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मुसलमान प्रोफ़ेसर संस्कृत पढ़ाए, तो यूनिवर्सिटी की पवित्रता को ख़तरा है? वुसअत का ब्लॉग
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी के लिए
जब 1979 में पहले पाकिस्तानी प्रोफ़ेसर डॉक्टर अब्दुस सलाम को फ़िजिक्स का नोबेल पुरस्कार मिला तो फ़ौजी शासक जनरल ज़ियाउल हक़ ने उन्हें बधाई दी.
जब डॉक्टर सलाम नोबल पुरस्कार लेकर पाकिस्तान आए तो उन्हें इस्लामाबाद की क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी और कराची यूनिवर्सिटी ने भी सम्मानित करना चाहा.
मगर दोनों जगह जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन ने डॉक्टर सलाम को घुसने नहीं दिया.
इस छात्र संगठन का कहना था कि भले ही डॉ. सलाम विश्व के जाने-माने पाकिस्तानी वैज्ञानिक हों मगर हैं तो क़ादियानी या अहमदी, और क़ादियानी काफ़िर होते हैं.
जब इमरान ख़ान पिछले साल प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपनी आर्थिक सुधार टीम में जाने-माने पाकिस्तानी- अमरीकन अर्थशास्त्री आतिफ़ मियां को भी शामिल कर लिया.
बस फिर क्या था जितने भी धार्मिक राजनीतिक गुट थे सभी ने एक ज़ुबान में कहा, भले आतिफ़ मियां जितने भी महान अर्थशास्त्री हों, भले उसे सऊदी अरब भी आर्थिक मुद्दों पर मश्विरे के लिए बुलाता हो, मगर हमें उसकी सेवाएं नहीं चाहिए. क्योंकि वो काफ़िर है क़ादियानी है.
आख़िरकार इमरान ख़ान को आतिफ़ मियां का नाम वापस लेना पड़ गया.
पवित्रता को बचाने की कोशिश
हिंदी सिनेमा जगत के जाने-माने नाम नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के बुढाना क़स्बे में पैदा हुए. वहीं के कुछ लोगों ने लगभग तीन वर्ष पहले उन्हें महाभारत के एक नाटक में भाग लेने से यह कहकर रोक दिया कि आप मुसलमान हो, लिहाज़ा महाभारत में हिस्सा नहीं ले सकते.
जब मुझे यह ख़बर मिली तो यक़ीन जानिए दिल को ये सोचकर राहत सी मिली कि हम अपनी पवित्रता को बचाकर रखने वाली अकेली क़ौम नहीं, पड़ोस में भी कुछ लोग हमसे चार हाथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.
और अब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत डिपार्टमेंट में डॉक्टर फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति का क़िस्सा सामने आ गया.
वाइस चांसलर राकेश भटनागर और ख़ुद संस्कृत डिपार्टमेंट के मुखिया उमाकांत चतुर्वेदी कह रहे हैं कि डॉक्टर फ़िरोज़ ख़ान को संस्कृत में उनकी क़ाबिलियत के आधार पर पढ़ाने के लिए चुना गया है.
मगर कुछ छात्रों ने धरना दे रखा है कि हम किसी मसुलमान अध्यापक से संस्कृत नहीं पढ़ेंगे. क्योंकि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में एक पत्थर पर ख़ुदा हुआ है कि इस विश्वविद्यालय में ना मुसलमान पढ़ सकता है ना पढ़ा सकता है.
जबकि यूनिवर्सिटी के प्रशासन को आज तक वह पत्थर नहीं मिला जिस पर ऐसा कुछ खुदा हुआ हो.
मगर जैसा कि देश का माहौल है ऐसा पत्थर भले हो या ना हो, जो छात्र कह रहे हैं वही पत्थर की लकीर है.
ये बात अपनी जगह कि डॉ. फ़िरोज़ ख़ान ने इंटरव्यू में दस में से दस नंबर लिए, उनके पिता ने भी ना सिर्फ़ संस्कृत पढ़ी बल्की वो जयपुर में एक गौशाला की देखरेख के लिए भजन गाकर चंदा जमा करते हैं.
ये सब सर आंखों पर मगर वो हैं तो मुसलमान. और जब मुसलमान हैं तो हिंदुस्तान में क्या काम. जाएं पाकिस्तान और वहां जाकर पढ़ाएं संस्कृत.
जैसे क़ादियानों का पाकिस्तान में क्या काम, वो जाएं इसराइल या हिंदुस्तान या कहीं भी.
शिक्षा-विक्षा तो होती रहेगी लेकिन उससे भी पहले पवित्रता का ख्याल रखना ज़रूरी है.
वो जो बचपने में किसी पन्ने पर लिखा पढ़ा करते थे कि, ''मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना.''
अब इस 'बैर ना रखने' वाले पन्ने को बेचकर 'बेर' खा लो.
वुसअतुल्लाह ख़ान के पुराने ब्लॉग पढ़ेंः
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