नवाज़ शरीफ़ का विदेश जाना इमरान के लिए झटका?

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पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ इलाज के लिए हवाई एम्बुलेंस से लंदन के लिए रवाना हो गए हैं. वे लंबे समय से बीमार चल रहे हैं.
लेकिन लंदन जाने के लिए उन्हें कोर्ट से अनुमति लेनी पड़ी. लाहौर हाईकोर्ट ने इलाज के लिए नवाज़ शरीफ़ को चार हफ्तों के लिए विदेश जाने की अनुमति दी है.
इस कहानी में पेच ये है कि इमरान ख़ान की सरकार उन्हें इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति नहीं देना चाहती थी.
सरकार का कहना था कि अगर ऐसा ज़रूरी है तो उनसे 700 करोड़ रुपये का बॉन्ड भरवाना चाहिए.
बीमारी
69 साल के नवाज़ शरीफ़ को पिछले साल चौधरी शुगर मिल से जुड़े भ्रष्टाचार के एक मामले में सात साल की सज़ा सुनाई गई थी.
उन्हें जेल भी भेजा गया, लेकिन बीमार होने के कारण उन्हें लाहौर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. लेकिन उनकी हालत में कोई ख़ास सुधार नहीं हो पा रहा था.
लाहौर से बीबीसी संवाददाता तरहूब असग़र के मुताबिक़ नवाज़ शरीफ़ के प्लेटलेट्स काफ़ी कम हो रहे थे. साथ ही उन्हें शुगर भी है और दिल की बीमारी भी.
अपनी ख़राब हालत को देखते हुए उन्होंने सरकार से विदेश में इलाज की अनुमति मांगी थी, लेकिन सरकार ने 700 करोड़ रुपए के बॉन्ड भरने की शर्त रख दी थी.
इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और अदालत ने उन्हें इलाज के लिए बाहर जाने की अनुमति दे दी.
सवाल ये है कि आख़िर इमरान सरकार उन्हें विदेश क्यों नहीं जाने देना चाहती थी. जानकारों का कहना है कि इमरान सरकार इस मुद्दे पर दुविधा में थी.
आलोचना

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एक तरफ़ नवाज़ शरीफ़ को उचित इलाज नहीं देने के लिए उन्हें देश में भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा था, तो दूसरी ओर ये भी अंदेशा है कि अगर नवाज़ शरीफ़ विदेश से नहीं लौटे तो उन्हें जनता का ग़ुस्सा झेलना पड़ेगा.
शायद यही वजह रही कि इमरान सरकार उनसे बॉन्ड साइन करवाना चाहती थी. लेकिन सियासी मोहरे चलने के उस्ताद माने जानेवाले नवाज़ शरीफ़ ने ऐसा करने से साफ़ इनकार कर दिया.
तो क्या इसे इमरान सरकार की सियासी हार माना जाना चाहिए?
बीबीसी उर्दू सेवा के न्यूज़ एडिटर ज़ीशान हैदर कहते हैं, "इसका एक पहलू ये भी है कि इमरान ख़ान सरकार को अब ये कहने का मौक़ा मिल गया है कि उन्होंने तो बॉन्ड साइन के लिए कहा था, लेकिन अदालत ने ऐसा नहीं किया. फ़ैसला तो कोर्ट ने किया. मुझे लगता है कि दोनों पार्टियों के लिए ये एक विन-विन वाली स्थिति है."
नवाज़ शरीफ़ के बॉन्ड न भरने के मामले पर उनका कहना है कि नवाज़ शरीफ़ की पार्टी का ये कहना है कि जब अदालत ने उन्हें ज़मानत दे दी थी, तो वे सरकार की ज़मानत क्यों भरें. दूसरी ओर उनकी पार्टी ये भी साबित करने की कोशिश कर रही थी कि वो इमरान ख़ान सरकार से कोई डील करके विदेश नहीं जा रहे हैं.
बेहद ख़राब माली हालत से जूझ रहे पाकिस्तान में सियासी दलों की हालत भी कुछ अच्छी नहीं है.
नवाज़ शरीफ़ तो जेल में थे ही उनकी बेटी मरियम भी जेल में थी. अब वो ज़मानत पर जेल से बाहर हैं. इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाकान अब्बासी और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी भी भ्रष्टाचार के अलग-अलग मामलों में जेल में हैं.
पाकिस्तान मुस्लिम लीग़ नवाज़ की कमान इन दिनों नवाज़ के भाई शाहबाज़ शरीफ़ के हाथों में है.
कमबैक मैन

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नवाज़ शरीफ पाकिस्तान की राजनीति में सबसे मशहूर कमबैक मैन रहे हैं.
वो रिकॉर्ड तीन बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे हैं लेकिन कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके.
1990 में पहली बार पीएम बने शरीफ़ को 1993 में बर्खास्त कर दिया गया. 1997 में उन्होंने वापसी की. दो साल बाद 1999 में जब सेना ने उनका तख्तापलट किया तो इसे उनकी राजनीतिक पारी का अंत माना गया.
लेकिन साल 2013 के चुनाव में बड़ी जीत के साथ सत्ता में लौटे शरीफ़ फिर अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए. जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने शरीफ़ को अयोग्य ठहराया और उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी.
अगले साल यानी 2018 में उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में सात साल की सज़ा हुई.
बीते 30 साल से पाकिस्तान की राजनीति का अहम चेहरा रहे नवाज़ शरीफ़ ने अपने इलाज को लेकर जो सख़्त रुख़ दिखाया है, उससे उनकी पार्टी इमरान सरकार को बैकफुट पर लाने में कामयाब हुई है. लेकिन क्या ये कामयाबी मुस्लिम लीग की या नवाज़ शरीफ़ के मुश्किल दौर को ख़त्म कर पाएगी, ये देखना बाक़ी है.
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