श्रीलंकाः कद्दावर महिंदा राजपक्षे की सत्ता में वापसी

    • Author, चार्ल्स हैवीलैंड
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

श्रीलंका पर दस साल तक बतौर राष्ट्रपति राज करने के बाद महिंदा राजपक्षे एक बार फिर सत्ता में वापस लौट आए हैं. इस बार प्रधानमंत्री के रूप में.

श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने अपने भाई और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को नया प्रधानमंत्री मनोनीत किया है. श्रीलंका में जनवरी में संसदीय चुनाव होने हैं.

इस बीच बहुत से लोग मानवाधिकार हनन के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे महिंदा राजपक्षे की वापसी को लेकर आशंकित हैं.

लेकिन महिंदा राजपक्षे को लेकर सिर्फ़ नकारात्मक बातें ही नहीं हैं. उनमें आकर्षण और करिश्मा भी बहुत है. मेरी उनसे पहली मुलाक़ात साल 2010 में हुई थी.

बीबीसी के श्रीलंका संवाददाता के तौर पर मेरी नियुक्ति की ये शुरुआत थी. एक रोज़ मैं और मेरे सहयोगी बिना किसी पूर्वसूचना के उनके गांव वाले घर पर पहुंच गए थे.

उनके बेटे और राजनीतिक वारिस नमल ने हमारा स्वागत किया और पिता से मिलाने के लिए ले गए. महिंदा राजपक्षे उस वक़्त सामने के कमरे में आराम कर रहे थे.

लंबी बातचीत के दौरान महिंदा ने एक बार भी वक़्त नहीं देखा. न ही ये जतलाया कि हमें चले जाना चाहिए.

महिंदा राजपक्षे की लोकप्रियता

बाद की मुलाकातों में भी, ख़ासकर जब वे पत्रकारों से घिरे होते थे, तब भी उनका यही रवैया रहा.

वे अपनी बगलवाली सीट पर बैठने का इशारा करते हुए कहते, "आओ बात करेंगे. महिंदा राजपक्षे की इस खूबी में उनकी उम्दा भाषण शैली भी मेल खाती थी."

अपने इस भदेसपन की वजह से महिंदा राजपक्षे सिंहली जनता के बीच तब भी बेहद लोकप्रिय थे और आज भी उतने ही मक़बूल.

सिंहली लोग श्रीलंका की आबादी का चौथाई हिस्सा हैं. कुछ लोग तो उनके लिए कविताएं और गीत लिखा करते थे, जिनमें उन्हें राजा कहकर संबोधित किया जाता था.और एलटीटीई चरमपंथियों के ख़िलाफ़ जंग में मिली जीत ने महिंदा राजपक्षे की लोकप्रियता को अपने चरम पर पहुंचा दिया था.

महिंदा राजपक्षे के किसी चाहने वाले ने एक न्यूज़ वेबसाइट पर लेख लिखा, "एलटीटीई को ख़त्म करके उन्होंने बहुत अच्छा काम किया था. एलटीटीई ट्रेन, बस, शॉपिंग मॉल में अंधाधुंध गोलियां बरसाकर और बम धमाके कर आम लोगों की हत्याएं करता था."

समस्या ये थी कि उस जंग की जीत को इतना बड़ा और महान बना दिया गया कि उसे हासिल करने के लिए अपनाए गए रास्तों को वाजिब ठहराया जाने लगा.

गृहयुद्ध के आख़िरी दिनों में...

मई, 2009 में एलटीटीई के ख़िलाफ़ जंग ख़त्म होने का जश्न कोलंबो की सड़कों पर जितने लोग मना रहे होंगे, तकरीबन उतने ही लोग ख़ामोशी से मातम भी मना रहे थे.

इनमें ज़्यादातर श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिल समुदाय के लोग थे. उन्होंने अपने बच्चे, बूढ़े मां-बाप, जीवनसाथी, भाई-बहन, जाने क्या-क्या नहीं गंवाया था.

गृहयुद्ध के आख़िरी दिनों में एलटीटीई के कब्ज़े में रह गए छोटे से इलाके में श्रीलंका की सेना ने पूरी ताक़त के साथ कार्रवाई की थी, कि उनके भागने की ज़रा सी भी गुंजाइश न रहे.

इन लोगों ने अपने घरों को ज़मींदोज़ होते देखा. उन्होंने देखा था कि किस तरह से एलटीटीई ने उनके क़रीबी लोगों को 'जबरन अपने सशस्त्र गुट में भर्ती' कर लिया था.

और इन लोगों ने ये भी देखा कि महिंदा राजपक्षे की सेना के सामने आत्मसमर्पण करने के बाद उनके अपने लोग कैसे 'अचानक लापता' हो गए.

गृहयुद्ध ख़त्म होने के बाद

वो दिन मुझे आज भी याद है जब गृहयुद्ध ख़त्म होने के तीन साल बाद एलटीटीई के गढ़ रहे किलीनोच्चि में मैं एक छोटी सी दुकान पर पुराने दिनों के संघर्ष पर बात कर रहा था.

तभी काउंटर के पीछे से महिला ने सामने आकर अपने जख़्म दिखाये. उनके शरीर पर बम के गोले से बने घाव के निशान थे.

वहां ऐसे लोग भी थे जिन्होंने शांति का सफ़ेद झंडा लहराते तमिल टाइगर्स को आत्मसमर्पण से पहले या हिरासत में लिए जाने के बाद मारे जाते देखा था.

सरकार के ज़ोरदार इनकार के बावजूद गृहयुद्ध ख़त्म होने के आख़िरी चरण में इस घटना का वीडियो भी सामने आया था.

सितंबर, 2018 में इस बात की पुष्टि एक ऐसे शख़्स ने कर दी जिसे आसानी से नकारा नहीं जा सकता था.

सेना की हिरासत

महिंदा राजपक्षे के उच्च शिक्षा मंत्री रहे एसबी दिशानायके ने सार्वजनिक तौर पर ये कहा कि बहुत से एलटीटीई विद्रोहियों को सेना की हिरासत में मार दिया गया था.

पूर्व मंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक घटना का उदाहरण देते हुए कहा, "एलटीटीई के मिलिट्री कमांडर कर्नल रमेश ने मुझे फोन कर अपने सरेंडर के बारे बताया. रमेश ने सरेंडर किया और रमेश मारा गया."

मुझे याद है कि श्रीलंका के रक्षा विभाग के तत्कालीन प्रवक्ता केहेलिया रंबुकेवेल्ला किसी सिंहली पत्रकार की गुमशुदगी पर टिप्पणी करते हुए मुस्कुरा रहे थे.

युद्ध के बाद की रिपोर्टिंग, ख़ासकर मानवाधिकार हनन के मामले और लोगों की गुमशुदगी मुझे आज भी परेशान करती है.

श्रीलंका के उत्तरी इलाके में बड़ी संख्या में पूर्व विद्रोही और तमिल नागरिक लापता थे. ऐसा नहीं था कि परेशानी केवल तमिल बहुत इलाकों में थी.

लोग कोलंबो में भी ग़ायब हो रहे थे.

अच्छी ख़बर का इंतज़ार

कोलंबो में मेरी मुलाकात शिरोमणि से हुई थी. उनके बिजनेसमैन पति ग़ायब हो गए थे. कोर्ट में पुलिस के ख़िलाफ़ कथित तौर पर यंत्रणा देने का मुक़दमा चल रहा था.

इस घटना को छह साल बीत गए हैं. शिरोमणि आज भी किसी अच्छी ख़बर का इंतज़ार कर रही हैं. उनके पति जैसे और भी लोग थे, जो अचानक लापता हो गए थे.

उस वक़्त एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने मीडिया में ये कहा था कि उनके पास सरकार विरोधी प्रदर्शनों को रोकने के लिए पर्याप्त संख्या में सफ़ेद रंग की वैंस हैं.

सरकार की शह पर कथित रूप से अगवा किए जाने के काम में इस्तेमाल होने वाली सफ़ेद रंग की ये गाड़ियां आज भी बदनाम हैं.

साल 2015 में महिंदा राजपक्षे और उनके सहयोगियों के सत्ता से बाहर होने के बाद मानवाधिकार हनन के मामलों में कोई प्रगति नहीं हुई है.

कई तमिल लोग और ऐक्टिविस्ट ये कहते हैं कि श्रीलंका में कुछ नहीं बदला है.

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