'इमरान नाकाम बल्लेबाज़, मोदी की लूज़ बॉल का इंतज़ार': उर्दू प्रेस रिव्यू

    • Author, इक़बाल अहमद,
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते भारत प्रशासित कश्मीर, एफ़एटीएफ़ और एक विपक्षी नेता मौलाना फ़ज़लुर्रहमान के होने वाले आज़ादी मार्च से जुड़ी ख़बरें सबसे ज़्यादा सुर्ख़ियों में रहीं.

भारत प्रशासित कश्मीर में महिलाओं के एक प्रदर्शन का ज़िक्र पाकिस्तान के सभी अख़बारों में है. जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुक़ अब्दुल्लाह की बहन और बेटी महिलाओं के एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही थीं. भारतीय सुरक्षा बलों ने रैली को नाकाम बनाते हुए फ़ारुक़ अब्दुल्लाह की बहन और बेटी समेत दर्जनों महिलाओं को हिरासत में ले लिया था.

इस पर अख़बार एक्सप्रेस ने सुर्ख़ी लगाई है, ''भारत निहत्थी महिलाओं से भी ख़ौफ़ज़दा, फ़ारुक़ अब्दुल्लाह की बहन, बेटी समेत दर्जनों गिरफ़्तार.''

शुक्रवार को पाकिस्तान के कई शहरों में भारत प्रशासित कश्मीर में रह रहे लोगों के समर्थन में प्रोग्राम आयोजित किए गए.

अख़बार दुनिया के मुताबिक़ शुक्रवार को लोगों ने काली पट्टी बांध कर कश्मीरियों पर कथित भारतीय ज़ुल्म के विरोध में प्रदर्शन किया.

'मैं कश्मीर हूं'

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी अपनी बांह पर काली पट्टी बांधी जिस पर लिखा था, ''मैं कश्मीर हूं.''

इमरान ख़ान भले ही हर फ़ोरम पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बयान देते रहते हैं और कश्मीरियों का समर्थन करते रहते हैं लेकिन पाकिस्तान में एक वर्ग ऐसा भी है जो कश्मीर के मामले में इमरान ख़ान की कड़ी आलोचना करता है और उन्हें इस मामले में पूरी तरह असफल मानता है.

अख़बार जंग में सलीम साफ़ी ने एक कॉलम लिखा है जिसका शीर्षक है 'कश्मीर-अब क्या होगा?'.

इस कॉलम में उन्होंने कश्मीर के मामले में पाकिस्तान और ख़ासकर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की जमकर आलोचना की है. उनके अनुसार कश्मीर के मामले में इमरान ख़ान बुरी तरह नाकाम रहे हैं.

वो लिखते हैं कि 65, 71 और फिर करगिल की जंग हुई. इन जंगों के अलावा भी कई बार ऐसा हुआ कि भारत और पाकिस्तान की सेना एक दूसरे के सामने आईं लेकिन कभी भी भारत सरकार ये हिम्मत नहीं कर सकी कि कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों में कोई बदलाव कर सके.

ये पहली बार हुआ है जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों को छीनते हुए उसके विशेष राज्य के दर्जे को ख़त्म कर दिया है.

वो आगे लिखते हैं, ''कहा जा रहा था कि मोदी ने कश्मीर के मामले में ये फ़ैसला लेकर पाकिस्तान की तरफ़ एक लूज़ बॉल फेंक दी है और अब इस पर छक्का लगाना हमारा काम है. यहां तक कहा जाने लगा कि कश्मीर की आज़ादी अब या कभी नहीं.लेकिन सवाल ये है कि मोदी की इस लूज़ बॉल पर पाकिस्तान ने कितने रन बना लिए. मेरी नज़र में चौका-छक्का तो दूर की बात है, पाकिस्तान एक भी रन नहीं बना सका. इमरान एक नाकाम बल्लेबाज़ की तरह मोदी से दूसरी लूज़ बॉल का इंतज़ार कर रहे हैं.''

सलीम साफ़ी इसका कारण बताते हुए लिखते हैं, ''इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि हम अपने ऊपर भरोसा करने के बजाए अमरीका को अम्पायर समझने और उस पर निर्भर रहने की ग़लती करते हैं.''

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में इमरान ख़ान ने ज़ोरदार तक़रीर ज़रूर की लेकिन पाकिस्तान को अमरीका का कोई समर्थन नहीं मिला. यूएन असेम्बली की बैठक में इस्लामी देशों में से केवल दो तुर्की और मलेशिया और बाक़ी दुनिया में केवल चीन के विदेश मंत्री ने कश्मीर का ज़िक्र किया.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब भारत आए तो उन्होंने कश्मीर पर कोई बात नहीं की.

इतिहास में पहली बार हुआ कि कश्मीर के मुद्दे पर बातचीत के लिए पाकिस्तान इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी की बैठक तक नहीं बुलवा सका.

वो आगे लिखते हैं, ''अफ़सोस की बात है कि ओआईसी का नेतृत्व इस समय सऊदी अरब कर रहा है जिसकी सुरक्षा के लिए हमने अपने अपने पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ को भिजवा रखा है और जिसके ग़म में हम कश्मीर के मसले को छोड़कर सऊदी अरब और ईरान के बीच मध्यस्थता करने में लगे हैं.''

इमरान ख़ान के इस क़दम की भी सलीम साफ़ी जमकर आलोचना करते हुए लिखते हैं, ''मुझे तो लगता है कि कश्मीर के मामले में नाकामी के बाद उससे ध्यान हटाने के लिए ही वो सऊदी अरब और ईरान के बीच मध्यस्थता करने का ढोंग रचा रहे हैं. लेकिन हम वहां भी कुछ नहीं कर सकते क्योंकि न तो हम सऊदी अरब से और न ही ईरान से कोई बात मनवा सकते हैं.''

'एफ़एटीएफ़ पर भारतीय कोशिश नाकाम'

इसके अलावा फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) के पाकिस्तान के बारे में दिए गए फ़ैसले की ख़बर भी सारे अख़बारों में प्रमुखता से छपी.

एफ़एटीएफ़ ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में बरक़रार रखने का फ़ैसला किया है. लेकिन उसने पाकिस्तान को सख़्त चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर पाकिस्तान ने फ़रवरी 2020 तक इस मामले में ज़रूरी क़दम नहीं उठाया तो फिर उसे ब्लैक लिस्ट में डाला जा सकता है.

लेकिन कई अख़बारों ने इसमें भी भारत का नाम घसीटने की कोशिश की है. जंग, दुनिया और नवा-ए-वक़्त जैसे अख़बारों ने सुर्ख़ी लगाई है, ''पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में शामिल कराने की भारतीय कोशिश नाकाम.''

इसके अलावा एक प्रमुख विपक्षी नेता मौलाना फ़जलुर्रहमान की प्रस्तावित आज़ादी मार्च और ब्रिटेन के शाही जोड़े की पाकिस्तान यात्रा की ख़बर भी सुर्ख़ियों में रही.

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