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तुर्की के हमले से पहले आईएस के इन 'खूंखार लड़ाकों' को ले निकला अमरीका
अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि 'आईएस बीटल्स' के नाम से प्रसिद्ध दो आईएस के लड़ाकों को सीरिया से बाहर अमरीका के नियंत्रण वाले एक सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया है.
अल शफ़ी अलशेख़ और एलेक्जैंडा कोटी पर इस्लामिक स्टेट के उस सेल में शामिल होने का आरोप है जिसने सीरिया में पश्चिमी देशों के लोगों को अग़वा किया था और उनकी हत्या की थी.
अमरीकी मीडिया की ख़बरों के मुताबिक़, लंदन के रहने वाले इन दोनों को अमरीकी सेना ने हिरासत में ले लिया है.
ट्रंप ने एक ट्वीट में उन्हें "सबसे ख़राब से भी ख़राब" क़रार दिया है.
उन्होंने कहा है कि उन्हें सीरिया से दूर ले जाने का निर्णय इसलिए लिया गया है क्योंकि कुर्द या तुर्की उस जगह से नियंत्रण खो सकते हैं.
न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट ने कहा है कि उत्तरी सीरिया में कुर्द लड़ाकों द्वारा चलाए जा रही एक जेल से उन्हें रिहा कराया गया.
अमरीका के इस सप्ताह क्षेत्र से अपने बलों को वापस बुलाये जाने के बाद यह घोषणा सामने आई है.
बुधवार को राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा था कि अमरीका कुछ सबसे ख़तरनाक आईएस लड़ाकों को दूसरे स्थान पर ले गई है. ऐसा इस आशंका के कारण किया गया कि तुर्की बलों के उत्तरी सीरिया में कुर्द के नियंत्रण वाले क्षेत्र में घुसने के कारण वे हिरासत से बच निकल सकते हैं.
सीरिया में आईएस को हराने में मदद करने वाले और संघर्ष में अमरीका का एक प्रमुख सहयोगी कुर्द अपने नियंत्रण वाले इलाक़ों की जेलों और शिविरों में आईएस लड़ाकों और उनके रिश्तेदारों की निगरानी कर रहा है. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अगर संघर्ष छिड़ता है तो क्या तब भी वे ऐसा करना जारी रखेंगे.
इनके अलावा आईएस सेल में जिहादी जॉन के नाम से पहचाने जाने वाले मोहम्मद इवाजी और तुर्की की जेल में बंद आइने डेविस को 'द बीटल्स' कहा जाता था. यह नाम उनके ब्रिटिश लहज़े के कारण दिया गया था. जिहादी जॉन 2015 में अमरीकी हवाई हमले में मारे गए थे.
माना जाता है कि इवाजी ने 2014 में अमरीकी पत्रकार जेम्स फ़ोली को मार दिया था.
सीरिया जाने से पहले चारों को ब्रिटेन में कट्टरपंथी बनाया गया था. उसी समय अल शफ़ी अलशेख और एलेक्जैंडा कोटी की ब्रिटिश नागरिकता छीन ली गई थी.
अमरीकी विदेश विभाग ने इस जोड़ी को आतंकवादियों के रूप में नामित किया है क्योंकि वह ऐसे समूह में थे जो बेहद कूर यातनाएं देकर प्रताड़ित करता था. इसमें बिजली के झटके दिए जाते थे, पानी में डुबोया जाता था और मज़ाक़ उड़ाते हुए मारा जाता था.
माना जाता है कि कुर्द बलों ने उन्हें जनवरी 2018 में हिरासत में लिया था.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने ख़बर दी है कि अमरीका की योजना अलशेख और कोटी को वर्जिनिया ले जाने की है. वर्जिनिया कुछ ऐसे राज्यों में शामिल है जहां अभी भी मौत की सज़ा दी जाती है और वहां उन पर मुक़दमा चलाया जाएगा.
हालांकि, ब्रिटेन की शैडो मंत्री एमिली थॉर्नबेरी ने कहा कि उन्हें मुक़दमे की कार्रवाई के लिए उन्हें स्वदेश लाया जाना चाहिए.
गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि क़ानूनी कार्रवाई चलने के दौरान यह टिप्पणी करना अनुचित होगा.
अभी यह देखा जाना बाक़ी है कि क्या ब्रिटिश जांचकर्ताओं द्वारा दोनों के ख़िलाफ़ इकट्ठा किए गए सबूत अमरीकी अधिकारियों को पूरी तरह से सौंप दिए जाएंगे.
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे जब 2015 में गृह मंत्री थीं उस समय उन्होंने वॉशिंगटन से कहा था कि ब्रिटेन तभी सबूत देगा जब उसे इस बात की गारंटी दी जाएगी कि व्यक्ति को फांसी नहीं दी जाएगी.
ब्रिटेन लंबे समय से अमरीका से इस तरह के मृत्युदंड पर आश्वासन की मांग कर रहा है.
टेरीज़ा मे के उत्तराधिकारी अंबर रुड ने उस मांग को दोहराया था लेकिन साजिद जावेद के अप्रैल 2018 में गृह मंत्री बनने के बाद इस रुख़ में बदलाव आ गया.
जावेद ने अलशेख और कोटी को मृत्युदंड नहीं देने की गारंटी के बिना 600 गवाहों का बयान सौंपने का फ़ैसला किया.
अलशेख की मां महा एल्गीज़ौली ने इस फ़ैसले को चुनौती दी थी. हालांकि जनवरी में हाईकोर्ट में वह मुक़दमा हार गईं. यह मामला इस समय ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.
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