा, "अगर मैं ऐसा कर सकता हूं, और वो चाहते हैं कि मैं करूं तो मैं ज़रूर दख़ल दूंगा."
सीआरएस की रिपोर्ट के अनुसार, "इमरान ख़ान के साथ राष्ट्रपति ट्रंप की गर्मजोशी, उनका ये चाहना कि अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने में पाकिस्तान अमरीका की मदद करे और हाल ही में अमरीका ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से फ़ंड दिलाने में जिस तरह मदद की, उससे कई भारतीय विश्लेषकों के मन में सवाल पैदा हुए हैं."
ये भी पढ़ें: ट्रंप के रोड शो में आख़िर कितने लोग आने वाले हैं?
370 पर बीजेपी का पुराना वादा
यह रिपोर्ट दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार के. ऐलन क्रोन्श्टाट ने लिखी है.
वो कहते हैं कि अमरीका और भारत दोनों जगह काफ़ी हद तक ऐसा माना जा रहा था कि कश्मीर को लेकर भारत के फ़ैसले के पीछे ट्रंप के मध्यस्थता प्रस्तावों की भूमिका थी.
एक ईमेल के जवाब में क्रोन्श्टाट कहते हैं, "ये सच है कि अनुच्छेद 370 को ख़त्म करना बीजेपी का पुराना चुनावी मुद्दा रहा है. उसने 2014 और 2019 दोनों लोकसभा चुनावों के घोषणापत्रों में इसका ज़िक्र था. इससे ये संकेत मिलता है कि अनुच्छेद 370 ख़त्म करने के भारत के फ़ैसले के पीछे पुलवामा संकट और जुलाई में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की वाशिंगटन यात्रा उतनी बड़ी वजह नहीं थी जितनी कि पिछले साल मई में मिली बीजेपी की बड़ी चुनावी कामयाबी थी."
भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय अर्धसैनिक बलों के काफ़िले पर हुए हमले में इसके 40 जवान मारे गए थे.
क्रोन्श्टाट के मुताबिक़, कश्मीर मुद्दे पर भारत सरकार के फ़ैसले के पीछे एक अन्य वजह थी अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेना की वापसी. कई भारतीय विश्लेषक इसे क्षेत्र में अस्थिरता को बुलावा मानते हैं.
भारत दौरे पर कश्मीर की बात करेंगे ट्रंप?
अब जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जल्दी ही भारत आने वाले हैं. ऐसे पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के हवाले से कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि भारत दौरे पर राष्ट्रपति ट्रंप अपने मध्यस्थता प्रस्ताव को आगे बढ़ाएंगे.
मगर क्या वो सच में ऐसा करेंगे?
हमने जिन विश्लेषकों से बात की, उन्हें इसकी उम्मीद कम है.
जॉन हॉप्किंस स्कूल ऑफ़ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज़ के असोसिएट प्रोफ़ेसर जोशुआ वाइट का मानना है कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को ये ध्यान रखना पड़ेगा कि ट्रंप की बातें इस पर निर्भर करती हैं कि उनके बगल में कौन बैठा है.
जोशुआ कहते हैं, "ट्रंप के बयान अमरीकी नीति में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं ला सके हैं. इसलिए, भारत और पाकिस्तान जानते हैं कि जब तक वो कुछ बहुत बड़ा या नाटकीय न करें, उसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए."
विश्लेषकों का कहना है कि कश्मीर पर भारत के फ़ैसले को लेकर हैरत नहीं होनी चाहिए क्योंकि बीजेपी ने चुनावी अभियानों में भी इसका वादा किया था और नरेंद्र मोदी दोबारा बड़े बहुमत के साथ वापस आए थे.
ये भी पढ़ें: कश्मीर पर यूएन प्रमुख के प्रस्ताव को भारत ने ठुकराया
कश्मीर के हालात पर अमरीकी सांसदों की चिट्ठी
कंजर्वेटिव थिंक टैंक 'हेरिटेज फ़ाउंडेशन' में दक्षिण एशिया रिसर्च फ़ेलो जेफ़ स्मिथ को नहीं लगता कि कश्मीर पर भारत के फ़ैसले और ट्रंप के मध्यस्थता प्रस्ताव में कोई संबध है क्योंकि अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने की बात बीजेपी के घोषणापत्र में थी.
कैटो इंस्टिट्यूट के फ़ेलो और विदेश नीति के जानकार सहर ख़ान कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि ट्रंप वाक़ई कश्मीर मुद्दे की गंभीरता समझते हैं. मुझे नहीं लगता कि ट्रंप को मालूम कि आज़ादी के बाद से ही कश्मीर को भारत और पाकिस्तान में इतना गहरा विवाद क्यों है."
सहर ख़ान कहती हैं, "ट्रंप के मध्यस्थता प्रस्ताव ने भारत और पाकिस्तान को चिंतित ज़रूर किया था. वो तीन साल से सत्ता में हैं और अब तक ये पता चल गया है कि उनके बारे में पूर्वानुमान लगाना कितना मुश्किल है. मैं ये नहीं कर रही हूं कि मध्यस्थता पूरी तरह असंभव है लेकिन मुझे नहीं लगता कि इमरान ख़ान या नरेंद्र मोदी पूर्व निर्धारित बिंदुओं के बगैर कश्मीर मुद्दे पर बात करेंगे. रही बात ट्रंप की, तो उनके मध्यस्थता करने में ख़तरा ये है कि दोनों नेताओं को उन्हें ऐसी छूट देनी पड़ सकती है, जिनका समर्थन उनकी पार्टियां कभी नहीं करेंगी."
तो ट्रंप के भारत दौरे पर कश्मीर के बारे में बात होगी भी या नहीं?
लिंड्से ग्राहम समेत ट्रंप के करीबी और प्रभावी समझने जाने वाले चार अमरीकी सांसदों (दो रिपब्लिन और दो डेमोक्रेटिक) ने अमरीकी स्टेट डिपार्टमेंट को एक पत्र लिखा है. इस पत्र में उन्होंने कश्मीर और भारत के नए नागरिकता क़ानून (सीएए) को लेकर 'चिंताएं' ज़ाहिर की हैं.
ये भी पढ़ें: कश्मीर पर एस. जयशंकर की अमरीकी सांसद को खरी-खरी
अमरीकी सरकार के एक वर्ग में कश्मीर की स्थिति को लेकर चिंता है और भारत इन चिंताओं के संतोषजनक जवाब देने की कोशिश करता रहा है.
हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमरीका कश्मीर पर भारत के फ़ैसले के बारे में सार्वजनिक रूप से नहीं कहेगा. इसके बावजूद भारतीय पक्ष कहीं न कहीं ट्रंप को लेकर आशंकित ज़रूर है.
कई जानकार ट्रंप को एक ऐसा राष्ट्रपति मानते हैं जो व्यक्तिगत रिश्तों को आर्थिक और भौगोलिक ज़रूरतों से ज़्यादा अहमियत देते हैं.
भारतीय विदेश नीति की जानकार तन्वी मदान कहती हैं, "भारत ट्रंप प्रशासन का रवैया उतना आलोचनात्मक नहीं रहा है जितना की कुछ लोग चाहते थे या उम्मीद करते थे. ऐसा इसलिए है क्योंकि अमरीका भारत को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है और शायद वो ये भी समझता है कि भारत की सार्वजनिक आलोचना करना प्रभावी नहीं होगा."
मदान कहती हैं, "मौजूदा अमरीकी प्रशासन, ख़ास तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप ने मानवाधिकारों के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं बोला है. उदारवादी सिद्धांत उनकी प्राथमिकता नहीं है. अगर ऐसा होता तो शायद हो भारत का दौरा ही न कर रहे होते."
असहिष्णुता और इस्लामोफ़ोबिया की चर्चा
इस वक़्त अमरीका में भारत में बढ़ती 'असहिष्णुता की संस्कृति' और 'इस्लामोफ़ोबिया' के कथित ख़तरे की भी चर्चा है.
ब्रूकिंग्स थिंक टैंक के विश्लेषक ब्रूस रीडल ने ट्रंप की भारत यात्रा पर आयोजित एक 'मीडिया कॉल' इवेंट में कहा कि इससे पहले भारत-अमरीका रिश्तों के संदर्भ में इन मुद्दों का ज़िक्र नहीं होता था.
रीडल कहते हैं, "ये चिंताएं भारत-अमरीका के रिश्तों ख़त्म नहीं कर पाएंगी लेकिन ये दोनों देशों के रिश्तों पर एक सवालिया निशान ज़रूर हैं...अभी ये सतह के नीचे हैं और वक़्त के साथ समस्याएं खड़ी कर सकती हैं. अगर नवंबर में होने वाले चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में आती है तो इसकी आशंका और बढ़ जाएगी.''
दक्षिण एशिया मामलों के एक जानकार का कहना है कि अमरीका का अगला क़दम क्या होगा इसका अंदाज़ा अफ़गान शांति वार्ता और पाकिस्तान को एफ़एटीएफ़ की ग्रे लिस्ट में रखे जाने पर उसके विचारों को देखकर लगाया जा सकता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)