इराक़ में विरोध प्रदर्शनों की ज़मीन किसने सींची

इराक़ के दक्षिणी शहर बसरा में सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल महिलाएं

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    • Author, संदीप सोनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

अमरीका के रक्षामंत्री रहे डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने एक बार कहा था कि इराक़ एक ऐसा मुल्क है जो तेल के ऊपर तैर रहा है.

इराक़ के पास तेल का इतना भंडार है कि उसका दोहन करके इराक़ की समृद्धि आसमान छू सकती है.

ऑडियो कैप्शन, इराक़ में सूखी-तपती, खारी-बंज़र ज़मीन से विरोध के बीज कैसे अंकुरित हुए.

इराक़ कच्चे तेल के भंडार के मामले में सऊदी अरब के बाद दुनिया का दूसरा बड़ा देश है. लेकिन संघर्षों और युद्धों की वजह से इराक़ को दशकों तक उथल-पुथल का सामना करना पड़ा.

इसकी गाज गिरी इराक़ की अर्थव्यवस्था पर, जो हमेशा लड़खड़ाती रही और इराक़ के लोगों पर भी, जो कुछ महीने पहले तक बेहतरी की उम्मीद कर रहे थे.

लेकिन सरकारी मोर्चे पर नाउम्मीद होने के बाद इराक़ के नौजवानों ने सड़कों पर उतरने का फ़ैसला किया. पर जवाब में मिलीं सुरक्षाबलों की बंदूक़ से निकली गोलियां.

इराक़ के अलग-अलग शहरों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान अब तक 400 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. इसके बावजूद प्रदर्शनकारी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है.

क़मर आग़ा मध्यपूर्व मामलों के जानकार है और उनका मानना है कि इराक़ के विरोध-प्रदर्शनों के पीछे कई वजह हैं.

वो कहते हैं, ''विरोध प्रदर्शनों की सबसे बड़ी वजह ये है कि इराक़ में पिछली सरकारें एक के बाद विफल होती चली गईं. भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है. लोग बिजली, पानी, सड़क, स्कूल-कॉलेज जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए तरस रहे हैं. रोज़गार है ही नहीं, अर्थव्यवस्था एकदम ख़स्ताहाल है. पिछली सरकारों से निराश इराक़ के लोग अपनी उम्मीद इस क़दर खो चुके हैं कि उन्हें मौजूदा सरकार से ही नहीं बल्कि भावी किसी सरकार से कोई उम्मीद नहीं है.''

नाउम्मीद इराक़ी, बढ़ता आक्रोश

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इराक़ में सूखी-तपती, खारी-बंज़र ज़मीन से विरोध के बीज कैसे अंकुरित हुए. कैसे विरोध का दायरा इतना बड़ा हो गया कि प्रदर्शनों में शिया-सुन्नी भी काफ़ी हद तक एक हो गए और इराक़ के प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा.

क़मर आग़ा कहते हैं, ''इराक़ खाड़ी के बाक़ी देशों से कुछ मामलों में अलग है. यहां शिया अधिक हैं सुन्नी कम. सद्दाम हुसैन के बाद सुन्नी मध्यवर्ग अपने धन के साथ इराक़ से बाहर खाड़ी के अन्य देशों में जा बसा. इराक़ एक धनी देश रहा है जहां लोग महत्वाकांक्षी हैं. वो एक शक्तिशाली देश के तौर पर उभरना चाहते हैं. दशकों पहले इराक़ में उद्योग-धंधे फल-फूल रहे थे. भारत और रूस के सहयोग से वहां काफी चीज़ें बनती थीं. छोटी-बड़ी कंपनियों में बड़ी संख्या में कामकाजी लोग थे. कुशल और उद्यमी लोगों का एक बड़ा आज भी इराक़ में है जो देख रहा है कि कब तक इंतज़ार करें.''

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इराक़ में काफ़ी कुछ बदल गया है. क़मर आग़ा इस बदलाव का एक और उदाहरण देते हैं. वो कहते हैं, '' समय ऐसा आ गया है कि लोगों का रुझान आतंकवाद से हट गया है. बहुत लोगों को लगता था कि आतंकवाद के माध्यम से इस्लामिक स्टेट कई मसलों का हल कर देगा. इराक़ ने काफ़ी कुछ आज़माया लेकिन लगातार होती गई तबाही-बर्बादी के बाद उनके पास एक ही ज़रिया बचा. वो हमेशा से अपने लिए एक लिबरल, सेक्युलर, डेमोक्रेटिक सेटअप चाहते थे. इराक़ के पास संसाधनों की कमी नहीं है. तरक्की लेकिन हो नहीं रही तो चीजें बर्दाश्त के बाहर हो गईं.''

ईरान-अमरीका की भूमिका

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जानकार मानते हैं कि इराक़ की ज़मीन पर जो समस्याएं उपजीं, उनमें ईरान से बाहर की ताक़तों का भी योगदान था. इराक़ के मौजूदा विरोध प्रदर्शनों की ज़मीन को सींचने में ईरान और अमरीका ने बड़ी भूमिका अदा की है.

इसलिए कहा जाता है कि इराक़ के लोगों की मौजूदा हालत के लिए ईरान और अमरीका काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं.

दिल्ली में ऑब्ज़रवर रिसर्च फाउंडेशन में फ़ैलो रिसर्चर कबीर तनेजा का मानना है, '' 11 सितंबर 2001 के चरमपंथी हमले के बाद अमरीका ने ये कहते हुए इराक़ पर हमला किया था कि सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के हथियार हैं. लेकिन ऐसा कुछ मिला नहीं अमरीका को, फिर भी इस बहाने से सद्दाम हुसैन को हटा ही दिया. सद्दाम के बाद इराक़ में जो भी सरकारें बनीं, उन्हें अमरीका का आशीर्वाद मिलता रहा. ईरान भी मदद देता रहा. साल 2003 के बाद इराक़ में जब नई सरकारें बन रही थीं तो ईरान ने अपने लिए मौक़ा तलाशा और शिया सरकार के पक्ष में अपने लोगों को लगाया.''

कबीर तनेजा के मुताबिक़, ''पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी और हाल-फिलहाल तक प्रधानमंत्री रहे अब्दुल महदी को भी ईरान का समर्थन मिलता रहा. लेकिन सीरिया का युद्ध शुरू होने पर समीकरण बदलने लगे और ईरान ने इराक़ को एक सैटेलाइट स्टेट बनाना चाहा. अमरीका और ईरान के इस खेल में इराक़ के लोग फंसकर रह गए.''

विरोध प्रदर्शनों का कोई चेहरा नहीं

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इराक़ में जारी घटनाक्रम का एक पहलू ये भी है कि इन विरोध प्रदर्शनों का कोई चेहरा नहीं है. प्रदर्शनकारियों का कोई नेता नहीं है, जो इसकी एक बड़ी कमज़ोरी साबित हो सकता है.

कबीर तनेजा का मानना है, ''इराक़ में कोई ग्रुप ऐसा नहीं है जो इन विरोध प्रदर्शनों को किसी अंजाम तक पहुंचा सके जिससे स्थायी सरकार बन सके. बीच में इस तरह की ख़बरें भी सामने आईं थी कि ईरान ने कुछ लोगों को भेजा है, बात करने के लिए, पता करने के लिए कि महदी की जगह किस व्यक्ति को लाया जा सकता है. चूंकि प्रदर्शनकारियों का कोई नेता है, इसलिए आशंका इस बात की भी है कि आख़िर में अमरीका और ईरान अपनी पसंद की सरकार बनवाने में सफल हो जाएं.''

इराक़ के अलग-अलग शहरों में सड़कों पर उमड़ते सैलाब की हांगकांग, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया और सूडान में हुए विरोध प्रदर्शनों से तुलना की जा रही है.

राजधानी बग़दाद की सड़कों पर प्रदर्शनकारी

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जानकार मानते हैं कि इराक़ में हो रहा विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से स्थानीय लोगों का विरोध प्रदर्शन है. लेकिन इसमें कुछ विदेशी ताक़तें भी अपने लिए जगह तलाश रही हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.

अरब स्प्रिंग का विस्तार

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इराक़ के घटनाक्रम को अरब स्प्रिंग का विस्तार भी माना जा रहा है.

क़मर आग़ा तर्क देते हैं, ''अरब स्प्रिंग कभी ख़त्म ही नहीं हुआ था. उसका दमन किया गया था. दबाने का काम किया था इस्लामिक चरमपंथी गुटों ने और संबंधित देशों की सेना ने. लेकिन वो आंदोलन अंदर ही अंदर चल रहा था जो अब इराक़ में सतह पर नज़र आ रहा है.''

वो कहते हैं, ''लेकिन खाड़ी के कई देश नहीं चाहते कि लोकतंत्र पनपे. वो शासन व्यवस्था का पुराना ढर्रा ही जारी रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने चरमपंथी संगठनों को आर्थिक मदद भी दी. लोग इसे समझ रहे थे. शिया-सुन्नी के मतभेद अपनी जगह थे लेकिन अरब स्प्रिंग का विचार भी ख़त्म नहीं हुआ था. इराक़ के नौजवानों ने इसमें नई जान फूंक दी है.''

इराक़: भारत की नज़र से

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इराक़ के विरोध प्रदर्शनों पर न केवल खाड़ी के देशों की पैनी नज़र है, बल्कि पश्चिमी देश भी अनुमान लगा रहे हैं कि हवा किस तरह बह रही है और इसका वेग किस हद तक बढ़ सकता है.

भारत भी इराक़ को 'वॉच' कर रहा है. भारत के लिए इराक़ के घटनाक्रम के क्या मायने हैं. क्या इराक़ का मौजूदा घटनाक्रम भारत के हित में हैं या उससे भारत के हितों पर विपरीत असर पड़ सकता है.

इन सवालों का जबाव कबीर तनेजा कुछ इस तरह देते हैं, ''पश्चिम एशिया के लिए भारत की पॉलिसी यथार्थवादी रही है. जब सीरिया में युद्ध शुरू हुआ था, तब भी भारत ने असद के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा था. भारत चाहता है कि पश्चिम एशिया के देशों में किसी भी तरह स्थिरता बनी रही. भारत इराक़ से काफ़ी तेल लेता है. पश्चिम एशियाई देशों में आठ मिलियन से ज्यादा भारतीय काम करते हैं. ये लोग हर साल एक अनुमान के मुताबिक लगभग 30 अरब डॉलर भारत भेजते हैं. भारत इन तीन पक्षों को देखकर ही तय करता है कि खाड़ी के देशों में क्या होना चाहिए.''

इराक़ का तेल भारत की ऊर्जा ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा पूरा करता है

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भारत अपने लिए किस तरह का इराक़ चाहेगा, इस सवाल पर कबीर तनेजा कहते हैं, ''भारत चाहेगा कि इराक़ के प्रदर्शन किसी भी तरह ख़त्म हों, ताकि स्थिरता के साथ बग़दाद में ऐसी सरकार आए जो इराक़ियों की समस्याओं पर ध्यान देकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सके. नूरी मलिकी की सरकार के बाद इराक़ की कोई सरकार स्थिर नहीं रही. स्थिर सरकार से पूरे खाड़ी क्षेत्र में माहौल बेहतर बनाने में मदद मिलेगी.''

जानकार मानते हैं कि इराक़ इस समय बदलाव के दौर से गुज़र रहा है. बदलाव की ज़रूरत इराक़ियों के विरोध प्रदर्शनों में ज़ाहिर तो हो रही है, लेकिन तमाम तरह की संभावनाओं के बीच आशंका इस बात की भी है कि इराक़ का घटनाक्रम किसी ऐसे मोड़ पर न पहुंच जाए, जहां से आगे बढ़ने का रास्ता खोजना मुश्किल हो.

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